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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 691, कुल 832 में से

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पृष्ठ 691
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४३
    अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग है। इसी देनेवाली तथा उत्तम बुद्धिवाले क्रियापरायण पुरुषोंको उन-
    मन्त्रके द्वारा अङ्गन्यास करे। का कर्तव्य सुझाती हुई सचेत करनेवाली हैं, उन सरस्वती-
    'अङ्गों और उपाङ्गोंके सहित चारों वेदोंमें जिन एक ही देवीने इस यज्ञको धारण किया है॥४॥
    देवताका स्तुति-गान होता है, जो ब्रह्मकी अद्वैत-शक्ति हैं, 'महो अर्ण'—इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री
    वे सरस्वतीदेवी हमारी रक्षा करें।' छन्द है, सरस्वती देवता हैं, 'सौ'—यह बीज, शक्ति और
    'ह्रीं' आ नो दिवो बृहत पर्वतादा कीलक तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे।
    सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम् । 'जो अन्तर्यामीरूपसे समस्त त्रिलोकीका नियन्त्रण करती
    हवं देवी जुजुषाणा घृताची हैं, जो रुद्र-आदित्य आदि देवताओंके रूपमें स्थित हैं,
    शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥ २ ॥ वे सरस्वतीदेवी हमारी रक्षा करें।'
    ह्रीं-हम लोगोंके द्वारा यष्टव्य सरस्वती देवी प्रकाशमय 'सौ' महो अर्ण सरस्वती प्रचेतयति केतुना। धियो
    द्युलोकसे उतरकर महान् पर्वताकार मेघोंके बीचमें होती हुई विश्वा विराजति ॥ ५ ॥
    हमारे यज्ञमें आगमन करें। हमारी स्तुतिसे प्रसन्न होकर वे सौं —(इस मन्त्रमें नदीरूपा सरस्वतीका स्तवन किया
    देवी स्वेच्छापूर्वक हमारे सम्पूर्ण सुखरूप स्तोत्रोंको सुनें ॥२॥ गया है) नदीरूपमें प्रकट हुई सरस्वतीदेवी अपने प्रवाहरूप
    'पावका न' इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री कर्मके द्वारा अपनी अगाध जलराशिका परिचय देती हैं। और
    छन्द है, सरस्वती देवता है, 'श्रीं' यह बीज, शक्ति और कीलक ये ही अपने देवतारूपसे सब प्रकारकी कर्त्तव्यविषयक बुद्धि-
    तीनों है। इष्टार्थसिद्धिके लिये इस मन्त्रका विनियोग है। मन्त्रके को उद्दीप्त (जाग्रत्) करती हैं ॥ ५ ॥
    द्वारा ही अङ्गन्यास करे। 'चत्वारि वाक्०'—इस मन्त्रके उचथ्यपुत्र दीर्घतमा
    'जो वस्तुतः वर्ण, पद, वाक्य—तथा उनके अर्थोंके ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द है, सरस्वती देवता हैं, ऐं—यह बीज,
    रूपमें सर्वत्र व्याप्त हैं, जिनका आदि और अन्त नहीं है, जो शक्ति और कीलक तीनों है। (इष्टसिद्धिके लिये विनियोग है।)
    अनन्त स्वरूपवाली हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' मन्त्रके द्वारा न्यास करे।
    'श्रीं' पावका न सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु 'जो अन्तर्दृष्टिवाले प्राणियोंके लिये नाना प्रकारके रूपोंमें
    धिया वसु ॥ ३ ॥ व्यक्त होकर अनुभूत हो रही हैं। जो सर्वत्र एकमात्र ज्ञप्ति—
    श्रीं-जो सबको पवित्र करनेवाली, अन्नसे सम्पन्न तथा बोधरूपसे व्याप्त हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।'
    कर्मोंद्वारा प्राप्त होनेवाली धनकी उपलब्धिमें कारण हैं, वे 'ऐं' चत्वारि वाक् परिमिता पदानि
    सरस्वतीदेवी हमारे यज्ञमें पधारनेकी कामना करें (अर्थात् तानि विदुब्राह्मणा ये मनीषिण.।
    यज्ञमें पधारकर उसे पूर्ण करनेमें सहायक बनें ॥ ३ ॥ गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति
    'चोदयित्री०' इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ६ ॥
    छन्द है, सरस्वती देवता है। 'क्लूं'—यह बीज, शक्ति और ऐं—वाणीके चार पद हैं अर्थात् समस्त वाणी चार
    कीलक तीनों है अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये विनियोग है। भागोंमें विभक्त है—परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी ।
    मन्त्रके द्वारा ही न्यास करे। इन सबको मनीषी—विद्वान् ब्राह्मण जानते हैं। इनमेंसे तीन
    'जो अध्यात्म और अधिदैवरूपा है तथा जो देवताओं- —परा, पश्यन्ती और मध्यमा तो हृदयगुहामे स्थित हैं;
    की सम्यक् ईश्वरी अर्थात् प्रेरणात्मिका शक्ति हैं, जो हमारे अत वे बाहर प्रकट नहीं होतीं। परन्तु जो चौथी वाणी वैखरी
    भीतर मध्यमा वाणीके रूपमें स्थित हैं, वे सरस्वती- है, उसे ही मनुष्य बोलते हैं। (इस प्रकार यहाँ वाणीरूपमें
    देवी मेरी रक्षा करें।' सरस्वतीदेवीकी स्तुति है) ॥ ६ ॥
    'क्लूं' चोदयित्री सूनृताना चेतन्ती सुमतीना यज्ञ दधे 'यद्वाग्वदन्ति०' इस मन्त्रके भार्गव ऋषि हैं, त्रिष्टुप्
    सरस्वती ॥ ४ ॥ छन्द है, सरस्वती देवता हैं। ह्रीं—यह बीज, शक्ति और
    क्लूं-जो प्रिय एवं सत्य वचन बोलनेके लिये प्रेरणा कीलक तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे।