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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 832 में से

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पृष्ठ 539

१५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०१
इस [ विश्वाचरणरूप ] कार्यमें सफलता नहीं प्राप्त करे । इस कहा था, तो फिर [ प्रतिग्रहके दोषसे ] हाथी होकर भार क्यों
प्रकार यह (विद्वान् ) जिससे द्वेष करता हो, 'उसकी कामना ढोता है ?' इसपर उसने 'सम्राट् ! मे इसका मुख ही नहीं
पूर्ण न हो' ऐसा कहकर उपस्थान करे । जिसके लिये इस जानता था' ऐसा कहा । [ तब जनकने कहा-] 'इसका
प्रकार उपस्थान किया जाता है, उसकी कामना पूर्ण नहीं होती । अग्नि ही मुख है। यदि अग्निमे लोग बहुत-सा ईंधन रख दें
अथवा 'मैं इस वस्तुको प्राप्त करूँ' ऐसी कामनासे उपस्थान तो वह उस सभीको जला डालता है। इसी प्रकार ऐसा जानने-
करे ॥ ७ ॥ वाला बहुत सा पाप करता रहा हो, तो भी वह उस सबको
उस विदेह जनकने बुडिल अश्वतराश्विसे यही बात कही भक्षण करके शुद्ध, पवित्र, अजर, अमर हो जाता है ॥ ८ ॥
थी कि 'तूने जो अपनेको गायत्रीविद् (गायत्री तत्त्वका ज्ञाता)
पञ्चदश ब्राह्मण
अन्तसमयकी प्रार्थना
हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर ! आप सत्य- इन्द्रियाँ अविनाशी समष्टि वायुतत्त्वमें [ प्रविष्ट हो जायँ ], यह
स्वरूप सर्वेश्वरका श्रीमुख ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप पात्रसे ढका स्थूलशरीर अग्निमे जलकर भस्मरूप [ हो जाय ] । हे
हुआ है । आपकी भक्तिरूप सत्यधर्मका अनुष्ठान करनेवाले सच्चिदानन्दघन यज्ञमय भगवन् ! [ आप मुझ भक्तका ] स्मरण
मुझको अपने दर्शन करानेके लिये आप उस आवरणको हटा करें, मेरे द्वारा किये हुए (भक्तिरूप ) कर्मोंका स्मरण करें ।
लीजिये । हे भक्तोंका पोषण करनेवाले ! मुख्य ज्ञानस्वरूप ! हे यज्ञमय भगवन् ! [ आप मुझ भक्तको ] स्मरण करें,
सबके नियन्ता ! भक्तों और ज्ञानियोंके परम लक्ष्य ! प्रजापतिके (मेरे) कर्मोंको स्मरण करें । हे अग्नि ! (अग्निके अधिष्ठातृ
प्रिय ! इन रश्मियोंको एकत्र कीजिये-हटा लीजिये, इस देवता ) हमें परम वनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये
तेजको समेट लीजिये । आपका जो अतिशय कल्याणमय सुन्दर शुभ (उत्तरायण) मार्गसे ले चलिये । हे देव !
दिव्यस्वरूप है, उसको मै आपकी कृपासे [ ध्यानके द्वारा ] [ आप हमारे ] सम्पूर्ण कर्मोंको जाननेवाले हैं, अतः हमारे इस
देख रहा हूँ। वह जो (सूर्यका आत्मा) है, वह परम पुरुष मार्गके प्रतिबन्धक पापको दूर कर दीजिये । आपको हम
[ आपका स्वरूप है, ] वही मैं भी हूँ। अब ये प्राण और बार-बार नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥ -
॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥