सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

२७ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
गुणों और दूषणोंसे वह लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार देहादि
उपाधियोंमें रहता हुआ भी आत्मा उपाधियोंके तत्तद्गुणों और
दूषणोंसे भूषित और दूषित नहीं होता । उत्पत्तिविपरीत-
क्रमेण सम्पूर्ण प्रपञ्चको अधिष्ठानस्वरूप प्रत्यग् ब्रह्ममें लय कर
देनेसे ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है, अथवा वागुपलक्षित
बाह्येन्द्रियोंको मनमें, मनको ज्ञानात्मा अहम्अर्थमें, उसे अस्मिता-
मात्रमें, उसे शान्तशुद्ध चिद्घनमें प्रतिसङ्घट कर लेनेपर फिर
शुद्ध अद्वितीय ब्रह्म ही स्फुरित होता है ।
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञ तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥
इसी वस्तुस्थितिको एकमेवके 'एव' से दृढ किया गया है।
इसीको 'नेह नानास्ति किञ्चन', 'नात्र काचन भिदा' के 'किञ्चन'
एव 'काचन' से स्पष्ट किया गया है । अचिन्त्यानिर्व्वाच्य मायाके
कारण सकल वाङ्मनसव्यपदेशभाक् प्रत्यक् चिति ही सकल-
मनोवचनप्रपञ्चातिगता है । यही उपनिषदोंका सार है । फिर
भी पूर्णरूपेण वर्णाश्रमानुसारी, धर्मानुष्ठान एव परा भगवद्भक्ति-
के बिना उपनिषदर्थबोध एव तन्निष्ठा अत्यन्त दुर्लभ है ।
इसीलिये—
तमेतमात्मान ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन
विविदिषन्ति ।
—इत्यादि वचनोंद्वारा वेदनेच्छा या इष्यमाण वेदनमें यज्ञ
तप दानादिका उपयोग बतलाया गया है । ब्रह्मचर्य, सद्उपासना,
सदाचार आदिका पद पदपर उपनिषदोंमे समर्थन मिलता है ।
पञ्चाग्नि विद्या, वैश्वानर विद्या, दहर-विद्या आदि अनेक
उपासनाओका प्रतिपादन भी ब्रह्माक्षात्कारकी सुविधाके लिये
ही किया गया है । लय एव विक्षेप दोनों ही अवस्थाओंमे
तत्त्वसाक्षात्कारमे कठिनाई पडती है । सुषुप्तिकी निद्रा एव
जाग्रत्-स्वप्नका द्वैतदर्शन अवरुद्ध हो, तब निश्चल अनिद्र
प्रबुद्ध अविक्षिप्त चित्तपर प्रत्यग्ब्रह्मका साक्षात्कार होता है ।
यलातिदायमाभ्य निर्विकल्प समाधान अथवा सुषुप्ति-प्रबोध
सन्धि, वृत्तिसन्धि तथा दण्डायमान दीर्घनिर्विकल्पवृत्तिपर
युक्तिसे ब्रह्मानुभव किया जा सकता है । फिर भी उपनिषन्माना
पनेय ब्रह्माश्नय ब्रह्मविषयक मूलज्ञानके नाशार्थ उपनिषद्विचार
अत्यन्त अपेक्षित ह । परम्परासे जो विधिवत् उपनीत नहीं है
या उपनयनके अधिकारी नहीं है, उन्हे गीता, वासिष्ठ, भागवत,
विष्णुपुराणादिके श्रवणद्वारा भी तत्त्वबोध प्राप्त हो सकता है ।
—«»—
रस-ब्रह्म
( रचयिता—पाण्डेय प० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम' )
कोई शम-दममें नियममें निरत कोई
जप-तप व्रत-उपवासनामें रत हैं।
आसन बिछाये पद्मासन लगाये दृढ
कोई श्वास-वायुकी ही शासनामें रत है ॥
होके यज्ञ-यागमें प्रवृत्त सानुराग कोई
स्वर्गके निवासकी ही वासनामे रत है।
कोई शब्द-ब्रह्म कोई अर्थ-ब्रह्म ढूँढ़ा करें
हम रस-ब्रह्मकी उपासनामें रत हैं ॥
बतला रही है नित्य-मुक्त वेदवानी जिसे
देखो नन्दरानीने उलूखलमे बाँधा है।
पूरन अकाम, लिये प्रकट सकाम-भाव
प्याती जिसे प्रणयसुधाका रस राधा है ॥
जगको नचाता वही नाचता निकुञ्ज-बीच
गोप-गोपियोंने इस भाँति उसे साधा है।
वेदोंमें न ढूँढ़, उपनिषद्-निगूढ रस
व्रज-सरबस बस एक वही काँधा है ॥