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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 832 में से

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पृष्ठ 289
  • मुण्डकोपनिषद् * २६३
    ब्रह्मा=ब्रह्माने, याम्=जिस विद्याका, अथर्वणे=अथर्वाको, प्रवदेत=उपदेश दिया था; ताम् ब्रह्मविद्याम्=वही
    ब्रह्मविद्या, अथर्वा=अथर्वाने, पुरा=पहले; अङ्गिरे=अङ्गी ऋषिको; उवाच=कही; सः=उन अङ्गी ऋषिने; भारद्वाजाय=
    भरद्वाज-गोत्री, सत्यवहाय=सत्यवह नामक ऋषिको, प्राह=बतलायी; भारद्वाजः=भारद्वाजने; परावराम्=पहलेवालोंसे
    पीछेवालोंको प्राप्त हुई उस परम्परागत विद्याको, अङ्गिरसे=अङ्गिरा नामक ऋषिको, [ प्राह=कहा ] ॥ २ ॥
    व्याख्या—अथर्वा ऋषिको जो ब्रह्मविद्या ब्रह्मासे मिली थी, वही ब्रह्मविद्या उन्होंने अङ्गी ऋषिको बतलायी और
    अङ्गीने भरद्वाज-गोत्रमे उत्पन्न सत्यवह नामक ऋषिको कही । भारद्वाज ऋषिने परम्परासे चली आती हुई ब्रह्मके पर और
    अपर—दोनों स्वरूपोंका ज्ञान करानेवाली इस ब्रह्मविद्याका उपदेश अङ्गिरा नामक ऋषिको दिया ॥ २ ॥
    शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं
    विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥
    ह=विख्यात है ( कि ); शौनकः वै=शौनक नामसे प्रसिद्ध मुनिने; महाशालः=जो अति बृहत् विद्यालय (ऋषिकुल)
    के अधिष्ठाता थे, विधिवत्=शास्त्रविधिके अनुसार; अङ्गिरसम् उपसन्नः=महर्षि अङ्गिराकी शरण ली; (और उनसे )
    पप्रच्छ=( विनयपूर्वक ) पूछा; भगवः=भगवन्; नु=निश्चयपूर्वक; कस्मिन् विज्ञाते=किसके जान लिये जानेपर,
    इदम्=यह; सर्वम्=सब कुछ, विज्ञातम्=जाना हुआ, भवति=हो जाता है; इति=यह ( मेरा प्रश्न है ) ॥ ३ ॥
    व्याख्या—शौनक नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे, जो बड़े भारी विश्वविद्यालयके अधिष्ठाता थे, पुराणोंके अनुसार उनके
    ऋषिकुलमे अठासी हजार ऋषि रहते थे । वे उपर्युक्त ब्रह्मविद्याको जाननेके लिये शास्त्रविधिके अनुसार हाथमें समिधा लेकर
    श्रद्धापूर्वक महर्षि अङ्गिराकी शरणमे आये । उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—'भगवन् ! जिसको भलीभाँति जान
    लेनेपर यह जो कुछ देखने, सुनने और अनुमान करनेमे आता है, सब-का-सब जान लिया जाता है, वह परम तत्त्व क्या
    है ? कृपया बतलाइये कि उसे कैसे जाना जाय' ॥ ३ ॥
    तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥
    तस्मै=उन शौनक मुनिसे, सः ह=वे विख्यात महर्षि अङ्गिरा, उवाच=बोले, ब्रह्मविदः=ब्रह्मको जाननेवाले,
    इति=इस प्रकार, ह=निश्चयपूर्वक, वदन्ति स्म यत्=कहते आये हैं कि, द्वे विद्ये=दो विद्याएँ, एव=ही, वेदितव्ये=जानने
    योग्य है, परा=एक परा, च=और, अपरा=दूसरी अपरा, च=भी ॥ ४ ॥
    व्याख्या—इस प्रकार शौनकके पूछनेपर महर्षि अङ्गिरा बोले—'शौनक ! ब्रह्मको जाननेवाले महर्षियोंका कहना है
    कि मनुष्यके लिये जाननेयोग्य दो विद्याएँ हैं—एक तो परा और दूसरी अपरा ॥ ४ ॥
    तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिष-
    मिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥
    तत्र=उन दोनोंमेंसे, ऋग्वेदः=ऋग्वेद; यजुर्वेदः=यजुर्वेद, सामवेदः=सामवेद; ( तथा ) अथर्ववेदः=अथर्ववेद,
    शिक्षा=शिक्षा, कल्पः=कल्प, व्याकरणम्=व्याकरण; निरुक्तम्=निरुक्त, छन्दः=छन्द; ज्योतिषम्=ज्योतिष, इति
    अपरा=ये ( सब तो ) अपरा विद्या ( के अन्तर्गत हैं ), अथ=तथा, यया=जिससे; तत्=वह, अक्षरम्=अविनाशी परब्रह्म,
    अधिगम्यते=तत्त्वसे जाना जाता है, [ सा=वह, ] परा=परा विद्या ( है ) ॥ ५ ॥
    व्याख्या—उन दोनोंमेंसे जिसके द्वारा इस लोक और परलोकसम्बन्धी भोगों तथा उनकी प्राप्तिके साधनोंका ज्ञान
    प्राप्त किया जाता है, जिसमें भोगोंकी स्थिति, भोगोंके उपभोग करनेके प्रकार, भोग-सामग्रीकी रचना और उनको उपलब्ध
    करनेके नाना साधन आदिका वर्णन है, वह तो अपरा विद्या है; जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये
    चारों वेद । इनमें नाना प्रकारके यज्ञोंकी विधिका और उनके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन है । जगत्के सभी पदार्थोंका एव
    विषयोंका वेदोंमें भलीभाँति वर्णन किया गया है । यह अवश्य है कि इस समय वेदकी सब शाखाएँ उपलब्ध नहीं हैं और