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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 832 में से

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पृष्ठ 619

उपनिषद् ४ ] : महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७३
तृतीय उपनिषद्
मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति तथा बीज
कहते हैं, देवताओंने जिज्ञासापूर्वक प्रजापतिसे कहा-
भगवन् ! भगवान् नृसिंहके मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति
और बीज क्या हैं, यह हमे बताइये।'
तब उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा-भगवान् नृसिंहकी
शक्तिभूता जो यह माया है, निश्चय वही इस सम्पूर्ण जगत्‌की
रचना करती है, इस सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करती है तथा इस
सम्पूर्ण जगत्‌का सहार करती है। अतः इस मायाको ही शक्ति
जाने। जो इस मायारूप शक्तिको जानता है, वह पापसे तर
जाता है, वह मृत्युसे पार हो जाता है, वह ससारसे भी तर
जाता है तथा वह अमृतत्वको भी प्राप्त कर लेता है। इस
लोकमें वह महती समृद्धि प्राप्त करता है।
ब्रह्मवादी विचार करते हैं कि यह माया शक्ति ह्रस्व है
या दीर्घ है अथवा प्लुत है ? यदि ह्रस्व है तो इसे इस रूपमे
जाननेसे यह सम्पूर्ण पापोंको दग्ध कर देती है और उपासक
अमृतत्वको प्राप्त होता है। यदि दीर्घ है तो इसे इस रूपमें
जाननेसे साधक महान् ऐश्वर्यको प्राप्त होता है और अमृतत्व
को भी प्राप्त कर लेता है। यदि यह प्लुत है तो इसे इस रूपमे
जाननेसे मनुष्य ज्ञानवान् होता है और अमृतत्वको भी प्राप्त
हो जाता है। इस विषयमें ऋषिने यह उदाहरण प्रस्तुत किया
है-'हे मायाशक्तिरूप बिन्दुयुक्त स्वर ! मैं सरलभावका
इच्छुक तथा ससार-सिन्धुसे तरनेके लिये प्रयत्नशील होकर
साधनके लिये उपयोगी दीर्घ आयु प्राप्त करनेके उद्देश्यसे भगवान्
विष्णुकी शक्ति श्रीदेवीकी, श्रीलक्ष्मीजीकी ( जो नृसिंहदेवकी
शक्ति हैं), शङ्करजीकी शक्ति पर्वतराजपुत्री अम्बिकाकी,
ब्रह्माजीकी शक्ति सरस्वतीदेवीकी, षष्ठीदेवी (स्कन्दशक्ति)-
की, इन्द्रसेना नामसे प्रसिद्ध इन्द्रशक्तिकी तथा ब्रह्मप्राप्तिकी
कारणभूता एव साकाररूपमें प्रकट हुई विद्या-शक्तिकी शरण
लेता हूँ। आप उपर्युक्त शक्तियोंकी तथा मुझ उपासककी
रक्षा करें।'
निश्चय ही सम्पूर्ण भूतोंका यह आकाश ही परम आधार
है। ये सम्पूर्ण भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न
होनेपर आकाशसे ही जीवन धारण करते है तथा मृत्यु होनेपर
आकाशमें ही लीन हो जाते हैं, इसलिये आकाशको ही बीज-
सबका मूल कारण जाने। इस विषयमें ऋषि (मन्त्र) ने
यह दृष्टान्त रक्खा है-'विशुद्ध परम धाममे अथवा बुद्धिमे
रहनेवाले जो स्वयम्प्रकाश पुरुषोत्तम हैं, वे ही अन्तरिक्ष-
निवासी वसु हैं, घरोंमे उपस्थित होनेवाले अतिथि हैं, यज्ञकी
वेदीपर स्थापित होनेवाले अग्निदेव तथा उनमें आहुति डालने-
वाले होता भी वे ही हैं, समस्त मनुष्योंमें अर्थात् भूलोकमें,
उससे श्रेष्ठ स्वर्गलोकमे तथा सर्वश्रेष्ठ सत्यलोकमें भी उन्हीं-
का निवास है। वे ही आकाशमें रहनेवाले हैं। जल, पृथ्वी,
सत्कर्म तथा पर्वतोंमें प्रकट होनेवाले भी वे ही हैं, वे ही सबसे
महान् परम सत्य हैं।' जो इस प्रकार जानता है, वह भी
पूर्वोक्त फलका भागी होता है। यह महोपनिषद् है।
चतुर्थ उपनिषद्
मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत मन्त्र, प्रणव वाच्यरूप भगवान् नृसिंहदेवके चार पाद, स्तुतिके मन्त्र
उन प्रसिद्ध देवताओंने प्रजापति ब्रह्माजीसे जिज्ञासापूर्वक
कहा-'भगवन् ! नृसिंहदेवके मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत
मन्त्रोंका हमारे लिये वर्णन कीजिये।'
यह सुनकर वे सुप्रसिद्ध प्रजापति बोले-प्रणव (ॐकार),
गायत्री, यजुलैक्ष्मी तथा नृसिंहगायत्री-ये इस मन्त्रराजके
अङ्गभूत मन्त्र हैं। इन सबको जानना चाहिये। जो जानता है,
वह (लौकिक लाभके साथ ही) अमृतत्वको भी प्राप्त
करता है ॥ १॥
'ॐ' यह अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है। यह
दृश्यमान सम्पूर्ण जगत् इस परमात्मस्वरूप ॐकारकी ही
उपव्याख्या-महिमाका विस्तार है । भूत, वर्तमान और
भविष्य-इन तीनों कालोंसे सम्बन्ध रखनेवाला सब कुछ
ॐकार ही है। तथा उपर्युक्त तीनों कालोंसे अतीत जो
कोई दूसरा तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है। निश्चय ही यह
सब कुछ ब्रह्म है। ये परमात्मा (भगवान् नृसिंहदेव) ब्रह्म
हैं। उन सर्वात्मा श्रीनृसिंहदेवके चार पाद हैं। उनके