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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 681, कुल 832 में से

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पृष्ठ 681
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३३
    भोगोंको भोगता हुआ परितृप्ति लाभ करता है। वही जीव
    स्वप्नावस्थामें अपनी मायासे कल्पित जीवलोकमें सुख-दुःखका
    भोक्ता बनता है और सुषुप्तिकालमें सारे मायिक प्रपञ्चके
    विलीन होनेपर वह तमोगुणसे अभिभूत होकर सुख-स्वरूपको
    प्राप्त होता है। पुनः जन्मान्तरोंके कर्मोंकी प्रेरणासे वह जीव
    सुषुप्तिसे स्वप्न-जगत्में उतरता है और उसके बाद जाग्रत्-
    अवस्थामें आता है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और -कारण-
    शरीररूपी तीन पुरोंमें जो जीव क्रीडा करता है, उसीसे यह
    सारा प्रपञ्च-वैचित्र्य उत्पन्न होता है॥ ८-१४॥
    'इस समस्त प्रपञ्चका आधार आनन्दस्वरूप अखण्ड
    बोध है- जिसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीररूपी तीनों
    पुर लयको प्राप्त होते हैं। इसीसे प्राण उत्पन्न होता है, मन
    और सारी इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, आकाश, वायु, अग्नि,
    जल और सारे विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वी उत्पन्न होती
    है। जो परब्रह्म सबका आत्मा है, समस्त कार्य-कारणरूप
    विश्वका महान् आयतन अर्थात् आधार है, जो सूक्ष्म-से-सूक्ष्म
    है, अविनाशी है, वह तुम्हीं हो, तुम वही हो। जाग्रत, स्वप्न
    और सुषुप्ति आदि जो प्रपञ्च भासमान है, वह ब्रह्म-
    स्वरूप है और वही मैं हूँ- यों जानकर जीव सारे बन्धनोंसे
    मुक्त हो जाता है। तीनों धाम अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और
    सुषुप्तिमें जो कुछ भोक्ता, भोग्य और भोग हैं, उनसे
    विलक्षण साक्षी, चिन्मात्रस्वरूप, सदाशिव मैं हूँ। मुझमे ही
    सब कुछ उत्पन्न हुआ है, मुझमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, मुझमें
    ही सब लयको प्राप्त होता है, वह अद्वय ब्रह्मस्वरूप मैं ही हूँ।
    मैं अणुसे भी अणु हूँ, इसी प्रकार मैं महान्‌से भी महान् हूँ;
    यह विचित्र विश्व मेरा ही स्वरूप है। मैं पुरातन पुरुष हूँ, मैं
    ईश्वर हूँ, मैं हिरण्मय पुरुष ब्रह्मा हूँ, मैं शिवस्वरूप हूँ।
    वह पाणि पाद-विहीन, अचिन्त्यशक्ति परब्रह्म मैं हूँ। मैं
    नेत्रोंके बिना देखता हूँ, कानोंके बिना सुनता हूँ, बुद्धि आदिसे
    पृथक् होकर मैं ही जानता हूँ, मुझको जाननेवाला कोई नहीं
    है, मैं सदा चित्स्वरूप हूँ। समस्त वेद मेरा ही ज्ञान कराते
    हैं, मैं ही वेदान्तका कर्त्ता हूँ, वेदवेत्ता भी मैं ही हूँ। मुझे
    पुण्य-पाप नहीं लगते, मेरा कभी नाश नहीं होता और न
    जन्म ही होता है। और न मेरे शरीर, मन-बुद्धि और इन्द्रियाँ
    ही हैं। मेरे लिये न भूमि है न जल है, न अग्नि है, न वायु
    और न आकाश ही है।' जो इस प्रकार गुहा-बुद्धिके गह्वरमें
    स्थित, निष्कल (अवयवहीन) और अद्वितीय, सदसत्‌से परे
    सबके साक्षी मेरे परमात्मस्वरूपको जानता है, वह शुद्ध
    परमात्मस्वरूपको प्राप्त होता है। जो शतरुद्रियका पाठ करता
    है, वह अग्निपूत होता है, वायुपूत होता है, आत्मपूत
    होता है, सुरापानके दोषसे छूट जाता है, ब्रह्महत्याके दोषसे
    मुक्त हो जाता है, वह स्वर्णकी चोरीके पापसे छूट जाता है,
    वह शुभाशुभ कर्मोंसे उद्धार पाता है, भगवान् सदाशिवके
    आश्रित हो जाता है तथा अविमुक्तस्वरूप हो जाता है। अतएव
    जो आश्रमसे अतीत हो गये हैं, उन परमहंसोंको सदा-सर्वदा
    अथवा कम-से-कम एक बार इसका पाठ अवश्य करना चाहिये।
    इससे उस ज्ञानकी प्राप्ति होती है, जो भवसागरका नाश कर देता
    है। इसलिये इसको इस प्रकार जानकर मनुष्य कैवल्यरूप
    मुक्तिको प्राप्त होता है, कैवल्य पदको प्राप्त होता है॥ १५-२५॥
    ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कैवल्योपनिषद् समाप्त ॥
    शान्तिपाठ
    ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा
    विद्विषावहै ।
    ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
    ज्ञानमयी दृष्टि
    'दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् ।'
    'दृष्टिको ज्ञान (ब्रह्म) मयी करके जगत्‌को ब्रह्ममय देखे ।'
    उ० अ० ८०-