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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 832 में से

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पृष्ठ 137

यहाँ पृष्ठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

  • वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है * १२३
    दी। वेदमे इन वस्तुओंका विधान नहीं है।* असुर
    शब्दका अर्थ है—प्राणका पोषण करनेवाला। जो अपने सुखके
    लिये दूसरे प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, वे सभी असुर हैं। आसुरी
    प्रकृतिके मनुष्य पढ-लिखकर विद्वान् हो जानेपर भी देहा-
    सक्ति और देहाभिमान नहीं छोड़ पाते। वे शास्त्र इसीलिये
    पढते हैं कि शास्त्रका मनमाना अर्थ करके अपने मतकी
    पुष्टि कर सकें। अतः शास्त्रसे वे यथार्थ ज्ञानको नहीं ग्रहण
    कर पाते। केवल शब्दोंकी व्युत्पत्ति करके खींचतानसे चाहे
    जो अर्थ निकाल लेना अपनेको और दूसरोंको भी धोखा
    देना है। वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं। महर्षियों तथा मेधावी
    महात्माओंने वेदार्थको समझनेके लिये भी कुछ पद्धतियाँ
    निश्चित की हैं, उन्हींके अनुसार चलकर हमें श्रद्धापूर्वक
    वेदार्थको समझनेका यत्न करना चाहिये। भगवान्‌से प्रार्थना
    करनी चाहिये कि वे अन्तःकरणमें स्थित होकर कृपापूर्वक
    वेदोंके सत्य अर्थको प्रकट कर दें। भगवान्‌का आश्रय लेकर
    यदि वेदार्थका विचार किया जाय तो भगवत्कृपासे निश्चय
    ही सत्य अर्थका साक्षात्कार हो सकता है।
    ऋग्वेदमे लिखा है—‘यज्ञेन वाचं पदवीयमानम्’ अर्थात्
    समस्त वेदवाणी यज्ञके द्वारा ही स्थान पाती है। अतः वेदका
    जो भी अर्थ किया जाय, वह यज्ञमें कहीं-न-कहीं अवश्य
    उपयुक्त होता हो—यह ध्यान रखना आवश्यक है। वेदार्थके
    औचित्यकी दूसरी कसौटी यह है—
    बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे । (वैशेषिकदर्शन)
    अर्थात् वेदवाणीकी प्रकृति बुद्धिपूर्वक है। अतः वेदमन्त्र-
    का अपना किया हुआ अर्थ बुद्धिके विपरीत न हो—बुद्धिमें
    बैठने योग्य हो, इस बातपर भी ध्यान रखनेकी आवश्यकता
    है। साथ ही यह भी देखना उचित है कि हमने जो अर्थ
    किया है, वह तर्कसे सिद्ध तो होता है न ? हमारा अर्थ तर्कसे
    असङ्गत तो नहीं ठहरता ? निरुक्तकार कहते हैं—ऋषियोंके
    उत्क्रमण करनेपर मनुष्योंने देवताओंसे पूछा—'अब हमारा
    ऋषि कौन होगा ? कौन हमें वेदका अर्थ निश्चित करके
    बतावेगा ? तब देवताओंने उन्हें तर्क नामक ऋषि प्रदान
    किया।'* अतः तर्कसे गवेषणापूर्वक निश्चित किया हुआ अर्थ
    ऋषियोंके अनुकूल ही होगा। स्मृतिकार भी कहते हैं—
    यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नापरः ।
    'जो तर्कसे वेदार्थका अनुसन्धान करता है, वही
    धर्मको जानता है, दूसरा नहीं।' अतः समुचित तर्कसे
    समीक्षा करना वेदार्थके परीक्षणका तीसरा मार्ग है। चौथी
    रीति वह है कि इस बातपर दृष्टि रक्खी जाय कि हमारा
    किया हुआ अर्थ शब्दके मूलधातुके विपरीत तो नहीं है;
    क्योंकि निरुक्तकारने धातुज अर्थको ही ग्रहण किया है।
    पतञ्जलिने भीअपने महाभाष्यमे इसकी चर्चा की है--'नाम च
    धातुजमाह निरुक्ते।' इन चारो हेतुओको सामने रखकर यदि
    वेदार्थपर विचार किया जाय तो भ्रमकी सम्भावना नहीं रहेगी।
    प्रकृति स्वभावतः निम्नगामिनी होती है, अतः प्रकृतिके वश-
    मे रहनेवाले मनुष्यकी प्रवृत्ति स्वभावतः विषयभोगकी ओर होती
    है। शास्त्र ईश्वरीय ज्ञान हैं, वे मनुष्यकी उच्छृङ्खल प्रवृत्तिको रोकने
    और उसे धर्मएव सदाचारसे प्रतिष्ठित करनेके लिये ही अवतीर्ण
    हुए हैं। वेद तो साक्षात् भगवान्‌की वाणी हैं, अतः उनमें
    कोई ऐसी बात हो ही नहीं सकती, जो मनुष्यको अनर्गल
    विषयभोग एव हिंसाकी ओर जानेके लिये प्रोत्साहन देती हो।
    वह तो असत्‌से सत्‌की ओर जानेकी ही प्रेरणा देती है।
    अतः तर्क और बुद्धिसे यही ठीक जान पड़ता है कि वेद
    हिंसात्मक या अनाचारात्मक कार्योंके लिये आदेश नहीं दे
    सकते। यदि कहीं कोई ऐसी बात मिलती है तो वह अर्थ
    करनेवालोंकी ही भूल है। प्रायः यज्ञमे पशु-वधकी बात
    बतायी जाती है। परंतु यज्ञके ही जो प्राचीन नाम मिलते
    हैं, उनसे यह सिद्ध हो जाता है कि यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक
    होते आये हैं। 'न्वर' शब्दका अर्थ है हिंसा। जहाँ ध्वर
    अर्थात् हिंसा न हो, उसीका नाम 'अध्वर' है। यह 'अध्वर'
    शब्द यज्ञका ही पर्याय है। अतः हिंसात्मक कृत्य कभी यज्ञ
    नहीं माना जा सकता। 'यज' धातुमे 'यज्ञ' बनता है।
    इसका अर्थ है—देवपूजा, सङ्गतिकरण और दान। इनमेंसे
    किसीके द्वारा भी हिंसाका समर्थन नहीं प्राप्त होता। गो-
    यज्ञमे गायोंकी पूजा ही होती है, जहाँ असुर सदासे गाय आदि
    पशुओंको मारकर अपनी रक्त-पिपासा शान्त करते आये हैं,
    वहीं देवयज्ञमे गौओंको 'अघ्न्या' (न मारने योग्य) बताकर
    पूज्य ठहराया गया है। आज भी देवताओंके वंशज गोपूजक हैं।
    --- पाद-टिप्पणियाँ ---
  • श्रूयते हि पुरा कल्पे नॄणा व्रीहिमयो पशु ।
    येनायजन्त यज्वान पुण्यलोकपरायणा ॥
    (महा० अनु० ११५।५६)
    सुरा मत्स्यान् मधु मांसमासव कृसरौदनम् ।
    धूर्त प्रवर्तित ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥
    (महा० शान्ति० २६५।९)
  • मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषर्भविष्यतीति ।
    तेभ्य एत तर्क्रमृर्षि प्रायच्छन् (निरुक्त २।२०)