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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 832 में से

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पृष्ठ 57
  • उपनिषद्-रहस्य * ४३

अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मधु । अस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु । यश्चायं अस्मिन् वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमय पुरुषः । अयमेव स योऽयमात्मा । इदममृतम् । इदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ (२।५।४)

'वायु समस्त भूतोंका मधु है । समस्त भूत इस वायुके मधु हैं । इस वायुके अंदर एक तेजोमय पुरुष विराजित हैं; उनके अन्तरतममें एक तेजोमय अमृतमय पुरुष विद्यमान हैं । उनके भी प्राणस्वरूप एक तेजोमय अमृतमय पुरुष हैं, वे ही आत्मा हैं, वे ही अमृत हैं, वे ही ब्रह्म हैं, वे ही सब हैं ।'

ऐसी बात नहीं है कि छान्दोग्यमें स्पष्ट प्रकाश नहीं है- परन्तु साधारणतः छान्दोग्यकी किरणें कुछ छायासे ढकी हैं । किञ्चित् परोक्ष-भावापन्न हैं । ऋषि और परब्रह्म परमात्माके बीचमें जगत्-प्रपञ्चकी यवनिका है । यवनिकाका आवरण सूक्ष्म और स्वच्छ हो गया है । ब्रह्मज्योतिकी रश्मिराजि यवनिकाका भेद करके ऋषिके नेत्रोंमें घन-घन प्रकाशित होती है । यवनिका उठी तो है ही नहीं, कहीं तनिक-सी फटी भी नहीं है । इसीसे ब्रह्मका कोई भी वैभव साक्षात् रूपमें नहीं दिखायी देता है । केवल प्रकाश, अस्फुट स्फटिकीकृत जगत्से विकीर्ण आभाससमूह ही चारों ओर चमक रहा है ।

ऋषि देख रहे हैं कि सूर्य देवताओंका मधुभाण्ड है । किरणें मधुकोष (छत्ते) हैं जो पूर्व दिशासे विच्छुरित हो रही हैं । ऋक्‌के मन्त्र मधुमक्षिका हैं । ऋग्वेदोक्त यज्ञ मधुपूरर्ण पुष्प हैं । यज्ञसे उत्पन्न शक्ति, यश, तेज, वीर्य आदिकी उज्ज्वल छटाको ऋषियोंने देखा सूर्यके लोहितरूपमें । दक्षिण दिशाकी किरणराशि दक्षिणका मधुकोष है । यजुःके मन्त्र मधुमक्षिका हैं । यजुर्वेदोक्त यज्ञ मधुपूरर्ण पुष्प हैं । सूर्यकी शुक्ल ज्योतिवृद्धि ऋषियोंके देह-मन-प्राणकी दीप्ति है । यज्ञसम्पादनजनित ब्रह्मवर्चस् है । पश्चिम दिशामें सूर्य-किरणोंकी कृष्ण प्रभा है । उत्तरमें और भी घनतर कृष्ण वर्ण है । (छान्दोग्य० ३ । १ । ४) । सूर्य-ज्योति अमृतमय है । वसुगण सूर्यका लोहित वर्ण अमृत-रस पान करते हैं । देवगण अमृतको देखकर ही तृप्त होते हैं । आदित्यगण सूर्यकी कृष्णवर्ण किरणोंमें परिप्लुत अमृतका पान करते हैं । मरुद्गण घन-कृष्णज्योति अमृत पान करते हैं । इस प्रकार विभिन्न रूपसे नाना प्रकारसे प्रतिबिम्बित, विकीर्ण, विच्छुरित और विक्षिप्त हुई ब्रह्मज्योति ऋषियोंके देह-मन-प्राण और अन्तर्हृदयमें अविरत झाँकी दे रही है । यह कल्पना नहीं है, कवित्व नहीं है । ज्ञानघन विज्ञानांदत अनुभव है । दिव्य उपलब्धि है ।

ऋषियोंने ब्रह्मप्रतिविम्ब-प्रभाको, सुगम्य अतीन्द्रियग्राह्य इन्द्रधनुक्री वर्णच्छटाको जैसा-जैसा देखा है, वैसा-वैसा ही लिखा है । यह सब तत्त्व प्राकृत इन्द्रियगोचर नहीं होता । ध्यान-धारणा और समाधिके मार्गमें प्राप्त होता है—

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्
देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ॥
(श्वेताश्वतर० १ । ३)

दिव्यशक्ति आत्मशक्ति ब्रह्मशक्ति त्रिगुणमय भूतसमुदायके द्वारा आच्छादित हो रही है । उसीकी विच्छुरित विभाको ध्यानदृष्टिके द्वारा ऋषियोंने देखा था ।

हम उपनिषत्-साहित्यविज्ञानके क्रम-विकासकी बात कहते हैं। छान्दोग्यके बाद बृहदारण्यक है । बीचमें 'ऐतरेय' और 'प्रश्न' हैं । छान्दोग्यकी दृष्टि समष्टि-दृष्टि है, विश्व-दृष्टि है, अखण्ड ज्ञानसम्मत, अविभक्त भाव वैभव है । उद्गीथोपासना, सामोपासना, प्राणोपासना, मधुविद्या, गायत्रीविद्या, पञ्चाहुतिविद्या, दहरविद्या—इस प्रकार छान्दोग्यके ऋषिने जिस किसी भी विज्ञान-विषयका अवलम्बन किया है, उसीमें समग्रता ला दी है । उसीको विश्वग्राही बना दिया है । मातृ-गर्भसे जो सन्तानकी उत्पत्ति होती है, उसके पीछे जो ब्रह्मभाव है, उसके अनुभवके लिये महर्षिने एक विराट् भावशृङ्खलाका आविष्कार किया है ।

निगूढ सम्बन्धयुक्त पाँच यज्ञ हैं, पाँच आहुति हैं । नक्षत्रलोक अग्नि है, सूर्य उसका समिध् है । देवगण श्रद्धापूर्वक सूक्ष्माहुति रसपूर्ण स्निग्ध अमृतके द्वारा यज्ञसम्पादन करते हैं । सोमराज चन्द्रका अर्थात् रसाधिदेवताका जन्म होता है । पर्जन्य अर्थात् सलिल शोषणशक्ति अग्नि हैं, वायु उसका समिध्—यज्ञकाष्ठ है । देवतागण उसमें राजा सोमकी—जो चन्द्रशक्ति है उसीकी आहुति देते हैं, वही वृष्टिका कारण होता है । पृथिवी अग्नि है, संवत्सर अर्थात् षड्ऋतु समिध् है । देवता वर्षाकी आहुति देकर यज्ञ करते हैं । उससे अन्नकी उत्पत्ति होती है । पुरुष अग्नि है । वाक् समिध् है; देवतागण अन्नकी आहुति देकर यज्ञ करते हैं । स्त्री अग्नि है । पुरुष समिध् है । देवतागण शुक्रसिद्धानरूप आहुति देकर यज्ञ करते हैं, उससे शिशुकी उत्पत्ति होती है । (५ । ५–८) यह दर्शन, विज्ञान और कवित्व है ।

ऐतरेय उपनिषद्का ब्रह्मज्ञान असीम आकाशसे उतरकर नीचे नहीं आता । यहाँ दृष्टिका दिङ्मण्डल सीमाबद्ध हो गया