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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 754

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथर्ववेदीय
गणपत्युपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
भगवान् गणनायककी स्तुति, उनके बीजमन्त्र, महामन्त्र तथा गायत्री, उपनिषद्के
पाठका तथा गणपति पूजनका माहात्म्य
हरि ॐ। भगवान् गणपतिको नमस्कार है। तुम्हीं
प्रत्यक्ष तत्त्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो, तुम्हीं केवल धर्ता
हो, तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपोंमें
विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात् नित्य आत्मस्वरूप हो। मैं ऋत-
न्याययुक्त बात कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। तुम मेरी (मुझ शिष्यकी)
रक्षा करो; वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोताकी रक्षा
करो। दाताकी रक्षा करो, धाताकी रक्षा करो। व्याख्या करनेवाले
आचार्यकी रक्षा करो, शिष्यकी रक्षा करो। पश्चिमसे रक्षा
करो, पूर्वसे रक्षा करो, उत्तरसे रक्षा करो, दक्षिणसे रक्षा
करो, ऊपरसे रक्षा करो, नीचेसे रक्षा करो, सब ओरसे
मेरी रक्षा करो, चारों ओरसे मेरी रक्षा करो। तुम वाङ्मय
हो, तुम चिन्मय हो, तुम आनन्दमय हो, तुम ब्रह्ममय हो।
तुम सच्चिदानन्द, अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, तुम
ज्ञानमय, विज्ञानमय हो। यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न
होता है। यह सारा जगत् तुमसे ठहरा हुआ है। यह सारा
जगत् तुममें लयको प्राप्त होगा। इस सारे जगत्‌की तुममें
प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और
आकाश हो। परा, पश्यन्ती, वैखरी और मध्यमा-वाणीके ये
चार विभाग तुम्हीं हो । तुम सत्त्व, रज और तम-तीनों
गुणोंसे परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान-तीनों
कालोंसे परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण-तीनों शरीरोंसे
परे हो। तुम मूलाधार चक्रमे नित्य स्थित रहते हो। इच्छा,
क्रिया और ज्ञान-तीन प्रकारकी शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा
योगिजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो,
तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो,
तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू, भुवः, स्वः-
ये तीनों लोक तथा ॐकारवाच्य परब्रह्म भी तुम हो।
गणके आदि अर्थात् ग् का पहले उच्चारण करके उसके
बाद वर्णोंके आदि अर्थात् अ का उच्चारण करे, उसके बाद
अनुस्वार उच्चारित होता है । इस प्रकार अर्धचन्द्रसे
सुशोभित 'ग' ॐकारसे अवरुद्ध होनेपर तुम्हारे बीज-
मन्त्रका स्वरूप (ॐ ग् ) है। गकार इसका पूर्वरूप है,
अकार मध्यम रूप है, अनुस्वार अन्त्य रूप है, बिन्दु उत्तर
रूप है। नाद सन्धान है। सहिता सन्धि है। ऐसी यह
गणेशविद्या है। इस महामन्त्रके गणक ऋषि हैं, निचृद्गायत्री
छन्द है, श्रीमद्महागणपति देवता हैं। वह महामन्त्र है-
ॐ गं गणपतये नम । एकदन्तको हम जानते हैं। वक्रतुण्डका