सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 498
  • ४६४ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १
    आत्मा है, उस आत्माके ज्ञात होनेसे ही मनुष्य इस सब जगत्‌को
    जानता है। जिस प्रकार पदों (खुर आदिके चिन्हों) द्वारा
    [खोये हुए पशुको] प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार जो ऐसा
    जानता है, वह इसके द्वारा यश और इष्ट पुरुषोंका सहवास प्राप्त
    करता है। वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे अधिक प्रिय है, धनसे
    अधिक प्रिय है, और अन्य सबसे भी अधिक प्रिय है, क्योंकि
    यह आत्मा उनकी अपेक्षा अन्तरतर है। वह जो आत्मप्रियदर्शी
    है यदि आत्मासे भिन्न (अनात्मा) को प्रिय कहनेवाले
    पुरुषसे कहे कि 'तेरा प्रिय नष्ट हो जायगा' तो वैसा ही हो
    जायगा, क्योंकि वह समर्थ होता है। अतः आत्मारूप प्रियकी
    ही उपासना करे। जो आत्मारूप प्रियकी ही उपासना करता
    है उसका प्रिय अत्यन्त मरणशील नहीं होता ॥ ७-८ ॥
    [ब्राह्मणोंने] यह कहा कि ब्रह्मविद्याके द्वारा मनुष्य
    'हम सर्व हो जायँगे ऐसा मानते हैं, [सो] उस ब्रह्मने क्या
    जाना जिससे वह सर्व हो गया ?' ॥ ९ ॥
    पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको ही जाना कि मैं
    'ब्रह्म हूँ'। अतः वह सर्व हो गया। उसे देवोंमेंसे जिस जिसने
    जाना, वही तद्रूप हो गया। इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्यों-
    मेंसे भी [जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया]। उसे आत्मरूपसे
    देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना-'मैं मनु हुआ और सूर्य
    भी।' उस उस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि
    मैं 'ब्रह्म हूँ', वह यह सर्व हो जाता है। उसके पराभवमें देवता
    भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता
    है। और जो अन्य देवताकी 'यह अन्य है और मैं अन्य हूँ'
    इस प्रकार उपासना करता है, वह नहीं जानता। जैसे पशु होता
    है, वैसे ही वह देवताओंका पशु है। जैसे लोकमें बहुत से पशु
    मनुष्यका पालन करते हैं, उसी प्रकार एक एक मनुष्य
    देवताओंका पालन करता है। एक पशुका ही हरण किये
    जानेपर अच्छा नहीं लगता, फिर बहुतोंका हरण होनेपर तो
    कहना ही क्या है? इसलिये देवताओंको यह प्रिय नहीं है कि
    मनुष्य [ब्रह्मात्मतत्त्वको] जानें ॥ १० ॥
    आरम्भमें यह एक ब्रह्म ही था। अकेला होनेके कारण
    वह विभूतियुक्त कर्म करनेमे समर्थ नहीं हुआ। उसने अति-
    शयतासे क्षत्र रूप प्रशस्त रूपकी रचना की। अर्थात् देवताओं-
    में क्षत्रिय जो ये इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, मेघ, यम, मृत्यु
    और ईशानादि हैं, उन्हें उत्पन्न किया। अतः क्षत्रियसे उत्कृष्ट
    कोई नहीं है। इसीसे राजसूय यज्ञमें ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रियकी
    उपासना करता है, वह क्षत्रियमे ही अपने यशको स्थापित
    करता है। यह जो ब्राह्मण है, क्षत्रियकी योनि है। इसलिये यद्यपि
    राजा उत्कृष्टताको प्राप्त होता है तो भी [राजसूयके]
    अन्तमे वह ब्राह्मणका ही आश्रय लेता है। अतः जो क्षत्रिय
    इस (ब्राह्मण) की हिंसा करता है, वह अपनी योनिका ही
    नाश करता है। जिस प्रकार श्रेष्ठकी हिंसा करनेसे पुरुष पापी
    होता है, उसी प्रकार वह पापी होता है ॥ ११ ॥
    वह (ब्रह्म) विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ।
    उसने वैश्यजातिकी रचना की। जो ये वसु, रुद्र, आदित्य,
    विश्वेदेव और मरुत् इत्यादि देवगण गणशः कहे जाते हैं
    [उन्हें उत्पन्न किया]। [फिर भी] वह विभूतियुक्त कर्म
    करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने शूद्रवर्णकी रचना की। पूषा
    शूद्रवर्ण है। यह पृथिवी ही पूषा है, क्योंकि यह जो कुछ है,
    यही उसका पोषण करती है ॥ १२-१३ ॥
    तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ।
    उसने अतिशयतासे श्रेयरूप धर्मको रचा। यह जो धर्म है,
    क्षत्रियका भी नियन्ता है। अतः धर्मसे उत्कृष्ट कुछ नहीं है।
    इसलिये जिस प्रकार राजाकी सहायतासे [प्रबल शत्रुको भी
    जीतनेकी शक्ति आ जाती है] उसी प्रकार धर्मके द्वारा निर्बल
    पुरुष भी बलवान्‌को जीतनेकी इच्छा करने लगता है। वह
    जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है। इसीसे सत्य बोलनेवालेके विषयमें
    कहते हैं कि 'यह धर्म भाषण करता है' तथा धर्म भाषण
    करनेवालेसे कहते हैं कि 'यह सत्य भाषण करता है', क्योंकि
    ये दोनों यही (धर्म ही) हैं ॥ १४ ॥
    वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं।
    [इन्हें उत्पन्न करनेवाला] ब्रह्म अग्निरूपसे देवताओंमें ब्राह्मण
    हुआ। तथा मनुष्योंमे ब्राह्मणरूपसे ब्राह्मण, क्षत्रियरूपसे
    क्षत्रिय, वैश्यरूपसे वैश्य और शूद्ररूपसे शूद्र हुआ। इसीसे
    अग्निमें ही [कर्म करके] देवताओंके बीच कर्मफलकी इच्छा
    करते हैं तथा मनुष्योंके बीच ब्राह्मणजातिमें ही कर्मफलकी
    इच्छा करते हैं, क्योंकि ब्रह्म इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ
    था। तथा जो कोई इस लोकसे आत्माका दर्शन किये
    बिना ही चला जाता है, उसका यह अविदित आत्मलोक
    [शोक मोहादिकी निवृत्तिके द्वारा] वैसे ही पालन नहीं करता,
    जैसे कि बिना अध्ययन किया हुआ वेद अथवा बिना अनुष्ठान
    किया हुआ कोई अन्य कर्म। इस प्रकार (आत्माको) न
    जाननेवाला पुरुष यदि इस लोकमे कोई महान् पुण्यकर्म भी
    करे, तो भी अन्तमे उसका वह कर्म क्षीण हो ही जाता है; अतः