कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ] [ २७५
फिर दिग्विजय द्वारा धर्म-विहीन और कलिप्रिय राजाओ और
बौद्धो का सहार कर मरु और देवापि को प्रतिष्ठित करोगे । तुम्हारा
यह साधुकृत्य ही मुझको सतुष्ट करने वाली दक्षिणा होगी, क्योकि तब
हम तप, यज्ञ, दान, ध्यान, आदि सभी कर्म भले प्रकार से कर सकेगे ।१०-
११। यह सुन कर और गुरुवर परशुरामजी को नमस्कार करके कल्कि
भगवान् बिल्वोदकेश्वर महादेव के मन्दिर मे गये और उन्हे सन्तुष्ट करने
लगे ।१२। हृदय मे स्थित उन आशुतोष शान्त स्वरूप शिवजी का उन्होने
विधिवत् पूजन किया और प्रणाम तथा ध्यान के पश्चात् निवेदन
किया ।१३।
गौरीनाथ विश्वनाथ शरण्यंभूतावास वासुकीकण्ठभूषम् ।
त्र्यक्ष पञ्चास्यादिदेव पुराणं वन्दे सान्द्रनन्दसन्दोहदक्षम् ।
योगाधीश कामनाश कराल गङ्गासङ्गाक्लिन्नमूर्द्धानमीशम् ।
जटाजूटाटोपरिक्षिप्तभाव महाकाल चन्द्रभाल नमामि ॥
श्मशानस्थभूतबेतालसङ्ग नानाशस्त्रै. खड्गशूलादिभिश्च ।
व्यग्रात्युग्रा बाहवो लाकनाशे यस्य क्रोधोद्भूतलोकोऽनमेति ।
यो भूतादि पञ्चभूतंसिसृक्षु. तन्मात्रात्मा काल कर्मस्वभावे
प्रहृत्येद् प्राप्य जीवत्वमीशो ब्रह्मानन्दो रमते त नमामि ॥
स्थितौ विष्णु सर्वजिष्णुः सुरात्मा लोकान् साधून् धर्ममेतून्
बिभर्ति। ब्रह्माद्याशे योऽभिमानी गुणात्मा शब्दाद्यङ्गैस्तपरेश
नमामि । यज्ञस्या वायवो वान्ति लोके ज्वलत्याग्नि सविता
यातितप्यन् । शीताशु खेतारकैः सग्रहैश्च प्रवर्तते त परेश
प्रपद्ये । यस्याश्वासात् सर्वधात्री धरित्री देवो वर्षत्यम्बु काल.-
प्रमाता । मेरुमध्ये भुवनानाञ्च भर्त्ता तमीशानविश्वरूप
नमामि ।१४-२०।
कल्किजी ने कहा--हे गौरीपते ! हे विश्वेश्वर ! हे शरणागत-
वत्सल ! हे सर्वभूताश्रय ! हे वासुकी नाग का कण्ठभूषण धारण करने