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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 561, कुल 832 में से

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पृष्ठ 561

ॐ
तृतीय अध्याय
इन्द्र-प्रतर्दन-संवाद; प्रज्ञास्वरूप प्राणकी महिमा

ॐ यह प्रसिद्ध है कि राजा दिवोदासके पुत्र प्रतर्दन
(देवासुर-सङ्ग्राममें देवताओंकी सहायता करनेके लिये) देवराज
इन्द्रके प्रिय धाम स्वर्गलोकमें गये। वहाँ उनकी अनुपम
युद्धकला और पुरुषार्थसे संतुष्ट होकर इन्द्रने उनसे कहा—
'प्रतर्दन ! बोलो, मैं तुम्हें क्या वर दूँ?' तब वे प्रसिद्ध वीर
प्रतर्दन बोले—'देवराज ! जिस वरको आप मनुष्य-जातिके लिये
परम कल्याणमय मानते हों, वैसा कोई वर मेरे लिये आप स्वयं
ही वरण करें।' यह सुनकर इन्द्रने कहा—'राजन् ! लोकमें
यह सर्वत्र विदित है कि कोई भी दूसरेके लिये वर नहीं माँगता,
अतः तुम्हीं अपने लिये कोई वर माँगो।' प्रतर्दन बोला—
'तब तो मेरे लिये वरका अभाव ही रह गया।' (क्योंकि
आप स्वयं तो वर माँगेंगे नहीं, और 'मुझे क्या माँगना
चाहिये'—इसका मुझको ज्ञान ही नहीं है। ऐसी दशामें मुझे वर
मिलनेसे रहा।) प्रतर्दनके ऐसा कहनेपर निश्चय ही देवराज
इन्द्र अपने सत्यसे विचलित नहीं हुए, (वे वर देनेकी प्रतिज्ञा
कर चुके थे, अतः प्रतर्दनके न माँगनेपर भी अपनी ही ओरसे
वर देनेको उद्यत हो गये।) क्योंकि इन्द्र सत्यस्वरूप हैं।
उन प्रसिद्ध देवता इन्द्रने कहा—'प्रतर्दन ! तुम मुझे ही
जानो—मेरे ही यथार्थ स्वरूपको समझो। इसे ही मैं मनुष्य-
जातिके लिये परमकल्याणमय वर मानता हूँ कि वह मुझे
भलीभाँति जाने।'
(यदि कहो, आपमें ऐसी क्या विशेषता है! तो सुनो;
मैंने प्राणब्रह्मके साथ तादात्म्य प्राप्त कर लिया है, अतएव
मुझमें कर्तापनका अभिमान नहीं है, मेरी बुद्धि कहीं भी लिप्त
नहीं होती। कर्मफलकी इच्छा मेरे मनमें कभी उत्पन्न ही
नहीं होती, अतएव कोई भी कर्म मुझे बन्धनमें नहीं डालता।*
इसी अभिप्रायसे कहते हैं—)
'मैंने त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वरूपको, जिसके तीन

  • न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
    इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
    यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
    हत्वापि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते ॥
    (गीता ४। १४, १८। १७)
    मस्तक थे, वज्रसे मार डाला। कितने ही (मिथ्या) संन्यासियोंको,
    जो अपने आश्रमोचित आचारसे भ्रष्ट एव बहिर्मुख (ब्रह्मविचारसे
    विमुख) हो चुके थे, टुकड़े-टुकड़े करके भेड़ियोंको बाँट
    दिया। कितनी ही बार प्रह्लादके परिचारक दैत्य राजाओंको
    मौतके घाट उतार दिया। पुलोमासुरके परिचारक दानवों तथा
    पृथिवीपर रहनेवाले कालखाञ्ज नामक बहुत-से असुरोंका भी
    समस्त विघ्न-बाधाओंका अतिक्रम करके संहार कर डाला। परंतु
    इतनेपर भी (अहङ्कार और कर्मफलकी कामनासे शून्य होनेके
    कारण) मुझ प्रसिद्ध देवराज इन्द्रके एक रोमको भी हानि
    नहीं पहुँची। मेरा एक बाल भी बाँका नहीं हुआ। इसी
    प्रकार जो मुझे भलीभाँति जान ले, उसके पुण्यलोकको किसी
    भी कर्मसे हानि नहीं पहुँचती।
    'मेरे स्वरूपका ज्ञान रखनेवाले पुरुषको बड़े-से-बड़ा पाप भी
    हानि नहीं पहुँचा सकता। अधिक क्या कहूँ, उसे पाप लगता
    ही नहीं। पाप करनेकी इच्छा होनेपर भी उसके मुखसे नील
    आभा नहीं प्रकट होती—उसका मुँह काला नहीं होता'॥१॥
    (यह कथन अहङ्कारसे सर्वथा शून्य ब्रह्मज्ञानीकी महत्ता
    बतलानेके लिये है, न कि पाप कर्मोंका समर्थन करनेके लिये।
    वस्तुतः अहङ्काररहित राग-द्वेषशून्य पुरुषसे पापकार्य बननेका
    ही कोई हेतु नहीं होता।)
    वे प्रसिद्ध देवराज इन्द्र बोले—'मैं प्रज्ञास्वरूप प्राण हूँ।
    उस प्राण एव प्रज्ञात्मारूपमें विदित मुझ इन्द्रकी तुम 'आयु
    और अमृत' रूपसे उपासना करो।' (अर्थात् समस्त प्राणियोंकी
    आयु एव जीवनभूत जो प्राण है, जो मृत्युसे रहित अमृतपद
    है, वह मुझ इन्द्रसे भिन्न नहीं है—यों समझकर मेरी उपासना
    करो।)
    'आयु प्राण है। प्राण ही आयु है तथा प्राण ही अमृत
    है। जबतक इस शरीरमें प्राण निवास करता है, तबतक ही
    आयु है। प्राणसे ही प्राणी परलोकमें अमृतत्वके सुखका
    अनुभव करता है।
    'प्रज्ञासे मनुष्य सत्यका निश्चय और सङ्कल्प-विकल्प करता
    है। जो 'आयु' और 'अमृत' रूपसे मुझ इन्द्रकी उपासना
    करता है, वह इस लोकमें पूरी आयुतक जीवित रहता है