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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 832 में से

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पृष्ठ 191
  • केनोपनिषद् * १७५
    है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशका यह प्रभाव है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु अपने विषयोंको
    देखता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ६ ॥
    यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् ।
    तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७ ॥
    यत्=जिसको ( कोई भी ), श्रोत्रेण=श्रोत्रके द्वारा, न=नहीं, शृणोति=सुन सकता, [ अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे,
    इदम्=यह; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; श्रुतम्=सुनी हुई है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान,
    इदम् यत्=श्रोत्र-इन्द्रियके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं; इदम्=यह;
    न=ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥
    व्याख्या—जो कुछ भी सुननेमें आनेवाला पदार्थ है तथा प्राकृत कानोंसे सुने जानेवाले जिस वस्तु-समुदायकी उपासना
    की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है । परब्रह्म परमेश्वर श्रोत्रेन्द्रियसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना
    ही कहा जा सकता है कि जो श्रोत्र-इन्द्रियका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें सुननेकी शक्ति देनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी
    अंशसे श्रोत्र-इन्द्रियमें शब्दको ग्रहण करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे श्रोत्र अपने
    विषयोंको सुननेमें प्रवृत्त होता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ७ ॥
    यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
    तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥
    यत्=जो, प्राणेन=प्राणके द्वारा, न प्राणिति=चेष्टायुक्त नहीं होता, [ अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे, प्राणः=प्राण;
    प्रणीयते=चेष्टायुक्त होता है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=प्राणोंकी शक्तिसे
    चेष्टायुक्त दीखनेवाले जिन तत्त्वोंकी, उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=ये, न=ब्रह्म नहीं हैं ॥ ८ ॥
    व्याख्या—प्राणके द्वारा जो कुछ भी चेष्टायुक्त की जानेवाली वस्तु है, तथा प्राकृत प्राणोंसे अनुप्राणित जिस तत्त्वकी
    उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है । परब्रह्म परमेश्वर उनसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल
    इतना ही कहा जा सकता है कि जो प्राणका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त
    करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है, वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है । इस
    मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे प्राण विचरता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ।
    सारांश यह कि प्राकृत मन, प्राण तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं; अतएव
    उनको परब्रह्म परमेश्वर परात्पर पुरुषोत्तमका वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता । इसलिये उनकी उपासना भी परब्रह्म
    परमेश्वरकी उपासना नहीं है । परब्रह्म परमेश्वरके मन-बुद्धि आदिसे अतीत स्वरूपको साङ्केतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ
    गुरुने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक, प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है ॥ ८ ॥
    प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
    द्वितीय खण्ड
    यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ।
    यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमाꣳस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥
    'यदि=यदि, त्वम्=तू, इति=यह, मन्यसे=मानता है (कि), सुवेद=(मैं ब्रह्मको) भलीभाँति जान गया हूँ;
    अपि=तो, नूनम्=निश्चय ही, ब्रह्मणः=ब्रह्मका, रूपम्=स्वरूप, दभ्रम्=थोड़ा-सा, एव=ही, (तू) वेत्थ=जानता है; (क्योंकि)
    अस्य=इस (परब्रह्म परमेश्वर) का, यत्=जो (आंशिक) स्वरूप, त्वम्=तू है, (और) अस्य=इसका, यत्=जो (आंशिक)
    स्वरूप, देवेषु=देवताओंमें है, [ तत् अल्पम् एव=वह सब मिलकर भी अल्प ही है, ] अथ नु=इसीलिये, मन्ये=मैं मानता
    हूँ कि; ते विदितम्=तेरा जाना हुआ, (स्वरूप) मीमांस्यम् एव=निस्सन्देह विचारणीय है ॥ १ ॥