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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 711, कुल 832 में से

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पृष्ठ 711

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथर्ववेदीय
सीतोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
श्रीसीताजीके स्वरूपका तात्त्विक वर्णन

एक बार देवताओोंने प्रजापति ब्रह्माजीसे पूछा कि 'श्रीसीता-
जी कौन हैं ! उनका क्या स्वरूप है ?' तब उन प्रजापतिने
बतलाया कि “वे शक्तिरूपा ही श्रीसीताजी हैं। मूल प्रकृति-
स्वरूपा होनेके कारण वे सीताजी ही प्रकृति कहलाती हैं।
वे श्रीसीताजी प्रणवकी प्रकृतिस्वरूपा होनेसे भी प्रकृति कही
जाती हैं। 'सीता' यह उनका नामात्मक रूप तीन वर्णोंका
है और वे साक्षात् योगमायास्वरूपा हैं। सम्पूर्ण जगत्-प्रपञ्च-
के भगवान् विष्णु बीज हैं और उनकी योगमाया 'ईकार'
रूपा हैं। 'सकार' सत्य, अमृत, प्राप्ति* नामक ऐश्वर्य अथवा
सिद्धि एवं चन्द्रका वाचक कहा गया है। दीर्घरूप-मात्रायुक्त
'तकार' महालक्ष्मीका स्वरूप, प्रकाशमय एव विस्तारकारी
(जगत्स्रष्टा) कहा गया है। वे 'ईकार'रूपिणी अव्यक्तरूपा
महामाया अपने चन्द्रसन्निभ अमृतमय अवयवों एव दिव्य
अलकार, माला, मुक्तामालादि आभूषणोंसे अलकृत स्वरूपमें
व्यक्त होती हैं। उनके तीन स्वरूप हैं, जिनमें अपने प्रथम
स्वरूपसे वे शब्दब्रह्ममयी हैं। वे बुद्धिरस्वरूपा स्वाध्यायकालमें
प्रसन्न होनेपर बोधको प्रकट करती हैं। अपने दूसरे स्वरूपमें वे
पृथ्वीपर महाराज सीरध्वज जनककी यज्ञभूमिमें हलाग्रसे उत्पन्न
हुईं। अपने तीसरे स्वरूपमें वे 'ईकार' रूपिणी अव्यक्तस्वरूपा
रहती हैं। इन्हीं तीनों रूपोंको सीता कहा जाता है। शौनकीय
तन्त्रमें निम्नलिखित भावके श्लोक मिलते हैं—
“श्रीसीताजी श्रीरामकी नित्य सन्निधिके कारण जगदानन्द-
कारिणी हैं। समस्त शरीरधारियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और
सहार करनेवाली हैं। श्रीसीताजीको मूलप्रकृति कही जाने-
वाली षडैश्वर्यसम्पन्ना भगवती जानना चाहिये। प्रणव-
स्वरूपा होनेके कारण ब्रह्मवादी उन्हें प्रकृति बतलाते हैं।
ब्रह्मसूत्रके 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस सूत्रमें उन्हींका प्रति-
पादन है। वे श्रीसीताजी सर्ववेदमयी, सर्वदेवमयी, सर्वलोक-
मयी, सर्वकीर्तिमयी, सर्वधर्ममयी, सबकी आधारभूता, कार्य
एवं कारणरूपा, चेतन एवं जड दोनोंकी स्वरूपभूता, ब्रह्मा-
जीसे लेकर जड पदार्थोंतककी आत्मभूता, इन सबके गुण
एव कर्मके भेदसे सबकी शरीररूपा, देवता, ऋषि,
मनुष्य एव गन्धर्वोंकी स्वरूपभूता, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत,
पिशाच प्रभृति प्राणियोंकी शरीररूपा; पञ्चमहाभूत, दस
इन्द्रियाँ, मन एवं प्राणरूपा अर्थात् समस्त विश्वरूपा महालक्ष्मी
देवताओंके भी स्वामी भगवान्‌से भिन्न एव अभिन्नस्वरूपा
जानी जाती हैं।
“वे श्रीसीताजी शक्त्यासना—शक्तिस्वरूपा होकर इच्छाशक्ति,
क्रियाशक्ति एव साक्षात् शक्ति—इन तीन रूपोंमें प्रकट होती
हैं। इच्छाशक्तिमय उनका स्वरूप भी त्रिविध होता है—
श्रीदेवी, भूमिदेवी एवं नीलादेवीके रूपमें कल्याणरूपा, प्रभाव

  • अणिमादि अष्टविध ऐश्वर्यमें 'प्राप्ति' नामक सिद्धिका भी
    वर्णन आता है। प्राप्ति कहते हैं सर्वत्र गमनकी शक्तिको।
    उ० अ० ८३—