सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९५
    भी केवल उसकी सूक्ष्मताका लक्ष्य करानेके लिये ही है । वास्तवमें चेतन और सूक्ष्म वस्तुका स्वरूप जड और स्थूल वस्तुकी
    उपमासे नहीं समझाया जा सकता, क्योंकि बालकी नोकके दस हजार भागोंमेंसे एक भाग भी आकाशमें जितने देशको रोकता
    है, उतना भी जीवात्मा नहीं रोकता । चेतन और सूक्ष्म वस्तुका जड और स्थूल देहके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; वह
    सूक्ष्म होनेपर भी स्थूल वस्तुमें सर्वत्र व्याप्त रह सकता है । इसी भावको समझानेके लिये अन्तमें कहा गया है कि वह इतना
    सूक्ष्म होनेपर भी अनन्त भावसे युक्त होनेमें अर्थात् असीम होनेमें समर्थ है । भाव यह कि वह जड जगत्‌में सर्वत्र व्याप्त है ।
    केवल बुद्धिके गुणोंसे और अपने अहंता, ममता आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण ही एकदेशीय बन रहा है ॥ ९ ॥
    नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः ।
    यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥१०॥
    एषः = यह जीवात्मा; न = न, एव = तो; स्त्री = स्त्री है; न = न; पुमान् = पुरुष है, च = और; न = न;
    अयम् = यह, नपुंसकः एव = नपुंसक ही है, सः = वह; यत् यत् = जिस-जिस, शरीरम् = शरीरको, आदत्ते = ग्रहण
    करता है, तेन तेन = उस-उससे, युज्यते = संवद्ध हो जाता है ॥ १० ॥
    व्याख्या—जीवात्मा वास्तवमें न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है । यह जब जिस शरीरको ग्रहण
    करता है, उस समय उससे संयुक्त होकर वैसा ही बन जाता है । जो जीवात्मा आज स्त्री है, वही दूसरे जन्ममें पुरुष हो
    सकता है; जो पुरुष है, वह स्त्री हो सकता है । भाव यह कि ये स्त्री, पुरुष और नपुंसक आदि भेद शरीरको लेकर हैं;
    जीवात्मा सर्वभेदशून्य है, सारी उपाधियोंसे रहित है ॥ १० ॥
    सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्ग्रासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धिजन्म ।
    कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसम्प्रपद्यते ॥११॥
    सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैः = संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोहसे; च = तथा; ग्रासाम्बुवृष्ट्या = भोजन, जलपान
    और वर्षाके द्वारा, आत्मविवृद्धिजन्म = ( प्राणियोंके ) सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं; देही = यह जीवात्मा;
    स्थानेषु = भिन्न-भिन्न लोकोंमें; कर्मानुगानि = कर्मानुसार मिलनेवाले, रूपाणि = भिन्न-भिन्न शरीरोंको, अनुक्रमेण =
    क्रमसे, अभिसंप्रपद्यते = बार-बार प्राप्त होता रहता है ॥ ११ ॥
    व्याख्या—संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टि—इन सबसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते
    हैं । इसका एक भाव तो यह है कि स्त्री-पुरुषके परस्पर मोहपूर्वक संकल्प, स्पर्श और दृष्टिपातके द्वारा सहवास होनेपर
    जीवात्मा गर्भमें आता है; फिर माताके भोजन और जलपानसे बने हुए रसके द्वारा उसकी वृद्धि होकर जन्म होता है । दूसरा
    भाव यह है कि भिन्न-भिन्न योनियोंमें जीवोंकी उत्पत्ति और वृद्धि भिन्न-भिन्न प्रकारसे होती है । किसी योनिमें तो संकल्पमात्र-
    से ही जीवोंका पोषण होता रहता है, जैसे कछुएके अंडोंका; किसी योनिमें आसक्तिपूर्वक स्पर्शसे होता है, जैसे पक्षियोंके
    अंडोंका, किसी योनिमें केवल आसक्तिपूर्वक दर्शनमात्रसे ही होता है, जैसे मछली आदिका; किसी योनिमें अन्नभक्षणसे और
    जलपानसे होता है, जैसे मनुष्य-पशु आदिका, और किसी योनिमें वृष्टिमात्रसे ही हो जाता है, जैसे वृक्ष-लता आदिका । इस
    प्रकार नाना प्रकारसे सजीव शरीरोंका पालन-पोषण, तुष्टि-पुष्टिरूप वृद्धि और जन्म होते हैं । जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार
    उनका फल भोगनेके लिये इसी प्रकार विभिन्न लोकोंमें गमन करता हुआ एकके बाद एकके क्रमसे नाना शरीरोंको बार-बार
    धारण करता रहता है ॥ ११ ॥
    सम्बन्ध—उसका बार-बार नाना योनियोंमें आवागमन क्यों होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
    स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति ।
    क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥
    देही = जीवात्मा, क्रियागुणैः = अपने कर्मोंके ( संस्काररूप ) गुणोंसे, च = तथा, आत्मगुणैः = शरीरके गुणोंसे ( युक्त
    होनेके कारण ), स्वगुणैः = अहंता ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर, स्थूलानि = स्थूल, च = और, सूक्ष्माणि =