कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 743, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
कृष्णयजुर्वेदीय
चाक्षुषोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
अब नेत्र-रोगका हरण करनेवाली पाठमात्रसे सिद्ध ॐ (भगवान्का नाम लेकर कहे )। हे चक्षुके अभिमानी
होनेवाली चाक्षुषी विद्याकी व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त सूर्यदेव ! आप चक्षुमे चक्षुके तेजरूपसे स्थिर हो जायें । मेरी
नेत्ररोगोंका सम्पूर्णतया नाश हो जाता है और नेत्र तेजयुक्त हो रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आँखके रोगोंका शीघ्र शमन करें,
जाते हैं । उस चाक्षुषी विद्याके ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री शमन करें । मुझे अपना सुवर्ण-जैसा तेज दिखला दें, दिखला
छन्द है, सूर्यभगवान् देवता हैं, नेत्ररोगकी निवृत्तिके लिये दें । जिससे में अंधा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें,
इसका जप होता है—यह विनियोग है *। उपाय करें । मेरा कल्याण करें, कल्याण करें । दर्शन-शक्तिका
चाक्षुषी विद्या अवरोध करनेवाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको
ॐ चक्षु चक्षुः चक्षु. तेजः स्थिरो भव । मा पाहि जड़से उखाड़ दे, जड़से उखाड़ दें । ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप)
पाहि । त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय । मम जातेरूपं नेत्रोंको तेज प्रदान करनेवाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्करको
तेजो दर्शय दर्शय । यथाहम् अन्धो न स्या तथा कल्पय नमस्कार है । ॐ करुणाकर अमृतस्वरूपको नमस्कार है ।
कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि ॐ सूर्यभगवान्को नमस्कार है । ॐ नेत्रोंके प्रकाश भगवान्
चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय । सूर्यदेवको नमस्कार है । ॐ आकाशविहारीको नमस्कार है ।
ॐ नम चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय । ॐ नम परम श्रेष्ठस्वरूपको नमस्कार है । ॐ ( सबमें क्रिया-शक्ति
करुणाकरायामृताय । ॐ नम. सूर्याय । ॐ नमो भगवते उत्पन्न करनेवाले ) रजोगुणरूप सूर्यभगवान्को नमस्कार है ।
सूर्यायाक्षितेजसे नम. । खेचराय नम. । महते नम. । रजसे ( अन्धकारको सर्वथा अपने अदर समा लेनेवाले ) तमोगुणके
नम.। तमसे नम.। असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। आश्रयभूत भगवान् सूर्यको नमस्कार है । हे भगवन् ! मुझको
मृत्योर्मा अमृत गमय। उष्णो भगवान्छुचिरूपः। हंसो भगवान् असत्से सत्की ओर ले चलिये । अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले
शुचिरप्रतिरूप । य इमा चाक्षुष्मतीविद्या ब्राह्मणो नित्यमधीते चलिये । मृत्युसे अमृतकी ओर ले चलिये । उष्णस्वरूप भगवान्
न तस्याक्षिरोगो भवति । न तस्य कुले अन्धो भवति । सूर्य शुचिरूप हैं । हंसरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप
अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति ॥ हैं—उनके तेजोमय स्वरूपकी समता करनेवाला कोई नहीं है ।
जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्याका नित्य पाठ करता है, उसको
नेत्रसम्बन्धी कोई रोग नहीं होता । उसके कुलमे कोई
- तस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषि, गायत्री छन्द ,
सूर्यो देवता, चक्षूरोगनिवृत्तये विनियोग ।
उ० अं० ८१-