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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 626, कुल 832 में से

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पृष्ठ 626

५७८ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ५

अरोंकी तुलना होती है। (इसके बत्तीस दलोंमें अनुष्टुप्की
भावना करे।) यह चक्र भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित
है। अरोंसे ही यह पूर्णतः आवृद्ध है । वेद ही इसके अरे हैं।
पत्तोंसे ही यह सब ओर घूमता है। छन्द ही इसके पत्ते हैं ॥ १ ॥

यह बत्तीस दलोंसे सम्पन्न महाचक्र ही सुदर्शन नामसे
विख्यात है। इसके मध्यभागमें स्थित जो नाभिस्थान है, उसमें
नृसिंह देवता-सम्बन्धी अविनाशी तारक-मन्त्रका न्यास करे। वह
तारक-मन्त्र एक अक्षरका-ॐ है। छः पत्रोंमें छः अक्षरोंवाले
'सहस्रार हुं फट्' इस सुदर्शन मन्त्रका न्यास होता है। आठ दलोंमें
आठ अक्षरोंवाले 'ॐ नमो नारायणाय' इस नारायण-मन्त्रका
न्यास होता है। बारह दलोंमें द्वादशाक्षर वासुदेव मन्त्र ( ॐ
नमो भगवते वासुदेवाय ) का न्यास किया जाता है। सोलह
दलोंमें वर्णमालाके आदि सोलह अक्षर, जो बिन्दुयुक्त सोलह
स्वर-वर्णोंके रूपमें हैं, रक्खे जाते हैं। बत्तीस दलोंमें बत्तीस
अक्षरोंके नृसिंह-देवतासम्बन्धी मन्त्रराज आनुष्टुभका न्यास
किया जाता है । ( एक एक दलमें मूल मन्त्रके एक एक
अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके रक्खा जाता है।) यही यह
सुदर्शन नामसे प्रसिद्ध महाचक्र है, जो सब कामनाओंको पूर्ण
करनेवाला, मोक्षका द्वार, ऋक्, यजुः और सामवेदस्वरूप
तथा ब्रह्ममय एवं अमृतमय है । उसके पूर्वभागमें आठ
वसुगण रहते हैं । दक्षिणभागमें ग्यारह रुद्र, पश्चिमभागमें
बारह आदित्य, उत्तरभागमें विश्वेदेव, नाभिमें ब्रह्मा, विष्णु
तथा महादेवजी एवं पार्श्वभागमें सूर्य और चन्द्रमा हैं।

यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है- 'अविनाशी परम
आकाशस्वरूप भगवान् नृसिंहमें (तथा उनके इस सुदर्शन
महाचक्रमें) ही ऋक् आदि सम्पूर्ण वेद प्रतिष्ठित हैं। उनमें
ही सम्पूर्ण देवता निवास करते हैं। जो उन परमात्मा नृसिंह-
देव तथा उनके महाचक्रको नहीं जानता, वह ऋग्वेद पढ़कर
क्या करेगा ? उसका वेदाध्ययन व्यर्थ है। और जो उन
भगवान् नृसिंहदेव तथा उनके सुदर्शन महाचक्रको जानते हैं,
वे ही उपासक भगवान्‌में उत्तम स्थितिको प्राप्त करते हैं।' इस
सुदर्शन नामक महाचक्रको जो बालक अथवा युवा होकर भी
जान लेता है, वह महान् बन जाता है, वह सबका गुरु है।
वह सब मन्त्रोंका उपदेशक हो जाता है। मन्त्रराज अनुष्टुप्‌से
होम करे । अनुष्टुप्-मन्त्रसे ही पूजन करे। यह सुदर्शन महा-
चक्र राक्षसजनित भयका नाश करनेवाला है, मृत्युसे तारने-
वाला है। इसे यन्त्ररूपसे गुरुद्वारा प्राप्त करके कण्ठमें, बाँह में
अथवा शिखामें बाँध ले । इस मन्त्रके उपदेशक गुरुको सात
द्वीपोंवाली समूची पृथ्वी भी दक्षिणारूपमें दे दी जाय तो उसके
लिये यह पर्याप्त नहीं है। अर्थात् उस मन्त्रकी महिमाके समक्ष सम्पूर्ण पृथ्वीका दान भी तुच्छ है । अतएव श्रद्धा और
शक्तिके अनुसार जो कुछ भी हो सके, थोड़ी बहुत भूमि दान
करनी चाहिये, वही दक्षिणा होती है ॥ २ ॥

उन प्रसिद्ध देवताओंने पुनः प्रजापतिसे श्रद्धापूर्वक पूछा-
'भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज नारसिंहका क्या फल है, यह
हमें बताइये ।'

यह सुनकर उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा-जो
इस नारसिंह मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह
मानो अग्निमें तपाया जाकर शुद्ध हो जाता है। वह वायुपूत
होता है। वह सूर्य और चन्द्रमाद्वारा शुद्ध कर दिया जाता
है। वह सत्यपूत होता है; वह लोकपूत होता है, वह ब्रह्मा,
विष्णु, रुद्र तथा समस्त वेदोंद्वारा पवित्र कर दिया जाता है।

सारांश यह कि वह सबके द्वारा सर्वथा पवित्र कर दिया
जाता है ॥ ३ ॥

जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य
जप करता है, वह मृत्युको पार कर जाता है। वह पापसे तर
जाता है। वह ब्रह्महत्याको पार कर जाता है। वह भ्रूणहत्यासे
तर जाता है। वह वीरहत्यासे तर जाता है। वह सबकी हत्यासे
तर जाता है। वह जन्म-मृत्युरूप संसारको पार कर जाता है।
वह सबको पार कर जाता है। वह सबको पार कर जाता है ॥४॥

जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य
जप करता है, वह अग्निकी गतिको रोक देता है, वह वायुकी
गतिको रोक देता है, वह सूर्यकी गतिको रोक देता है, वह
चन्द्रमाकी गतिको रोक देता है, वह जलके प्रवाह को रोक देता
है, वह सम्पूर्ण देवताओंको स्तब्ध कर देता है, वह सम्पूर्ण ग्रहोंकी
गतिको रोक देता है तथा वह विषका भी स्तम्भन कर देता है॥५॥

जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य
जप करता है, वह देवताओंका आकर्षण कर लेता है। वह
यक्षोंको भी अपने पास खींच लेता है। वह नागोंका आकर्षण
कर लेता है। वह ग्रहोंको अपने समीप आकृष्ट कर लेता है।
वह मनुष्योंको भी आकृष्ट कर लेता है। वह सबको आकृष्ट
कर लेता है। वह सबको आकृष्ट कर लेता है ॥ ६ ॥

जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका
नित्य जप करता है, वह भूलोकको जीत लेता है, वह
भुवर्लोकको जीत लेता है, वह स्वर्गलोकको जीत लेता है,
वह महर्लोकको जीत लेता है, वह जनलोकको जीत लेता है,
वह तपोलोकको जीत लेता है, वह सत्यलोकको जीत लेता
है, वह सब लोकोंको जीत लेता है, वह सब लोकोंको जीत
लेता है ॥ ७ ॥

जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका