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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 832 में से

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पृष्ठ 236

२१४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
यः=जो मनुष्य, प्रयत:=सर्वथा शुद्ध होकर, इमम्=इस परमम् गुह्यम्=परम गुह्य रहस्यमय प्रसङ्गको,
ब्रह्मसंसदि=ब्राह्मणोंकी सभामे, श्रावयेत्=सुनाता है, वा=अथवा, श्राद्धकाले=श्राद्धकालमे, श्रावयेत्=( भोजन करने-
वालोको ) सुनाता है, तत्=( उसका ) वह श्रवण करानेरूप कर्म, आनन्त्याय कल्पते=अनन्त होनेमे ( अविनाशी फल
देनेमे ) समर्थ होता है; तत् आनन्त्याय कल्पते इति=वह अनन्त होनेमे समर्थ होता है ॥ १७ ॥
व्याख्या--जो मनुष्य विशुद्ध होकर सावधानीपूर्वक इस परम रहस्यमय प्रसङ्गको तत्त्वविवेचनपूर्वक भगवत्प्रेमी
शुद्धबुद्धि ब्राह्मणोंकी सभामे सुनाता है अथवा श्राद्धकालमे भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है; उसका यह वर्णनरूप कर्म
अनन्त फल देनेवाला होता है । अनन्त होनेमें समर्थ होता है । दुबारा कहकर इस सिद्धान्तकी निश्चितता और अध्यायकी
समाप्तिका लक्ष्य कराया गया है ॥ १७ ॥
ᅳ॥ तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥