सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159
  • भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १४५
    कहते हैं, वे ही रघुवंश-शिरोमणि राम मेरे स्वामी हैं—
    ( १ ) पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ ।
    रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ ॥
    ( २ ) विषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥
    सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥
    ( ३ ) जौं सपने सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ॥
    जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपालु रघुराई ॥
    ( ४ ) बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ विधि नाना ॥
    आननरहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बक्ता बड जोगी ॥
    तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ॥
    जेहि इमि गावहिं वेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान ।
    सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान ॥
    ( ५ ) कासीं मरत जतु अवलोकी । जासु नाम बल करउँ बिलोकी ॥
    सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुबर सब उर अन्तरजामी ॥
    और अन्तमे उपसहार करते हुए भगवान् शङ्करने
    कहा—
    अस निज हृदयँ बिचारि तज संसय भजु राम पद ।
    सुनु गिरिराजकुमारि भ्रम-तम रविकर बचन मम ॥
    कल्याणमय शिवकी भ्रमभञ्जक वचनावलीको सुनकर
    गिरिराजकन्दिनीका सारा संदेह जाता रहा और राघवेन्द्र
    श्रीरामके श्रीचरणोंमें उन्हें अनुपम अनुराग हो गया । भगवान्
    शङ्करके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे बोलीं—
    ससिकर सम सुनि गिरा तुम्हारी । मिटा मोह सरदातप भारी ॥
    तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ । राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ ॥
    नाथ कृपाँ अब गयउ विषादा । सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा ॥
    श्रीपार्वतीजी ही नहीं, भूतभावन भगवान् शिवके इस
    पवित्र भाषणसे वहाँका कण-कण अपनेको कृतकृत्य अनुभव
    करने लगा ।
    उपर्युक्त विवेचनसे अवधेशशिरोमणि भगवान् श्रीरामका
    औपनिषद ब्रह्मसे अभेद ही नहीं सिद्ध होता, बल्कि उनके
    विशेषज्ञत्वका भी प्रतिपादन होता है । श्रीरामचरितमानसमें ऐसे
    प्रसङ्ग और भी हैं, उनमेंसे एक प्रसङ्गको संक्षेपमे लिखकर लेख
    समाप्त किया जाता है ।
    भगवान् श्रीराघवेन्द्र तथा उनके अनुज श्रीलक्ष्मणजी
    महामुनि गुरु विश्वामित्रजीके साथ मिथिला पधारते हैं ।
    विश्वामित्रजीकी आज्ञासे नगरसे बाहर सभी एक सुन्दर आम्र-
    वाटिका में ठहरते हैं । यह समाचार जब श्रीमिथिलेशको मिलता
    है तो वे परम प्रसन्न होकर पवित्र मन्त्री, सैनिक, ब्राह्मण,
    श्रेष्ठ गुरु और जातिके सरदारोंको साथ लेकर मुनिराजके
    दर्शनार्थ पधारते हैं । उस समय श्रीराघवेन्द्र अनुज श्रीलक्ष्मण-
    जी के साथ पुष्पवाटिका देखने गये हुए थे । उनके पीछेसे
    सौभाग्यशाली महाराज जनक मुनिराजको साष्टाङ्ग प्रणाम
    करके और उनका आशीर्वाद प्राप्त करके एवं अन्यान्य
    ब्राह्मणोंको सादर नमस्कार करके मुनिकी आज्ञासे वहाँ- बैठ
    जाते हैं । इतनेमें ही मृदु-वयस किशोर, नेत्रानन्द-दाता,
    विश्वचित्त-चौर श्याम-गौर दोनों भ्राता वहाँ आ पहुँचते हैं ।
    उनके वहाँ पहुँचते ही इतना सहज प्रभाव पड़ता है कि सभी तेज-
    ज्ञान-वयोवृद्ध, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, वीरेन्द्र, विप्रेन्द्र आदिके
    सहित जीवन्मुक्त शिरोमणि तथा सच्चे जिज्ञासुओंको ब्रह्म-तत्त्वका
    उपदेश देनेवाले विदेहराज जनक सहसा उठ खड़े होते हैं
    और अपने-आप बैठना भूल जाते हैं । मुनि विश्वामित्रके
    बैठानेपर बैठते हैं । उस समय सबकी क्या दशा होती है और
    प्रेम-सुधा-सागर-निमग्न विदेहराज मुनिराजसे क्या पूछते हैं,
    इसको रामचरितमानसकी भाषामे ही सुनिये—
    भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । वारि विलोचन पुलकित गाता ॥
    मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ विदेहु विदेहु विसेषी ॥
    प्रेममगन मनु जानि नृपु करि विवेकु धरि धीर ।
    बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर ॥
    कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक । मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥
    ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय वेष धरि की सोइ आवा ॥
    सहज विरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चंद-चकोरा ॥
    इन्हहि विलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥
    जिनके दिव्य मधुर सौन्दर्यके दर्शनमात्रसे सहज वैराग्य-
    मय चित्तवाले जनक चकोर बनकर श्रीराघवेन्द्रके मुखचन्द्रको
    निर्निमेष देखते रह जाते हैं, इतना आत्यन्तिक प्रेमानन्द
    उत्पन्न होता है कि उनका ब्रह्मानन्दमें नित्य-निमग्न मन उसे
    छोड़ देनेको बाध्य होता है और आँखोंसे आँसू बहाते हुए
    गद्गद होकर वे बड़ी गम्भीरताके साथ जिन सौन्दर्य-सुधा-
    निधिका सच्चा परिचय जानना चाहते हैं, वे रामचरितमानसके
    श्रीराघवेन्द्र साक्षात् औपनिषद ब्रह्म हैं या ब्रह्मसे भी बढ़कर
    कोई परम तत्त्वविशेष हैं, इसका विचार विज्ञ और रसिक
    पाठक ही करें ।
    उ० अं० १९–२०—