कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ औपनिषद आत्मतत्त्व ❊ ११३
( ३ ) औपनिषद आत्मतत्त्वसम्बन्धी निम्न प्रकारकी
विप्रतिपत्तियाँ उपस्थित की जा सकती हैं—
१—औपनिषद आत्मतत्त्व शरीरादि (भौतिक तत्त्व) से विलक्षण
है या नहीं ?
२- ,, विभु किंवा अणु ?
३- ,, परिणामी सावयव किं वा नहीं ?
४- ,, ज्ञानादिका आश्रय किं वा तत्स्वरूप ?
५- ,, जगत्का उपादानकारण किंवा निमित्त ?
६- ,, अद्वितीय ही कारण, किं वा अनेक
अन्य भी ?
७- ,, का जीवसे भेद किं वा अभेद ?
१. आत्मतत्त्व शरीरादिसे विलक्षण
पूर्वपक्ष—
‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतः समाः ।'
( ईश० २ )
कर्म करते हुए ही सैकड़ो वर्ष जीवनेच्छाका आदेश देते
हुए यह श्रुति बतलाती है कि 'जीवन ही सब कुछ है और
मरनेके बाद कुछ नहीं है।' इसलिये इस प्रकारके कर्म करो
जिससे तुम्हारा जीवन, जो कि पृथिव्यादि जड़तत्त्वोंके समुदाय-
में 'किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत्' है, बहुत समयतक रहे।
यदि शरीरादिसे विलक्षण आत्मा हो और मरनेपर भी वह
विद्यमान हो, तो फिर सैकड़ों वर्ष जीवित रहनेकी इच्छाका
क्या महत्त्व ? जब कि वृद्धावस्था भी सन्निकट ही रहती है।
शरीरमें कष्ट होनेपर उसके रक्षणका भी क्यों उपाय करें, यदि
आत्माका कुछ बिगड़ता न हो।
'यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः तेजः समुद्भूतम्,
स्त्रिया सिञ्चति सास्यैतमात्मानम् अत्रगतं भावयति।'
( ऐतरेय० )
'वीर्यस्वरूप आत्मा स्त्रीमें सिञ्चित होता है और स्त्री
उसे ( पतिकी ) आत्मा मानकर पालती है।'
• 'सस्यमिव मर्त्यं पच्यते' ( कठोपनिषद् )
'अथ चैनं नित्यजातम्' ( गीता २ । २६ )
'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म' ( गीता २ । २७ )
उपर्युक्त वचनोंसे भी यही ज्ञात होता है कि आत्मा
भौतिक तत्त्व है, शरीरादिसे विलक्षण नहीं है।
उत्तरपक्ष—'कुर्वन्नेवेह' इस श्रुतिका पूर्वोक्त तात्पर्य
नहीं है। आत्मतत्त्वको समझकर पुत्रैषणादिको छोड़कर ससार
उ० अ० १५—
से परे जो निरतिशय सुख प्राप्त नहीं कर सकता, वह अनात्मज्ञ
पुरुष यज्ञादि शुभ कर्म करते हुए ही अपना आयुष्य पूर्ण
करे। यही तात्पर्य है । रेत:सिञ्चनको प्रथम जन्म एव
उत्पत्तिको द्वितीय जन्म जो कहा है, वह आत्माके प्राकट्यके
अवच्छेदक शरीरके सम्बन्धमें है, आत्मामें औपचारिक
कथन है।
इसी शरीरात्माका निराकरण यमराजने नचिकेताके
प्रश्नोत्तरमे किया है—
‘येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीतिचैके।'
( कठोपनिषद् १ । १ । २० )
'मनुष्य मरनेके बाद रहता है या नहीं ?' इस प्रश्नका
उत्तर यमराजने यही दिया कि—
तत्ते पदँ संग्रहण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥'
न जायते म्रियते वा विपश्चि-
न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्य शाश्वतोऽय पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
( कठोपनिषद् १ । २ । १५, १८ )
यहाँ यही आत्माका लक्षण बतलाते हुए सिद्ध कर दिया
कि शरीरादि भौतिक तत्त्व सब विनाशी हैं । वे आत्मा
नहीं है, क्योकि आत्मा अजर-अमर है । अर्थात् वह 'जायते'
आदि षड्भावोसे रहित है ।
इन्द्रियेभ्य परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च पर मन ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥
( कठोपनिषद् १ । ३ । १० )
वह आत्मा इन्द्रिय, पृथिव्यादि विषय, अन्त:करणादि
सबसे भिन्न है । शरीरसे सुतरा विलक्षण है ।
२. औ० आत्मतत्त्व विभु
पूर्वपक्ष—शरीरादि विलक्षण आत्मा अणु है, ऐसा
सम्प्रदायाचार्यादि मानते हैं । उनका आशय है कि—
‘अणोरणीयान्' ( कठोपनिषद् १ । २ । २० )
यह आत्माका स्वरूप है ।
अङ्गुष्ठमात्र पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनाना हृदये सन्निविष्ट ।
( कठोपनिषद् २ । ३ । १७ )
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा तमात्मस्थम् ॥
( कठोपनिषद् २ । २ । १२ )
इन श्रुतियोंसे आत्माका परिमाण अङ्गुष्ठमात्र ही मालूम
होता है ।