कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 593, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥
अथर्ववेदीय
गोपालपूर्व ाप न्योपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
प्रथम उपनिषद्
श्रीकृष्णका परब्रह्मत्व, उनका ध्यान करनेयोग्य रूप तथा अष्टादशाक्षर मन्त्र
ॐ कृषिर्भूवाचक शब्दो नश्च निर्वृत्तिवाचकः । लेनेसे यह सब कुछ पूर्णतः ज्ञात हो जाता है । ‘स्वाहा’ इस
तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥ माया-शक्तिसे ही प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण विश्व आवागमनके
ॐ सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे । चक्रमें पड़ा रहता है” ॥ ३ ॥
नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥ १ ॥
तब मुनियोंने पूछा—‘श्रीकृष्ण कौन हैं ? और वे गोविन्द
ॐ ‘कृष्’ शब्द सत्ताका वाचक है और ‘न’ शब्द कौन हैं ? गोपीजन वल्लभ कौन हैं ? और वह स्वाहा
आनन्दका। इन दोनोंकी जहाँ एकता है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप कौन है ?’ ॥ ४ ॥
परब्रह्म ही ‘कृष्ण’ इस नामसे प्रतिपादित होता है।
ॐ अनायास ही सब कुछ कर सकनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप यह सुनकर ब्रह्माजीने उन मुनियोंसे कहा—‘‘पापोंका
श्रीकृष्णको, जो वेदान्तद्वारा जानने योग्य, सबकी बुद्धिके अपकर्षण ( अपहरण ) करनेवाले ‘कृष्ण’, गौ, भूमि तथा
साक्षी तथा सम्पूर्ण जगत्के गुरु हैं, सादर नमस्कार है ॥ १ ॥ वेदवाणीके ज्ञातारूपसे प्रसिद्ध सर्वज्ञ ‘गोविन्द’, गोपीजन
( जीव समुदाय ) की अविद्या-कलाके निवारक अथवा अपनी ही
हरिः ॐ । एक समयकी बात है, मुनियोंने सुप्रसिद्ध अन्तरङ्गा शक्तिरूप व्रज सुन्दरियोंमें सब ओरसे सम्पूर्ण विद्याओं
देवता ब्रह्माजीसे पूछा—‘कौन सबसे श्रेष्ठ देवता है ? किससे एव चौसठ कलाओंका ज्ञान भर देनेवाले ‘गोपीजनवल्लभ’
मृत्यु भी डरती है ? किसके तत्त्वको भलीभाँति जान लेनेसे तथा इनकी मायाशक्ति ‘स्वाहा’—यह सब कुछ वह परब्रह्म
सब कुछ पूर्णत ज्ञात हो जाता है ? किसके द्वारा प्रेरित होकर ही है। इस प्रकार उस श्रीकृष्ण नामसे प्रसिद्ध परब्रह्मका जो
यह विश्व आवागमनके चक्रमें पड़ा रहता है ?’ ॥ २ ॥ ध्यान करता है, जप आदिके द्वारा उनके नामामृतका रसास्वादन
करता है तथा उनके भजनमें लगा रहता है, वह अमृत-
इन प्रश्नोंके उत्तरमें वे प्रसिद्ध ब्रह्माजी इस प्रकार बोले— स्वरूप होता है, अमृतस्वरूप होता है ( अर्थात् भगवद्भावको
“निश्चय ही ‘श्रीकृष्ण’ सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। ‘गोविन्द’से मृत्यु ही प्राप्त हो जाता है )” ॥ ५-६ ॥
भी डरती है। ‘गोपीजन-वल्लभ’के तत्त्वको भलीभाँति जान