कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 679, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंༀ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ༀ ६३१
(जुड़वाँ) संतान उत्पन्न होती है। पञ्चभूतात्मक शरीरके
समर्थ—स्वस्थ होनेपर चेतनामें पञ्च ज्ञानेन्द्रियात्मक बुद्धि
होती है, उससे गन्ध, रस आदिके ज्ञान होते हैं। वह
अविनाशी अक्षर ॐकारका चिन्तन करता है, तब
इस एकाक्षरको जानकर उसी चेतनके शरीरमें आठ
प्रकृतियाँ (प्रकृति, महत्-तत्त्व, अहङ्कार और पाँच तन्मात्राएँ)
तथा सोलह विकार (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच
स्थूल भूत तथा मन) होते हैं। पश्चात् माताका खाया हुआ अन्न
एव पिया हुआ जल नाड़ियोंके सूत्रोंद्वारा पहुँचाया जाकर
गर्भस्थ शिशुके प्राणोंको तृप्त करता है। तदनन्तर नवें महीने
वह ज्ञानेन्द्रिय आदि सभी लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है। तब
वह पूर्व-जन्मका स्मरण करता है। उसके शुभ-अशुभ कर्म
भी उसके सामने आ जाते हैं ॥ ३ ॥
तब जीव सोचने लगता है—'मैंने सहस्रो पूर्व-जन्मोंको
देखा, उनमें नाना प्रकारके भोजन किये, नाना प्रकारके—
नाना योनियोंके स्तनोंका पान किया। मैं बारवार उत्पन्न हुआ,
मृत्युको प्राप्त हुआ। अपने परिवारवालोंके लिये जो मैंने
शुभाशुभ कर्म किये, उनको सोचकर मैं आज यहाँ अकेला
दग्ध हो रहा हूँ। उनके भोगोंको भोगनेवाले तो चले गये,
मैं यहाँ दुःखके समुद्रमें पड़ा कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ।
यदि इस योनिसे मैं छूट जाऊँगा—इस गर्भके बाहर निकल
गया तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले तथा मुक्तिरूप फल
को प्रदान करनेवाले महेश्वरके चरणोंका आश्रय लूँगा। यदि
मे योनिसे छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले
और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणकी
शरण ग्रहण करूँगा। यदि मैं योनिसे छूट जाऊँगा तो अशुभ
कर्मोंका नाश करनेवाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले
सांख्य और योगका अभ्यास करूँगा। यदि मैं इस बार योनिसे
छूट गया तो मैं ब्रह्मका ध्यान करूँगा।' पश्चात् वह योनिद्वार-
को प्राप्त होकर योनिरूप यन्त्रमें दबाया जाकर बड़े कष्टसे जन्म
ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वैष्णवी वायु (माया) के
स्पर्शसे वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओंको भूल जाता
है और शुभाशुभ कर्म भी उसके सामनेसे हट जाते हैं ॥ ४ ॥
देह-पिण्डका 'शरीर' नाम कैसे होता है? इसलिये कि
ज्ञानाग्नि, दर्शनाग्नि तथा जठराग्निके रूपमें अग्नि इसमें आश्रय
लेता है। इनमें जठराग्नि वह है, जो खाये, पिये, चाटे और
चूसे हुए पदार्थोंको पचाता है। दर्शनाग्नि वह है, जो रूपोंको
दिखलाता है, ज्ञानाग्नि शुभाशुभ कर्मोंको सामने खड़ा कर
देता है। अग्निके शरीरमें तीन स्थान होते हैं—आह्वनीय
अग्नि मुखमें रहता है, गार्हपत्य अग्नि उदरमें रहता है, और
दक्षिणाग्नि हृदयमे रहता है। आत्मा यजमान है, मन ब्रह्मा है,
लोभादि पशु है, धैर्य और सतोष दीक्षाएँ हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ यज्ञ-
के पात्र हैं, कर्मेन्द्रियाँ हवि (होम करनेकी सामग्री) है, सिर
कपाल है, केश दर्भ हैं, मुख अन्तर्वेदिक़ा है, सिर चतुष्कपाल
है, पार्श्वकी दन्तपक्तियाँ षोडश कपाल हैं, एक सौ सात
मर्मस्थान हैं, एक सौ अस्सी संधियाँ हैं, एक सौ नौ स्नायु हैं,
सात सौ शिराएँ हैं, पाँच सौ मज्जाएँ हैं, तीन सौ साठ अस्थियाँ
हैं, साढे चार करोड़ रोम है, आठ पल (तोले) हृदय है,
द्वादश पल (बारह तोला) जिह्वा है, प्रस्थमात्र (एक सेर)
पित्त, आढकमात्र (ढाई सेर) कफ, कुडवमात्र (पावभर)
शुक्र तथा दो प्रस्थ (दो सेर) मेद है, इसके अतिरिक्त
शरीरमे आहारके परिमाणसे मल-मूत्रका परिमाण अनियमित
होता है। यह पिप्पलाद ऋषिके द्वारा प्रकटित मोक्षशास्त्र है,
पैप्पलाद मोक्षशास्त्र है ॥ ५ ॥
॥ गर्भोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!