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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 832 में से

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पृष्ठ 16

औपनिषद-ब्रह्मका सर्वातीत और सर्वकारण-स्वरूप तथा
उसके जाननेका फल
( १ )
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको
यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम् ।
तमीशानं वरदं देवमीड्यं
निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥
योनि-योनि—कारण-कारणके जो हैं एक अधिष्ठाता,
जिनमें सब विलीन होता जग, जिनसे यह उद्भव पाता ।
वे आराध्य वरद ईश्वर हैं, वे ही देव—अलौकिक कान्ति,
उन्हें तत्त्वसे जान यहाँ मानव पाता है शाश्वत शान्ति ॥
( २ )
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये
विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥
परम सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, हृदयकी गहन गुफामें छिप जाने,
अति महान् वे, घेर विश्वको एकमात्र ही छवि पाते ।
वे ही एक जगत्-स्रष्टा हैं, विविध रूपमें वे आते,
जान उन्हीं मङ्गलमय प्रभुको शान्ति सनातन नर पाते ॥
( ३ )
स एव काले भुवनस्य गोप्ता
विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः ।
यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च
तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥
वे ही स्थितिके समय भुवनके संरक्षक, जगके स्वामी,
सब भूतोंमे छिपे हुए हैं, वे ही बन अन्तर्यामी ।
उनका ही ब्रह्मर्षि, देवगण एक चित्त हो करते ध्यान,
जान उन्हें यों मनुज मृत्युके तोड़ डालता पाश महान ॥
( ४ )
घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं
ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥
माखनमें स्थित सारभाग-से परम सूक्ष्म जो अतिशय सार,
एकमात्र सब ओर व्याप्त जो घेरे हुए सकल संसार ।