सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 719, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 719
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६५
    शब्दब्रह्म (प्रणव) भी अक्षर है और परब्रह्म भी अक्षर है।
    इनमेंसे जिसके क्षीण होनेपर जो अक्षय बना रहता है, वह (परब्रह्म)
    ही वास्तवमे अक्षर (अविनाशी) है। विद्वान् पुरुष यदि अपने
    लिये शान्ति चाहे तो उस अक्षर परब्रह्मका ही ध्यान करे । दो
    विद्याएँ जाननेयोग्य हैं—एक तो वह, जिसे 'शब्दब्रह्म' कहते
    हैं और दूसरी वह, जो 'परब्रह्म' के नामसे प्रसिद्ध है।
    'शब्दब्रह्म' (वेद-शास्त्रोंके ज्ञान) से पारङ्गत होनेपर मनुष्य
    परब्रह्मको जान लेता है। बुद्धिमान् पुरुष ग्रन्थका अभ्यास
    करके उससे ज्ञान-विज्ञानके तत्त्वको ग्रहण कर ले, फिर समूचे
    ग्रन्थको त्याग दे—ठीक उसी तरह, जैसे धान्य—अन्न चाहने-
    वाला मनुष्य अन्नको तो ले लेता है और पुआलको खलिहानमें
    ही छोड़ देता है। अनेक रंग-रूपोंवाली गौओंका भी दूध
    एक ही रंगका होता है। इसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष विभिन्न
    साम्प्रदायिक चिह्नोंको धारण करनेवाले पुरुषोंके ज्ञानको भी
    गौओंके दूधकी भाँति एक-सा ही देखता है। बाह्य चिह्नोंके
    भेदसे ज्ञानमें कोई अन्तर नहीं आता। जैसे दूधमे घी छिपा
    रहता है, उसी प्रकार प्रत्येक प्राणीके भीतर विज्ञान (चिन्मय
    ब्रह्म) निवास करता है। जिस प्रकार घीके लिये दूधका
    मन्थन किया जाता है, वैसे ही विज्ञानमय ब्रह्मकी प्राप्तिके
    लिये मनको मथानी बनाकर सदा मन्थन (चिन्तन और
    विचार) करते रहना चाहिये। तदनन्तर ज्ञानदृष्टि प्राप्त करके
    अग्निके समान तेजोमय ब्रह्मका इस प्रकार अनुभव करे कि
    'वह कलाशून्य, निर्मल एव शान्त परब्रह्म मैं हूँ।' यही
    विज्ञान माना गया है। जिसमें सम्पूर्ण भूतोंका निवास है,
    जो स्वयं भी सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें निवास करता है तथा
    सबपर अहैतुकी दया करनेके कारण प्रसिद्ध है, वह सर्वात्मा
    वासुदेव मैं हूँ, वह सर्वात्मा वासुदेव मैं हूँ। इस प्रकार यह
    उपनिषद् पूर्ण हुई ॥ १६–२२ ॥
    ॥ कृष्णयजुर्वेदीय ब्रह्मविन्दूपनिषद् समाप्त ॥
    शान्तिपाठ
    ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा
    विद्विषावहै।
    ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
    निश्चयके अनुसार ब्रह्मकी प्राप्ति
    सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्माऽन्तर्हृदय एतद्
    ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माऽऽह शाण्डिल्यः
    शाण्डिल्यः ।
    (३।१४।४)
    शाण्डिल्य ऋषिके ये वचन हैं—जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, समस्त विश्वमें सर्वत्र व्याप्त, वाक्रहित
    ओर संभ्रमशून्य है, वह मेरा आत्मा हृदयमें सदा विराजमान है। यही ब्रह्म है। इस शरीरको छोड़कर जानेपर मैं इसी
    परब्रह्मको प्राप्त हो जाऊँगा। जिसका ऐसा दृढ़ विश्वास है, जिसको इसमें कोई संदेह भी नही है (उसे इसी ब्रह्मकी
    प्राप्ति होती है)।
    उ० अं० ८४-