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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 832 में से

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पृष्ठ 402

३७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
नीहारधूमाक्र्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥
ब्रह्मणि योगे = परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले योगमें; (पहले) नीहारधूमाक्र्कानिलानलानाम् =
कुहरा, धुआँ, सूर्य, वायु और अग्निके सदृश; (तथा) खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् = जुगनू, बिजली, स्फटिक
मणि और चन्द्रमाके सदृश; रूपाणि = बहुत से दृश्य, पुरःसराणि [भवन्ति]=योगीके सामने प्रकट होते हैं; एतानि =
ये सब; अभिव्यक्तिकराणि = योगकी सफलताको स्पष्टरूपसे सूचित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥
व्याख्या - जब साधक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ध्यानयोगका साधन आरम्भ करता है, तब उसको अपने
सामने कभी कुहरेके सदृश रूप दीखता है, कभी धूआँ सा दिखायी देता है, कभी सूर्यके समान प्रकाश सर्वत्र परिपूर्ण दीखता
है, कभी निःशब्द वायुकी भाँति निराकार रूप अनुभवमें आता है, कभी अग्निके सदृश तेज दीख पड़ता है, कभी जुगनूके
सदृश टिमटिमाहट सी प्रतीत होती है, कभी बिजलीकी सी चकाचौंध पैदा करनेवाली दीप्ति दृष्टिगोचर होती है, कभी स्फटिक-
मणिके सदृश उज्ज्वल रूप देखनेमें आता है और कभी चन्द्रमाकी भाँति शीतल प्रकाश सर्वत्र फैला हुआ दिखायी देता है।
ये सब तथा और भी अनेक दृश्य योग-साधनकी उन्नतिके द्योतक हैं। इनसे यह बात समझमें आती है कि साधकका ध्यान
ठीक हो रहा है ॥ ११ ॥
पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥
पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते = पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश-इन पाँचों महाभूतोंका सम्यक्
प्रकारसे उत्थान होनेपर; (तथा) पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते = इनसे सम्बन्ध रखनेवाले पाँच प्रकारके योगसम्बन्धी
गुणोंकी सिद्धि हो जानेपर; योगाग्निमयम् = योगाग्निमय; शरीरम् = शरीरको; प्राप्तस्य = प्राप्त कर लेनेवाले, तस्य =
उस साधकको, न = न तो, रोगः = रोग होता है, न = न, जरा = बुढ़ापा आता है; न = और न; मृत्युः = उसकी मृत्यु
ही होती है ॥ १२ ॥
व्याख्या - ध्यानयोगका साधन करते करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश-इन पाँच महाभूतोंका उत्थान
हो जाता है, अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है, और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली
योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्निमय शरीरको प्राप्त कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमे न तो
रोग होता है, न बुढ़ापा आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका
शरीर नष्ट नहीं हो सकता ॥ १२ ॥
लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च।
गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥
लघुत्वम् = शरीरका हल्कापन, आरोग्यम् = किसी प्रकारके रोगका न होना, अलोलुपत्वम् = विषयासक्तिकी निवृत्ति;
वर्णप्रसादम् = शारीरिक वर्णकी उज्ज्वलता; स्वरसौष्ठवम् = स्वरकी मधुरता; शुभः गन्धः = (शरीरमे) अच्छी गन्ध;
च = और, मूत्रपुरीषम् = मल मूत्र, अल्पम् = कम हो जाना; (इन सबको) प्रथमाम् योगप्रवृत्तिम् = योगकी पहली
सिद्धि, वदन्ति = कहते हैं ॥ १३ ॥
व्याख्या - भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले ध्यानयोगीमें पूर्वोक्त शक्तियोंके सिवा और भी शक्तियाँ आ जाती
हैं। उदाहरणतः उसका शरीर हल्का हो जाता है, शरीरमें भारीपन या आलस्यका भाव नहीं रहता। वह सदा ही नीरोग
रहता है, उसे कभी कोई रोग नहीं होता। भौतिक पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नष्ट हो जाती है। कोई भी भौतिक पदार्थ सामने
आनेपर उसके मन और इन्द्रियोंका उसकी ओर आकर्षण नहीं होता। उसके शरीरका वर्ण उज्ज्वल हो जाता है। स्वर अत्यन्त