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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 832 में से

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पृष्ठ 558

५२० * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [ अध्याय २
यह जो सूर्य दृष्टिगोचर होता है, निश्चय ही इस रूपमें ब्रह्म ही
प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो
मर जाता है। उस समय उसका तेज चन्द्रमाको ही प्राप्त होता
और प्राण वायुमें मिल जाता है। यह जो चन्द्रमा दिखायी
देता है, निश्चय ही इसके रूपमें ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है।
फिर जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो यह मर जाता
है। उस समय उसका तेज विद्युत्को ही और प्राण वायुको
प्राप्त हो जाता है। यह जो बिजली कौंधती है, निश्चय ही इसके
रूपमें यह ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। फिर जब यह नहीं
कौंधती, तब मानो मर जाती है; उस समय उसका तेज वायुको
प्राप्त होता है और प्राण भी वायुमें ही प्रवेश कर जाता है।
वे प्रसिद्ध अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा तथा विद्युत्-स्वरूप सम्पूर्ण
देवता वायुमें ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। वायु
(आधिदैविक प्राण) में विलीन होकर वे विनष्ट नहीं होते;
क्योंकि पुनः उस वायुसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है। इस
प्रकार आधिदैविक दृष्टि है। अब आध्यात्मिक दृष्टि बतायी
जाती है ॥ १२ ॥
मनुष्य वाणीसे जो बातचीत करता है, यह मानो ब्रह्म ही
प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं बोलता, उस समय मानो यह
वाक्-इन्द्रिय मर जाती है। उस समय वाणीका तेज नेत्रको प्राप्त
हो जाता है और प्राण प्राणवायुमें मिल जाता है। यह मनुष्य
नेत्रद्वारा जो देखता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा
है। जब नेत्रसे नहीं देखता, उस समय मानो नेत्रेन्द्रिय मर
जाती है। उस समय नेत्रका तेज श्रवणेन्द्रियको प्राप्त हो जाता
है तथा प्राण प्राणमें ही मिल जाता है। यह जो श्रवणद्वारा
सुनता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है, जब यह
नहीं सुनता, तब मानो श्रवणेन्द्रिय मर जाती है। उस समय
उसका तेज मनको ही प्राप्त हो जाता है और प्राण प्राणमें
मिल जाता है। यह जो मनसे ध्यान (चिन्तन) करता है,
यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब चिन्तन नहीं
करता, तब मानो मन मर जाता है। उस समय उसका तेज प्राण-
को ही प्राप्त हो जाता है और प्राण भी प्राणमें ही मिल जाता है।
इस प्रकार ये सम्पूर्ण वाक् आदि देवता प्राणमें ही प्रवेश
करके स्थित होते हैं। प्राणमें लीन होकर वे नष्ट नहीं होते।
अतएव पुनः प्राणसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है।
उस दैव परिमर (प्राण) का सम्यग्ज्ञान हो जानेपर यदि
वे ज्ञानी पुरुष ऐसे दो ऊँचे पर्वतोंको, जो भूमण्डलके उत्तरी
सिरेसे लेकर दक्षिणी सिरेतक फैले हों, अपनी इच्छाके अनुसार
चलनेको प्रेरित करें तो वे पर्वत इन ज्ञानी महापुरुषोंकी
हिंसा—उनकी आज्ञाका परित्याग अर्थात् उनकी अवहेलना
नहीं कर सकते।
इसके सिवा, जो लोग इस 'दैवपरिमर' के ज्ञाता पुरुषसे
द्वेष करते हैं, अथवा वह स्वयं जिन लोगोंसे द्वेष रखता हो;
वे सब-के-सब सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥
मोक्षके लिये सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना
इसके पश्चात् अब मोक्ष-साधनके गुणसे विशिष्ट सर्वश्रेष्ठ
प्राणकी उपासना बतायी जाती है। एक समय वाक् आदि
सम्पूर्ण देवता अहङ्कारवश अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके
लिये विवाद करने लगे। वे सब प्राणके साथ ही इस शरीरसे
निकल गये। उनके निकल जानेपर वह शरीर काठकी भाँति
निश्चेष्ट होकर सो गया। तदनन्तर उस शरीरमें वाक् इन्द्रियने
प्रवेश किया। तब वह वाणीसे बोलने तो लगा, परंतु उठ न
सका, सोया ही रह गया। तत्पश्चात् चक्षु-इन्द्रियने उस
शरीरमे प्रवेश किया। तथापि वह वाणीसे बोलता और नेत्रसे
देखता हुआ भी सोता ही रहा, उठ न सका। तब उस
शरीरमे श्रवण-इन्द्रियने प्रवेश किया। उस समय भी वह
वाणीसे बोलता, नेत्रसे देखता और कानोंसे सुनता हुआ भी
सोता ही रहा; उठकर बैठ न सका। तदनन्तर उस शरीरमे
मनने प्रवेश किया। तब भी वह शरीर वाणीसे बोलता,
नेत्रसे देखता, कानसे सुनता और मनसे चिन्तन करता हुआ
भी पड़ा ही रहा। तत्पश्चात् प्राणने उस शरीरमें प्रवेश किया।
फिर तो उसके प्रवेश करते ही वह शरीर उठ बैठा। तब
उन वाक् आदि देवताओंने प्राणमें ही मोक्ष-साधनकी शक्ति
जानकर तथा प्रज्ञारूप प्राणको ही सब ओर व्याप्त समझकर
इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ ही इस शरीररूप
लोकसे उत्क्रमण किया।
वे वायुमें—आधिदैविक प्राणमें स्थित हो आकाशस्वरूप
होकर स्वर्गलोकमें गये—अपने अधिष्ठातृ-देवता अग्नि
आदिके स्वरूपको प्राप्त हो गये। उसी प्रकार इस रहस्यको
जाननेवाला विद्वान् सम्पूर्ण भूतोंके प्राणको ही प्रज्ञात्मरूपसे
प्राप्तकर इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ इस
शरीरसे उत्क्रमण करता है। तथा वह वायुमे प्रतिष्ठित हो
आकाशस्वरूप होकर स्वर्गलोकको गमन करता है। वह
विद्वान् वहाँ उस सुप्रसिद्ध प्राणका स्वरूप हो जाता है जिसमें
कि ये वाक् आदि देवता स्थित होते हैं। उस प्राणस्वरूपको
प्राप्तकर वह विद्वान् प्राणके उस अमृतत्व-गुणसे युक्त हो