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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 821, कुल 832 में से

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पृष्ठ 821
    • विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६५
      संग्रह करे। 'अग्निरिति भस्म' * ॐ इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित
      करे, 'मा नस्तोके०'† इस मन्त्रसे उठाकर जलसे मले,
      'त्र्यायुषम्०'‡ इत्यादि मन्त्रसे मस्तक, ललाट, वक्षःस्थल और
      कन्धोंपर त्रिपुण्ड्र करे। 'त्र्यायुषम्०' तथा 'त्र्यम्बकम्०'§ इन
      दोनों मन्त्रोंको तीन-तीन बार पढते हुए तीन रेखाएँ खींचे। यह
      'शाम्भव' व्रत है, सम्पूर्ण वेदोंमें वेदज्ञोंद्वारा कहा गया है। मुमुक्षु
      आवागमनसे बचनेके लिये इसका सम्यक् आचरण करे।'
      तदनन्तर सनत्कुमारने इन रेखाओंका परिमाण पूछा। त्रिपुण्ड्र-
      धारणकी तीन रेखाएँ ललाटभरमें चक्षु और भ्रुवोंके मध्यतक
      होती हैं। इनमें जो प्रथमा रेखा है, वह गार्हपत्य-अग्निका
      प्रतीक, प्रणवका अकार, रजोगुणस्वरूप, भूर्लोक, देहात्मा,
      क्रियाशक्ति, ऋग्वेद, प्रातःकालीन सवन और ब्रह्मादेवताका
      स्वरूप है। इसकी जो द्वितीय रेखा है, वह दक्षिणाग्निका
      प्रतीक, उकार, सत्त्वगुण, अन्तरिक्ष, अन्तरात्मा, इच्छाशक्ति,
      यजुर्वेद, माध्यन्दिन सवन और विष्णुदेवताका स्वरूप है।
      जो इसकी तृतीय रेखा है, वह आहवनीय अग्निका प्रतीक,
      मकार, तमोगुण, द्युलोक, परमात्मा, ज्ञानशक्ति, सामवेद,
      तृतीय सवन और महादेवदेवताका स्वरूप है। यों समझकर
      जो भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह विद्वान्, ब्रह्मचारी,
      गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्न्यासी—जो भी कोई हो, महापातक और
      उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है। सब देवताओंके ध्यानका
      फल उसको मिलता है। उसे सब तीर्थोंके स्नानका फल प्राप्त
      हो जाता है। वह समस्त रुद्रमन्त्रोंके जापका फल प्राप्त कर
      लेता है। वह पुनः आवागमनमें नहीं पड़ता, पुनः आवागमनमें
      नहीं पड़ता। ॐ सत्यम्—यह उपनिषद् है।
      ॥ सामवेदीय जावाल्युपनिषद् समाप्त ॥
      शान्तिपाठ
      ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं
      ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि
      निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु।
      ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
      शिवका उपासक धन्य है
      सर्गादिकाले भगवान् विरिश्विरुपास्त्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य ।
      तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थांश्च लब्ध्वा धन्यः सोपास्योपासको भवति धाता ॥ (दक्षिणामूर्ति० २०)
      सृष्टिके आदिकालमें भगवान् ब्रह्मा इन (शिव) की उपासना करनेसे सामर्थ्य प्राप्तकर और मनोऽभिलषित अर्थको
      पाकर सन्तुष्ट होते हैं। इन उपास्य (शिव) का उपासक धन्य है, क्योंकि वह भी धाता (सबका धारण-पोषण करने-
      वाला) हो जाता है।
  • ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म व्योमेति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म ॥
    † मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । मा नो वीरान्रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्त सदमित्त्वा हवामहे ॥
    (यजुर्वेद १६ । १६)
    ‡ त्र्यायुषं जमदग्ने कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुष तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् ॥ (यजुर्वेद ३ । ६२)
    § त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ (यजुर्वेद ३ । ६०)