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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 730, कुल 832 में से

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पृष्ठ 730

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
ऋग्वेदीय
मुद्गलोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः
श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु ।
तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
प्रथम खण्ड
पुरुषसूक्तका संक्षिप्त विषय-निरूपण
'पुरुषसूक्त'के द्वारा प्रतिपादित अर्थ निर्णयकी व्याख्या इन तीन मन्त्रोंके समुदायद्वारा ही चतुर्व्यूहात्मक
करता हूँ—इसे भगवान् वासुदेवने इन्द्रसे कहा और आगे भगवत्स्वरूपका वर्णन भी है। 'त्रिपाद्' प्रभृति मन्त्रके द्वारा
विवेचन किया। पुरुषसंहितामे पुरुषसूक्तका अर्थ संक्षिप्त रीति- न्तुर्व्यूहके अनिरुद्ध-स्वरूपका वैभव वर्णित है। 'तस्माद्विराळ्०'
से इस प्रकार बताया जाता है— इस मन्त्रद्वारा पादविभूतिरूप नारायणसे श्रीहरिकी स्वरूपभूता
पुरुषसूक्तके 'सहस्रशीर्षा०' इस मन्त्रमे 'सहस्र' शब्द प्रकृति (माया) तथा पुरुष (जीव) की उत्पत्ति प्रदर्शित
अनन्तका वाचक है। इसी प्रकार 'दशाङ्गुलम्' यह पद भी की गयी है। 'यत्पुरुषेण' इत्यादि मन्त्रद्वारा सृष्टिरूप यज्ञ
अनन्त योजनोंका सूचक है। इस पुरुषसूक्तका उक्त 'सहस्र- कहा गया है और 'सप्तास्यासन् परिधय०' मन्त्रमें उस सृष्टि-
शीर्षा०' मन्त्र भगवान् विष्णुके देशगत विभुत्वका वर्णन यज्ञके लिये समिधाका वर्णन हुआ है। यही सृष्टियज्ञ 'तं
करता है, अर्थात् यह बतलाता है कि भगवान् सम्पूर्ण देशोंमें यज्ञमिति' मन्त्रके द्वारा बताया गया है और इस
व्याप्त हैं। दूसरा मन्त्र इन्हीं भगवान् विष्णुकी कालतः व्याप्ति मन्त्रके द्वारा मोक्षका वर्णन भी हुआ है। 'तस्मादिति'
बतलाता है, अर्थात् यह सूचित करता है कि भगवान् विष्णु इत्यादि सात मन्त्रोंमें जगत्‌की सृष्टि कही गयी है। 'वेदाहम्'
सर्वकालव्यापी हैं—सब समय रहते हैं। तीसरा मन्त्र भगवान् इत्यादि दो मन्त्रोंमें श्रीहरिके वैभवका वर्णन किया गया है।
विष्णुके मोक्षप्रदत्वको अर्थात् भगवान् श्रीहरि मोक्षदाता हैं— और 'यज्ञेन०' इस मन्त्रके द्वारा सृष्टि एव मोक्षके वर्णनका
यह बतलाता है। 'एतावानस्य०' इस तीसरे मन्त्रसे श्रीहरिके उपसंहार किया गया है। जो इस प्रकार इस पुरुषसूक्तको जानता
वैभवका वर्णन किया गया है ॥ १–३ ॥ है, वह निश्चय ही मुक्त हो जाता है ॥ ४-९ ॥
द्वितीय खण्ड
महापुरुषका रूप-धारण
इस प्रकार प्रथम खण्डके द्वारा मुद्गलोपनिषद्‌में पुरुष- लिये उस परम रहस्यस्वरूप ज्ञानका पुरुषसूक्तमय दो खण्डों-
सूक्तका जो वैभव प्रतिपादित हुआ है, उसी भगवदीय ज्ञान- के द्वारा उपदेश किया है ॥ १ ॥
का भगवान् वासुदेवने इन्द्रको उपदेश देकर, फिर सूक्ष्मतत्त्व इस पुरुषसूक्तके दो खण्ड कहे जाते हैं। पुरुषसूक्तमें
सुननेके लिये नम्र होकर शरणमें आये हुए उन्हीं इन्द्रके जिस पुरुषका वर्णन है, वह नाम-रूप तथा ज्ञानका