कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 501, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६७
है—'मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।' जो कुछ भी
स्वाध्याय है, उस सबकी 'ब्रह्म' यह एकता है। जो कुछ भी
यज्ञ हैं, उनकी 'यज्ञ' यह एकता है। और जो कुछ भी
लोक हैं, उनकी 'लोक' यह एकता है। यह इतना ही गृहस्थ
पुरुषका सारा कर्तव्य है। [ फिर पिता यह मानने लगता है
कि ] यह मेरे इस भारको लेकर इस लोकसे जानेपर मेरा
पालन करेगा। अतः इस प्रकार अनुशासन किये हुए पुत्रको
'लोक्य' (लोकप्राप्तिमें हितकर ) कहते हैं। इसीसे पिता
उसका अनुशासन करता है। इस प्रकार जाननेवाला वह
पिता जब इस लोकसे जाता है, तब अपने इन्हीं प्राणोंके सहित
पुत्रमें व्याप्त हो जाता है। यदि किसी कोणाच्छिद्र (प्रमाद )
से उस (पिता) के द्वारा कोई कर्तव्य नहीं किया होता है
तो उस सबसे पुत्र उसे मुक्त कर देता है। इसीसे उसका
नाम 'पुत्र' है। वह पिता पुत्रके द्वारा ही इस लोकमें
प्रतिष्ठित होता है। फिर उसमें ये हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृत
प्राण प्रवेश करते हैं ॥ १७ ॥
पृथिवी और अग्निसे इसमे दैवी वाक्का आवेश होता है।
दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो जो भी बोलता है, वही-
वही हो जाता है। द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव
मनका आवेश हो जाता है। दैव मन वही है, जिससे यह
सुखी ही होता है, कभी शोक नहीं करता। जल और
चन्द्रमासे इसमें दैव प्राणका आवेश हो जाता है। दैव प्राण
वही है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी
व्यथित नहीं होता और न नष्ट ही होता है। इस प्रकार
जाननेवाला वह समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है। जैसा यह
देवता (हिरण्यगर्भ) है, वैसा ही वह हो जाता है। जिस
प्रकार समस्त प्राणी इस देवताका पालन करते हैं, उसी प्रकार
ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त भूत पालन करते हैं। जो
कुछ ये जीव शोक करते हैं, वह (शोकादिजनित दुःख)
उन्हींके साथ रहता है। इसे तो पुण्य ही प्राप्त होता है,
क्योंकि देवताओंके पास पाप नहीं जाता ॥ १८-२० ॥
अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है। प्रजापतिने
कर्मों (कर्मके साधनभूत वागादि करणों) की रचना की।
रचे जानेपर वे एक दूसरेसे स्पर्धा करने लगे। वाक्ने व्रत
किया कि 'मैं बोलती ही रहूँगी' तथा 'मै देखता ही रहूँगा'
ऐसा नेत्रने और 'मै सुनता ही रहूँगा' ऐसा श्रोत्रने व्रत किया।
इसी प्रकार अपने-अपने कर्मके अनुसार अन्य इन्द्रियोने भी
व्रत किया। तब मृत्युने श्रम होकर उनसे सम्बन्ध किया
और उनमे व्याप्त हो गया। उनमें व्याप्त होकर मृत्युने
उनका अवरोध किया। इसीसे वाक् श्रमित होती ही है, नेत्र
श्रमित होता ही है, श्रोत्र श्रमित होता ही है; किंतु यह जो
मध्यम प्राण है, इसमें वह (मृत्यु) व्याप्त न हो सका।
तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया। 'निश्चय यही
हममें श्रेष्ठ है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए
भी व्यथित नहीं होता और न क्षीण ही होता है। अच्छा,
हम सब भी इसीके रूप हो जायँ'—ऐसा निश्चयकर वे सब
इसीके रूप हो गयीं। अतः वे इसीके नामसे 'प्राण' इस
प्रकार कही जाती हैं। इसीसे जो ऐसा जानता है, वह जिस
कुलमें होता है, वह कुल उसीके नामसे बोला जाता है। तथा
जो ऐसे विद्वान्से स्पर्धा करता है, वह सूख जाता है और
सूखकर अन्तमें मर जाता है। यह अध्यात्म-प्राणदर्शन
है ॥ २१ ॥
अब अधिदैवदर्शन कहा जाता है—अग्निने व्रत किया
कि 'मैं जलता ही रहूँगा।' सूर्यने नियम किया, 'मैं तपता
ही रहूँगा।' तथा चन्द्रमाने निश्चय किया, 'मै प्रकाशित ही
होता रहूँगा।' इसी प्रकार अन्य देवताओंने भी यथादैवत
(जिस देवताका जो व्यापार था, उसीके अनुसार) व्रत
किया। जिस प्रकार इन वागादि प्राणोंमें मध्यम प्राण है,
उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है, क्योंकि अन्य देवगण
तो अस्त हो जाते हैं, किंतु वायु अस्त नहीं होता। यह जो
वायु है, अस्त न होनेवाला देवता है ॥ २२ ॥
इसी अर्थका प्रतिपादक यह मन्त्र है—'(जिस (वायुदेवता)
से (चक्षुरूप) सूर्य उदय होता है और जिसमें वह अस्त होता है'
इत्यादि। यह प्राणसे ही उदित होता है और प्राणमें ही अस्त
हो जाता है। उस धर्मको देवताओंने धारण किया है। वही आज है
और वही कल भी रहेगा। देवताओंने जो व्रत उस समय धारण
किया था, वही आज भी करते हैं। अतः एक ही व्रतका
आचरण करे। प्राण और अपान-व्यापार करे। मुझे कहीं पापी
मृत्यु व्याप्त न कर ले—इस भयसे [ इस व्रतका आचरण
करे]। और यदि इसका आचरण करे तो इसे समाप्त करने-
की भी इच्छा रक्खे। इससे वह प्राणरूप इस देवतासे सायुज्य
और सालोक्य प्राप्त करता है ॥ २३ ॥