सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197
  • केनोपनिषद् * १७९
    तस्मिन् त्वयि=उक्त नामोंवाले तुझ अग्निमें; किं वीर्यम्=क्या सामर्थ्य है; इति=यह बता; (तब अग्निने यह
    उत्तर दिया कि) अपि=यदि (मैं चाहूँ तो); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; यत् इदम्=यह जो कुछ भी है, इदम् सर्वम्=इस सबको,
    दहेयम् इति=जलाकर भस्म कर दूँ ॥ ५ ॥
    व्याख्या—अग्निकी गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने अनजानकी भाँति कहा—'अच्छा ! आप अग्निदेवता हैं और जातवेदा—
    मन्त्रका ज्ञान रखनेवाले भी आप ही हैं ? बड़ी अच्छी बात है; पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है, आप क्या कर
    सकते हैं।' इसपर अग्निने पुनः सगर्व उत्तर दिया—'मैं क्या कर सकता हूँ, इसे आप जानना चाहते हैं? अरे, मैं चाहूँ तो इस
    मारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमे आ रहा है, सबको जलाकर अभी राखका ढेर कर दूँ' ॥ ५ ॥
    तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते,
    नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥
    (तब उस दिव्य यक्षने); तस्मै=उस अग्निदेवके सामने; तृणम्=एक तिनका; निदधौ=रख दिया, (और यह कहा
    कि) एतत्=इस तिनकेको; दह इति=जला दो; सः=वह (अग्नि); सर्वजवेन=पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय=उस
    तिनकेपर टूट पड़ा (परंतु), तत्=उसको; दग्धुम्=जलानेमें; न एव शशाक=किसी प्रकार समर्थ नहीं हुआ, ततः=(तब
    लज्जित होकर) वहाँसे; निववृते=लौट गया (और देवताओंसे बोला); पतत्=यह; विज्ञातुम्=जाननेमें; न अशकम्=
    मैं समर्थ नहीं हो सका (कि वस्तुतः); पतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; यत् इति=कौन है ॥ ६ ॥
    व्याख्या—अग्निदेवताकी पुनः गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ता-शक्ति देनेवाले यक्षरूपी परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे
    एक सूखा तिनका डालकर कहा—'आप तो सभीको जला सकते हैं, तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको जला दीजिये।'
    अग्निदेवताने मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे । जलाना चाहा, जब नहीं जला तो
    उन्होंने उसे जलानेके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी। पर उसको तनिक-सी आँच भी नहीं लगी । आँच लगती कैसे ।
    अग्निमे जो अग्नित्व है—दाहिका शक्ति है, वह तो शक्तिके मूल भडार परमात्मासे ही मिली हुई है। वे यदि उस शक्ति-
    स्रोतको रोक दें तो फिर शक्ति कहाँसे आयेगी । अग्निदेव इस बातको न समझकर ही डींग हाँक रहे थे। पर जब ब्रह्मने अपनी
    शक्तिको रोक लिया, सूखा तिनका नहीं जल सका, तब तो उनका सिर लज्जासे झुक गया और वे हतप्रतिज्ञ और हतप्रभ होकर
    चुपचाप देवताओंके पास लौट आये और बोले कि 'मै तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है' ॥ ६ ॥
    अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥
    अथ=तब, वायुम्=वायुदेवतासे, अब्रुवन्=(देवताओँने) कहा; वायो=हे वायुदेव ! (जाकर); पतत्=इस
    बातको, विजानीहि=आप जानिये—इसका भलीभांति पता लगाइये (कि); एतत्=यह, यक्षम्=दिव्य यक्ष, किम् इति=
    कौन है; (वायुने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा । ॥ ७ ॥
    व्याख्या—जब अग्निदेव असफल होकर लौट आये, तब देवताओंने इस कार्यके लिये अप्रतिमशक्ति वायुदेवको
    चुना और उनसे कहा कि 'वायुदेव ! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' वायुदेवको भी अपनी
    बुद्धि-शक्तिका गर्व था; अतः उन्होंने भी कहा—'अच्छी बात है; अभी पता लगाता हूँ' ॥ ७ ॥
    तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥८॥
    तत्=उसके समीप; अभ्यद्रवत्=(वायुदेवता) दौड़कर गया, तम्=उससे (भी); अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने)
    पूछा, कः असि इति=(कितुम) कौन हो, अब्रवीत्=(तब वायुने) यह कहा (कि), अहम्=मै, वै वायुः=प्रसिद्ध
    वायुदेव, अस्मि इति=हूँ; (और यह कि) अहम् वै=म ही, मातरिश्वा=मातरिश्वाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ८ ॥
    व्याख्या—वायुदेवताने सोचा, 'अग्नि कहीं भूल कर गये होंगे, नही तो यक्षका परिचय जानना कौन बड़ी बात
    थी । अस्तु, इस सफलताका श्रेय मुझको ही मिलेगा।' यह सोचकर वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे । उन्हें अपने समीप