कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 610, कुल 832 में से
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* गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् *
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लाञ्छन अर्थात् चन्द्राकृति रोम पङ्क्तिके चिह्नसे युक्त है,
इसलिये ब्रह्मवादीजन उसे श्रीवत्स लाञ्छन कहते हैं।
भगवत्स्वरूपभृत जिस तेजसे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि तथा वाक्
आदि तेज भी प्रकाश प्राप्त करते हैं, उस चिन्मय आलोक-
को परमेश्वरके भक्तजन कौस्तुभमणि कहते हैं। सत्त्व, रज,
तम और अहङ्कार—ये ही मेरी चार भुजाएँ हैं। मेरे
रजोगुणमय हाथमे पञ्चभूतात्मक पाञ्चजन्य नामक शङ्ख
स्थित है। अत्यन्त चञ्चल समष्टि-मन ही मेरे हाथमे चक्र
कहलाता है, आदिमाया ही शार्ङ्ग नामक धनुष है तथा
सम्पूर्ण विश्व ही कमलरूपसे मेरे हाथमे विराजमान है। आदि-
विद्याको ही गदा समझना चाहिये, जो सदा मेरे हाथमें स्थित
रहती है। कभी प्रतिहत न होनेवाले धर्म, अर्थ, काम और
मोक्षरूपी चार दिव्य केयूरों (भुजबंदों) से मेरी चारो
भुजाएँ विभूषित हैं। ब्रह्मन् ! मेरा कण्ठ निर्गुण तत्त्व कहा
गया है, वह अजन्मा मायाद्वारा मालित (आवृत) होता है,
इसलिये तुम्हारे मानस पुत्र सनकादि मुनि उस अविद्याको
मेरी माला बताते हैं। मेरा जो कूटस्थ 'सत्' स्वरूप है, उस
रूपमें मुझको ही किरीट कहते हैं। क्षर (सम्पूर्ण विनाशी शरीर)
और उत्तम (जीव)—ये दोनों मेरे कानोंमे झलमलाते हुए
युगल कुण्डल माने गये हैं।
इस प्रकार जो नित्य मनमें मेरा ध्यान करता है, वह मोक्ष-
को प्राप्त होता है। वह मुक्त हो जाता है, निश्चय ही उसे मैं अपने-
आपको दे डालता हूँ। ब्रह्मन् ! मैंने तुमसे अपने सगुण और
निर्गुण-द्विविध स्वरूपके विषयमें जो कुछ बताया है, यह सब
सत्य है और भविष्यमें होनेवाला है ॥ ६४--७५ ॥
तब कमलयोनि ब्रह्माजीने पूछा—'भगवन् ! आपके द्वारा
बतायी हुई जो आपकी व्यक्त मूर्तियाँ हैं, उनका अवधारण
(निश्चय) कैसे हो सकता है ? कैसे देवता उनका पूजन करते
हैं ? कैसे रुद्र पूजन करते हैं, कैसे यह ब्रह्मा पूजन कर सकता
है ? कैसे विनायकगण पूजन करते हैं ? कैसे बारह सूर्य पूजन
करते हैं ? कैसे वसुगण पूजन करते हैं ? कैसे अप्सराएँ पूजन
करती हैं ? कैसे गन्धर्व पूजन करते हैं ? जो अपने पदपर ही
प्रतिष्ठित रहकर अदृश्यरूपसे स्थित है, वह कौन है और उसकी
पूजा कैसे होती है ? तथा मनुष्यगण किसकी और किम
प्रकार पूजा करते हैं ?' ॥ ७६ ॥
तत्र वे प्रसिद्ध भगवान् नारायण ब्रह्माजीसे बोले—मेरी
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बारह अव्यक्त मूर्तियाँ हैं, जो सबकी आदिभूता हैं। वे सब
लोकोंमें, सब देवोंमें तथा सब मनुष्योंमें स्थित हैं ॥ ७७ ॥
वे अव्यक्त मूर्तियाँ इस प्रकार हैं-रुद्रगणोमे रौद्री मूर्ति,
ब्रह्मामे ब्राह्मी मूर्ति, देवताओमे दैवी मूर्ति, मानवोंमें मानवी
मूर्ति, विनायकगणोमे विघ्ननाशिनी मूर्ति, बारह सूर्योंमे ज्योति-
र्मूर्ति, गन्धर्वोंमें गान्धर्वी मूर्ति, अप्सराओंम गौ, वसुओंमें
काम्या तथा अन्तर्धानमे अप्रकाशिनी मूर्ति है। इसके सिवा,
जो आविर्भाव तिरोभावरूपा केवला मूर्ति है, वह अपने पदमें
(अपनी महिमा एव परमधाममे) प्रतिष्ठित है। मानुषी मूर्ति
सात्त्विकी, राजसी और तामसी—तीन प्रकारकी होती है।
केवल सच्चिदानन्दैकरमरूप भक्तियोगमे ही 'विज्ञानघन और
आनन्दघन मूर्ति प्रतिष्ठित है ॥ ७८-७९ ॥
ॐ प्राणात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै प्राणात्मने
नमो नमः॥ ८० ॥
ॐ श्रीकृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय ॐ तत्सद्
भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८१ ॥
ॐ अपानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुवः स्वस्तस्मै अपानात्मने
वै नमो नमः ॥ ८२ ॥
ॐ कृष्णाय प्रद्युम्नायानिरुद्धाय ॐ तत्सद् भूर्भुवः
स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८३ ॥
ॐ व्यानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै व्यानात्मने
वै नमो नमः ॥ ८४ ॥
ॐ श्रीकृष्णाय रामाय ॐ तत्सद भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै
नमो नमः ॥ ८५ ॥
ॐ उदानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुवः स्वस्तस्मै उदानात्मने
वै नमो नमः ॥ ८६ ॥
ॐ कृष्णाय देवकीनन्दनाय ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै
वै नमो नमः ॥ ८७ ॥
ॐ समानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै समानात्मने
वै नमो नमः ॥ ८८ ॥
ॐ गोपालाय अनिरुद्धाय निजस्वरूपाय ॐ तत्सद्
भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८९ ॥
ॐ योऽसौ प्रधानात्मा गोपालः ॐ तत्सद् भूर्भुवः
स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ९० ॥
ॐ योऽसाविन्द्रियात्मा गोपालः ॐ तत्सद् भूर्भुवः
स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ९१ ॥