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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 832 में से

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पृष्ठ 475

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४३
हो जाती हैं वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य ! मरणको सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है ।
प्राप्त होते हुए इस पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है तथा [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् !
मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा
है । वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह कहा ॥ ६-७ ॥
नवम खण्ड
मधुका दृष्टान्त
सोम्य ! जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु निष्पन्न करती हैं पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी [ सुषुप्ति आदिसे पूर्व ]
तो नाना दिशाओंके वृक्षोंका रस लाकर एकताको प्राप्त करा होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ॥ १-३ ॥
देती हैं । वे रस जिस प्रकार उस मधुमें इस प्रकारका विवेक वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह
प्राप्त नहीं कर सकते कि 'मै इस वृक्षका रस हूँ और मै इस सत्य है, वह आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है । [ आरुणिके
वृक्षका रस हूँ' हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजा इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर
सत्‌को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्‌को प्राप्त हो समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा
गये हैं । वे इस लोकमें व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, कहा ॥ ४ ॥
दशम खण्ड
नदियोंका
सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी ओर बहती सत्‌के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर,
हैं तथा पश्चिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे समुद्रसे कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे ही
निकलकर फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही फिर हो जाते हैं। वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह
हो जाता है । वे सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्रमें ) यह नहीं सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही
जानतीं कि 'यह मैं हूँ, यह मैं हूँ' । ठीक इसी प्रकार सोम्य ! तू है । [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—]
ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्‌से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा
सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥
एकादश खण्ड
वृक्षका
हे सोम्य ! यदि कोई इस महान् वृक्षके मूलमें आघात वृक्षको छोड़ देता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है। 'सोम्य !
करे तो यह जीवित रहते हुए केवल रसस्त्राव करेगा और यदि ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवसे रहित होनेपर यह शरीर
इसके अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही मर जाता है, जीव नहीं मरता'—ऐसा [ आरुणिने ] कहा,
रसस्त्राव करेगा । यह वृक्ष जीव—आत्मासे ओतप्रोत है और 'वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है,
जलपान करता हुआ आनन्दपूर्वक स्थित है । यदि इस वृक्षकी वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है ।' [ आरुणिके
एक शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह सूख जाती है; यदि इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर
दूसरीको छोड़ देता है तो वह सूख जाती है और तीसरीको समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा
छोड़ देता है तो वह भी सूख जाती है, इसी प्रकार यदि सारे कहा ॥ १-३ ॥
द्वादश खण्ड
वट-बीजका दृष्टान्त
इस ( सामनेवाले वटवृक्ष ) से एक बड़का फल ले आ । फोड़।' [श्वेत०—] 'भगवन् ! फोड़ दिया ।' [आरुणि—]
श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! यह ले आया ।' [ आरुणि—] 'इसे 'इसमें क्या देखता है ?' [ श्वेत०—] 'भगवन् ! इसमें ये