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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 832 में से

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पृष्ठ 171

अध्यात्मवाद
( रचयिता—प० श्रीरघुनाथप्रसादजी शास्त्री 'साधक' )
जागो पुनः अमर भारतमें, ओ अजेय अध्यात्मवाद !
देश-जाति-जनता-उर-नभमें, आज घिरे घन-सघन-विषाद् ।
अनाचार, अतिचार, पाप, पर-पीडनकी रणभेरी है ।
अपना स्वत्व सुरक्षित करने, पर-विनाशकी ढेरी है ।
सर्व-स्वत्व-संरक्षित करने, हरने आततायी अतिवाद ,
निर्भय रण-प्रांगणमें आकर, गाओ ब्राह्मी-विजयनिनाद् ।
ओ अजेय अध्यात्मवाद !
भेद-भाव बहु भाँति भरे हैं, बन्धु-भावना लुप्त हुई ।
सहयोगिता, सुसेवा, समता, प्रेम-भावना सुप्त हुई ।
अन्तर्दाह कलह-कायरता, कलुषित काम-क्रोध दुर्वाद ।
आकर शीघ्र समाज जातिके, दूर करो सब निंद्य विवाद ।
ओ अजेय अध्यात्मवाद !
विविध मतोंके पन्थ-प्रवर्त्तन, गतिमय बहु विध अग जगमें ।
व्यापक, शास्त्र, समर्थन करते स्वयं सिद्ध बन प्रति पगमें ।
किन्तु मानवोंको कर पाये वे गत-संशय तनिक न आज ।
ओ वेदान्तकेसरी ! गर्जन करो, मिटा दो गीदड़-गाज ।
ओ अजेय अध्यात्मवाद !
वर्गवाद, श्रमवाद अनेकों, वर्तमान जगतीतलमें ।
संघर्ष-भूमिका रचते, नित उत्पाती प्रतिपलमें ।
शान्त, महाप्रभु शंकरके ओ ! चिरपरिचित अद्वैतवाद ।
करो समन्वय सभी वर्गके, करके यावत् शान्त विवाद ।
ओ अजेय अध्यात्मवाद !
व्यापक आत्म-तत्त्व चेतनका, मानवको दे करके ज्ञान ।
ऐक्य-भावना-निष्ठ, इष्ट हो, 'साधक' विश्व-जगत् उत्थान ।
आदिस्रोत कल्याण ! ध्यानमय श्रवण समुत्सुक शुभ संवाद ।
सरस-सुधा-सम-वरद प्राप्त कर सरसित, सागर-सम आह्लाद ।
जागो पुनः अमर भारतमें—ओ अजेय अध्यात्मवाद !
ओ अजेय अध्यात्मवाद !