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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 832 में से

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पृष्ठ 211
  • कठोपनिषद् * १८९
    त्वत्प्रसृष्टम्=आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीतः=वे मुझपर विश्वास करके (यह वही
    मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर), अभिवदेत्=मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत्=यह; त्रयाणाम्=
    अपने तीनों वरोंमेंसे प्रथमम् वरम्=पहला वर, वृणे=मैं माँगता हूँ ॥ १० ॥
    व्याख्या-मृत्युदेव ! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके
    आवेगमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दुखी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा सन्तुष्ट हो
    जायें । और आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ
    पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें ॥ १० ॥
    सम्बन्ध-यमराजने कहा-
    यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
    सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
    त्वाम्=तुमको; मृत्युमुखात्=मृत्युके मुखसे, प्रमुक्तम्=छूटा हुआ, ददृशिवान्=देखकर, मत्प्रसृष्टः=मुझसे
    प्रेरित, आरुणिः=(तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र, औद्दालकिः=उद्दालक, यथा पुरस्तात्=पहलेकी भाँति ही; प्रतीतः=यह
    मेरा पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके, वीतमन्युः=दुःख और क्रोधसे रहित, भविता=हो जायेंगे; रात्रीः=(और
    वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें, सुखम्=सुखपूर्वक, शयिता=शयन करेंगे ॥ ११ ॥
    व्याख्या-तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुणपुत्र उद्दालक बड़े
    प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे, तथा उनका दुःख और क्रोध सर्वथा शान्त हो
    जायगा । तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे ॥ ११ ॥
    सम्बन्ध-इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज !-
    स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
    उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
    स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें, किंचन भयम्=किंचिन्मात्र भी भय; न अस्ति=नहीं है, तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप
    स्वय आप भी नहीं हैं, जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता, स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी;
    अशनायापिपासे=भूख और प्यास, उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर, शोकातिगः=दुःखोंसे दूर रहकर, मोदते=
    आनन्द भोगते हैं ॥ १२ ॥
    स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँ श्रद्धानाय मह्यम् ।
    स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥
    मृत्यो=हे मृत्युदेव, सः त्वम्=वे आप, स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि=
    जानते हैं (अतः), त्वम्=आप, मह्यम्=मुझ, श्रद्धानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या), प्रब्रूहि=भलीभाँति समझा-
    कर कहिये, स्वर्गलोकाः=स्वर्गलोकके निवासी, अमृतत्वम्=अमरत्वको, भजन्ते=प्राप्त होते हैं (इसलिये), एतत्=यह (मैं);
    द्वितीयेन वरेण=दूसरे वरके रूपमे, वृणे=माँगता हूँ ॥ १३ ॥
    व्याख्या-मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है । स्वर्गमे न तो कोई
    वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न, जैसे मर्त्यलोकमे आप (मृत्यु) के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे, कोई मारा ही जाता है । वहाँ
    मृत्युकालीन सङ्कट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं, वैसे वहाँ नहीं जलना
    पड़ता । वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं। परन्तु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता ।
    हे मृत्युदेव ! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमे श्रद्धा है,