सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 393
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६५
    पचास अरोंवाले; विंशतिप्रत्यराभिः = बीस सहायक अरोंसे, (तथा) षड्भिः अष्टकैः = छः अष्टकोंसे, [ युक्तम् = युक्त ;]
    विश्वरूपैकपाशम् = अनेक रूपोंवाले एक ही पाशसे युक्त; त्रिमार्गभेदम् = मार्गके तीन भेदोंवाले, (तथा) द्विनिमित्तैक-
    मोहम् = दो निमित्त और मोहरूपी एक नाभिवाले (चक्रको), [ अपश्यन् = उन्होंने देखा ] ॥ ४ ॥
    व्याख्या—इस मन्त्रमें विश्वका चक्रके रूपमें वर्णन किया गया है। भाव यह है कि परम देव परमेश्वरकी
    स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका दर्शन करनेवाले वे ऋषिलोग कहते हैं—हमने एक ऐसे चक्रको देखा है, जिसमें एक नेमि है ।
    नेमि उस गोल घेरेको कहते हैं, जो चक्रके अरों और नाभि आदि सब अवयवोंको वेष्टित किये रहती है तथा यथास्थान
    बनाये रखती है । यहाँ अव्याकृत प्रकृतिको ही 'नेमि' कहा गया है; क्योंकि वही इस व्यक्त जगत्‌का मूल अथवा आधार है ।
    जिस प्रकार चक्केकी रक्षाके लिये उस नेमिके ऊपर लोहेका घेरा (हाल) चढा रहता है, उसी प्रकार इस संसार-चक्रकी
    अव्याकृत प्रकृतिरूप नेमिके ऊपर सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही तीन घेरे हैं। यह पहले ही कह आये हैं कि
    भगवान्‌की वह अचिन्त्यशक्ति तीन गुणोंसे ढकी है। जिस प्रकार चक्केकी नेमि अलग-अलग सिरोंके जोड़से बनती
    है, उसी प्रकार इस संसाररूप चक्रकी प्रकृतिरूप नेमिके मन, बुद्धि और अहङ्कार तथा आकाश, वायु, तेज, जल और
    पृथ्वी—ये आठ सूक्ष्म तत्त्व और इनके ही आठ स्थूल रूप—इस प्रकार सोलह सिरे हैं। जिस प्रकार चक्रमें अरे लगे
    रहते हैं, जो एक ओरसे नेमिके टुकड़ोंमें जुड़े रहते हैं और दूसरी ओरसे चक्केकी नाभिमें जुड़े होते हैं, उसी प्रकार
    इस संसार-चक्रमें अन्तःकरणकी वृत्तियोंके पचास भेद तो पचास अरोंकी जगह हैं और पाँच महाभूतोंके कार्य— दस
    इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच प्राण—ये बीस सहायक अरोंकी जगह हैं। इस चक्रमें आठ-आठ चीजों* के छ.
    समूह अङ्गरूपमें विद्यमान हैं। इन्हींको छः अष्टकोंके नामसे कहा गया है। जीवोंको इस चक्रमें बाँधकर रखनेवाली अनेक
    रूपोंमें प्रकट आसक्तिरूप एक फाँसी है । देवयान, पितृयान और इसी लोकमें एक योनिसे दूसरी योनिमें जानेका मार्ग—
    इस प्रकार ये तीन मार्ग हैं। पुण्यकर्म और पापकर्म—ये दो इस जीवको इस चक्रके साथ-साथ घुमानेमें निमित्त हैं और
    जिसमें अरे टँगे रहते हैं, उस नाभिके स्थानमें अज्ञान है। जिस प्रकार नाभि ही चक्केका केन्द्र है, उसी प्रकार अज्ञान इस
    जगत्‌का केन्द्र है ॥ ४ ॥
    पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ।
    पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥
    पञ्चस्रोतोऽम्बुम् = पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषयरूप जलसे युक्त; पञ्चयोन्युग्रवक्राम् = पाँच स्थानोंसे उत्पन्न
    होकर भयानक और टेढी-मेढी चालसे चलनेवाली; पञ्चप्राणोर्मिम् = पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली, पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् = पाँच
    प्रकारके. ज्ञानके आदि कारण मन ही है मूल जिसका, पञ्चावर्ताम् = पाँच भँवरोंवाली, पञ्चदुःखौघवेगाम् = पाँच दुःख रूप
    प्रवाहके वेगसे युक्त, पञ्चपर्वाम् = पाँच पर्वोंवाली, (और) पञ्चाशद्भेदां = पचास भेदोंवाली (नदीको), अधीमः = हमलोग
    जानते हैं ॥ ५ ॥
  • यहाँ 'अष्टक' शब्दसे क्या अभिप्राय है, ठीक-ठीक पता नहीं चलता । चक्रोंमें भी 'अष्टक' नामका कोई अङ्ग होता है या नहीं,
    और यदि होना है तो उसका क्या स्वरूप होता है तथा उसे अष्टक क्यों कहते हैं—इसका भी कोई पता नहीं चलता । शाङ्करभाष्यमें भी
    'अष्टक' किसे कहते हैं—यह खोलकर नहीं बताया गया । इसीलिये 'षडष्टकम्' पदकी व्याख्या नहीं की जा सकी । शाङ्करभाष्यके अनुसार
    छ अष्टक इस प्रकार हैं—
    ( १ ) गीता ( ७ । ४ ) में उल्लिखित आठ प्रकारकी प्रकृति अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार,
    ( २ ) शरीरगत आठ धातुएँ अर्थात् त्वचा, चमड़ी, मांस, रक्त, मेद, हड्डी, मज्जा और वीर्य,
    ( ३ ) अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व—ये आठ प्रकारके ऐश्वर्य,
    ( ४ ) धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य ( राग ) और अनैश्वर्य—ये आठ भाव,
    ( ५ ) ब्रह्मा, प्रजापति, देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर और पिशाच—ये आठ प्रकारकी देवयोनियाँ,
    और ( ६ ) समस्त प्राणियोंके प्रति दया, क्षमा, अनसूया ( निन्दा न करना ), शौच ( बाहर-भीतरकी पवित्रता ), अनायास,
    मङ्गल, अकृपणता ( उदारता ) और अस्पृहा—ये आत्माके आठ गुण ।