कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 649, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६०१
भिन्न नहीं है।' तब देवताओंने कहा- भगवन् ! अभी पुनः
उपदेश कीजिये। प्रजापतिने कहा- 'तुम स्वयं ही आत्मा
हो। तुमसे पृथक् द्वैतका कहीं दर्शन नहीं होता। यदि तुम्हें
द्वैत दिखायी देता है तो तुम आत्मज्ञ नहीं हो; क्योंकि यह
आत्मा असङ्ग है। (जो असङ्ग है, उसका द्वैतके साथ सम्बन्ध
न होनेके कारण उसे द्वैतका दर्शन भी नहीं हो सकता।)
तुम अपनेको-आत्माको द्वैतदर्शी मानते हो, इसलिये तुम्हें
आत्माका ज्ञान नहीं है।'
अतः तुम्हीं लोग स्वप्रकाश आत्मा हो-तुम स्वयं ही
द्वैतरूपमें भासित होते हो, वास्तवमें अद्वैत आत्मा ही हो।
यह जो कुछ दिखायी देता है, सब सत्वरूप आत्मा ही है,
क्योंकि सब कुछ संवित् (ज्ञान)-स्वरूप है। इसलिये
तुम्हीं सत् एव संविद्रूप आत्मा हो (किंतु इस समय ससङ्ग
हो रहे हो-मिथ्या द्वैतके प्रति तुम्हारे मनमे आसक्ति हो
रही है)। यह सुनकर वे प्रसिद्ध देवता बोले- 'नहीं, ऐसी
बात नहीं है। अहो ! हम तो असङ्ग ही हैं-हमारी कहीं
भी आसक्ति नहीं है।' तब उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा-
'यदि तुम असङ्ग हो तो तुम्हे द्वैत कैसे दिखायी देता है?'
देवता बोले- 'हम नहीं जानते कैसे हमे द्वैत दिखायी देता
है।' 'तब तो तुम स्वय ही द्वैतरूपमें प्रकाशित हो रहे हो।
(क्योंकि असङ्ग होनेके कारण आत्माको अपनेसे भिन्न किसी
द्वैतका दर्शन नहीं हो सकता। जो कुछ दिखायी देता है,
वह आत्मामें ही अध्यस्त है, अतः उससे भिन्न नहीं है)'
-यों निश्चयपूर्वक प्रजापतिने कहा । (यदि आपने हमें
ससङ्ग, सत्-संविद्रूप बताया है तो ससङ्ग, सत् और संवित्
असङ्ग आत्माके लक्षण कैसे हो सकते हैं? ऐसी शङ्का होने-
पर कहते हैं-) 'तुम ससङ्ग, सत्विद्रूप नहीं हो, (तब
आपने हमें सत् और संवित्-स्वरूप बताया क्यों ?' देवताओं-
के इस प्रश्नपर प्रजापति बोले- 'हमने सत् और संवित्के
लक्ष्यभूत आत्मस्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये ही तुम्हें
सत् और संवित् बताया है।) सत् और संवित्-ये दोनों
शब्द उसी आत्मतत्त्वको लक्ष्य कराते हैं, जो सृष्टिके पहलेसे
ही भलीभाँति प्रकाशित है। वह अव्यवहार्य (व्यवहारमें न
ला सकने योग्य) होता हुआ ही अद्वितीय है। देवताओ !
क्या अब भी तुमने आत्माको समझा ?' देवता बोले-'हाँ,
भलीभाँति समझ लिया, आत्मा विदित और अविदित-
दोनोंसे परे है । (मन-बुद्धिका विषय न होनेके कारण तो
वह विदितसे परे है और स्वप्रकाश, चिन्मय होनेके कारण
अविदितसे परे है।) तब उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा-
वही यह अद्वय ब्रह्म है। वह बृहत् (महान्से भी महान् )
होनेके कारण नित्य है, शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वरूप है, सत्य, सूक्ष्म,
सब ओरसे पूर्ण, द्वैतरहित, सत्यस्वरूप, आनन्दरूप तथा
चिन्मात्र आत्मा ही है। किसी भी दूसरेके द्वारा वह व्यवहार्य
(वाच्य) नहीं है।
"यद्यपि आत्माको दृष्टि आदिका विषय न होनेके कारण
तुम देख नहीं पाते, तथापि इस ब्रह्मको, जो प्रणवका वाच्यार्थ
होनेके कारण प्रणवरूप ही है, अपने आत्मरूपमें देखो ।
वही यह सत्य है। आत्मा ब्रह्म ही है और ब्रह्म आत्मा ही
है। निश्चय ही इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये।
हाँ, अवश्य ही यह सत्य है। इस सत्यको विवेकशील विद्वान्
ही देख पाते हैं। यह ब्रह्म या आत्मतत्त्व न शब्द है न
स्पर्श है, न रूप है न रस है, और न गन्ध ही है। न वाणी-
द्वारा बोलनेयोग्य है और न हाथसे ग्रहण करनेयोग्य ।
वह पैरोंसे पहुँचनेयोग्य स्थान भी नहीं है। गुदाद्वारा त्यागने
अथवा उपस्थ इन्द्रियद्वारा विषयानन्दके रूपमें अनुभव करने-
योग्य भी नहीं है । मनसे मनन करनेयोग्य और बुद्धिसे
जाननेयोग्य भी नहीं है। अहङ्कारका और चित्तका भी विषय
नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान-इन
पाँचों प्राणोंका भी विषय नहीं है। वह न इन्द्रियरूप है न
विषयरूप । उसके न करण हैं न लक्षण है। वह असङ्ग,
निर्गुण, निर्विकार, अनिर्देश्य, सत्त्व, रज एव तमोगुणसे रहित
तथा मायासे शून्य है। वह उपनिषदोंके द्वारा ही लक्षणासे
जाननेयोग्य है । भलीभाँति प्रकाशित है । सदा एकरस
प्रकाशमय है। इस सम्पूर्ण कार्य-कारणमय जगत्के पहलेसे
ही भलीभाँति प्रकाशित है। उस अद्वय तत्त्वको 'मैं वह हूँ
और वह मेरा स्वरूप है' इस प्रकार देखो।" योँ कहकर वे
प्रसिद्ध प्रजापति बोले- देवताओ ! क्या इस आत्माको तुमने
देखा अथवा नहीं देखा ? देवताओने कहा- 'देखा, वह
विदित और अविदितसे परे है। अहो ! यह माया कहाँ चली
गयी ? और कैसे इस स्वप्रकाश आत्मामें पहले रह सकी ?'
प्रजापतिने कहा- उससे क्या ? (क्या इस बातको न जानने-
से तुमसे कोई न्यूनता आ जाती है?) नहीं, कुछ भी
नहीं-देवताओने कहा । प्रजापति बोले- 'इस मायाके लिये
आश्चर्य करनेकी आवश्यकता नहीं, तुम स्वयं ही आश्चर्यस्वरूप
हो। (क्योंकि तुम्हारे ही आश्रित रहकर माया विचित्र कार्य
करनेकी शक्ति पाती है।) परंतु वास्तवमें तुम भी आश्चर्य-