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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 651, कुल 832 में से

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पृष्ठ 651

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥
सामवेदीय
महोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं
माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य
उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
प्रथम अध्याय
सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन
अब यहाँपे महोपनिषद्का व्याख्यान किया जाता है।
उस समय निश्चयपूर्वक एक नारायण थे; न ब्रह्मा थे न रुद्र,
न जल था न अग्नि और न सोम थे, न ये द्युलोक और
भूलोक थे, न नक्षत्र थे और न सूर्य थे, न चन्द्रमा ही थे।
उन्होंने एकाकी रहना पसंद नहीं किया। उन परम पुरुषका
अन्तःस्थ सङ्कल्परूपी व्यान यज्ञस्तोम (महान् यज्ञ) कहलाया।
उससे उत्पन्न हुए चौदह पुरुष और एक कन्या। दस इन्द्रिय,
ग्यारहवाँ तेजस्वी मन, बारहवाँ अहङ्कार, तेरहवाँ प्राण तथा
चौदहवाँ आत्मा—ये ही चौदह पुरुष हैं और पन्द्रहवीं बुद्धि
ही कन्या है। इनके अतिरिक्त पाँच सूक्ष्मभूतरूपी तन्मात्राएँ
तथा पाँच महाभूत—इन पचीस तत्त्वोंका एक पुरुष (विराट्
शरीर) बना। उसमें विराट् पुरुषने प्रवेश किया। इन पचीस
तत्त्वोंवाले पुरुषसे प्रधान संवत्सर नहीं उत्पन्न होते। कालरूपी
संवत्सरसे ही इस पुरुषके संवत्सर उत्पन्न हुए।
पश्चात् उन प्रसिद्ध नारायणने अन्य कामनासे मनमें ध्यान
किया, उन अन्त.स्थ ध्यान करनेवालेके ललाटसे तीन नेत्रोंवाला,
हाथमें त्रिशूल लिये हुए पुरुष उत्पन्न हुआ। उस श्रीसम्पन्न
पुरुषके अङ्गमें यश, सत्य, ब्रह्मचर्य, तप, वैराग्य, स्वाधीन मन,
ऐश्वर्य और प्रणवके साथ व्याहृतियाँ, ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद और अथर्ववेद तथा सारे छन्द समाश्रित थे। इसी हेतु
वह महान् देवता 'ईशान' और 'महादेव' कहलाया।
पश्चात् पुनः नारायणने अन्य कामनासे मनमें ध्यान
किया। उन अन्त'स्थ ध्यानीके ललाटसे स्वेद गिरा, वह पसीना
फैलकर जल बन गया। उस जलसे हिरण्यमय तेजके रूपमें अण्ड
उत्पन्न हुआ, उससे चतुर्मुख ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। उन्होंने ध्यान
किया। पूर्व दिशाकी ओर मुख करके भूः व्याहृति, गायत्री
छन्द, ऋग्वेद एवं अग्नि देवताका ध्यान किया। पश्चिमकी ओर
मुख करके भुवः व्याहृति, त्रिष्टुप् छन्द, यजुर्वेद एवं वायु
देवताका ध्यान किया। उत्तरकी ओर मुख करके स्वः व्याहृति,
जगती छन्द, सामवेद एवं सूर्य देवताका ध्यान किया। दक्षिणकी
ओर मुँह करके महः व्याहृति, अनुष्टुप् छन्द, अथर्ववेद,
तथा सोम देवताका ध्यान किया।
सहस्रों सिरवाले देवताका, जिनके सहस्रों नेत्र हैं, जो
सब प्रकारके कल्याणके हेतु हैं, जो सर्वतः व्याप्त हैं, परात्पर हैं,
नित्य हैं, सर्वरूप हैं—उन हरि नारायणका ब्रह्माने ध्यान किया।
ये परम पुरुष ही विश्वरूप हैं; इन पुरुषपर ही विश्वका जीवन
अवलम्बित है, उन विश्वके स्वामी, विश्वरूप, विश्वेश्वरको—
क्षीरसागरमें शयन करनेवाले देवताको ब्रह्माने ध्यानमें देखा।
पद्मकोशके समान, सम्यक्रूपसे कोशके आकारमें लम्बाय-
मान अधोमुख जो हृदय है, जिससे निरन्तर सीत्कार-शब्द निकल
रहा है, उसके मध्यमें एक महान् ज्वाला प्रज्वलित हो रही
है, जो विश्वको प्रकाशित करनेवाली दीपशिखाके समान दसों
दिशाओंमें प्रकाश वितरण करती है, उस ज्वालके मध्यमें
थोड़ी दूर ऊपर उठी हुई एक पतली वह्निशिखा व्यवस्थित है।
उस शिखाके बीचमें परमात्माका निवास है, वे ही ब्रह्मा हैं,
वे ही ईशान हैं, वे ही इन्द्र हैं, वे ही अक्षर परम स्वराट् हैं।
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥