कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० ] [ कल्कि पुराण
निस्साराः प्रतिमाकारा भवन्ति भुवनाश्रया ।३७।
बौद्धा शौद्धोदनाद्यग्रे कृत्वा तामग्रतः पुनः ।
योद्धुं समागता म्लेच्छकोटिलक्षशतैर्वृताः ।३८।
सिंहध्वजोत्थितरथा फेरु-काक-गणान्विताम् ।
सर्वास्त्रशस्त्रजननीं षड्वर्गपरिसेविताम् ।३९।
नानारूपां बलवतीं त्रिगुणाव्यक्तिलक्षिताम् ।
मायां निराक्ष्य पुरतः कल्किसेना समापतत् ।४०।
तब शुद्धोदन ने कवि को अत्यन्त पराक्रमी और रथ-सेना से
सम्पन्न देख कर कर माया देवी आह्ववानाथ तुरन्त ही वहाँ से
प्रस्थान किया ।३६। जिस माया देवी का दर्शन करते ही देवता, दैत्य,
मनुष्य आदि सभी सांसारिक जीव तेजहीन और प्रतिमा के समान
निश्चेष्ट हो जाते हैं, उसी को साथ लेकर शुद्धोदन आदि बौद्धगण अपने
करोड़ो म्लेच्छ वीरो के सहित रणस्थल में पहुँचे ।३७-३८। सिंहध्वजा
वाले रथ पर माया देवी आरूढ हुई और उसने अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्र
प्रकट किये । कौए और शृगाल उस माया देवी को सब ओर से घेरे हुए
थे तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—यह षड्वर्ग उसकी
सेवा कर रहे थे ।३९। वह अनेक प्रकार के रूप-धारण में समर्थ, बल-
वती, त्रिगुणात्मिका माया देवी जैसे ही कल्कि सेना के समक्ष पहुँची,
वैसे ही उसे देख कर कल्कि-सेना क्षीणता को प्राप्त हो गई ।४०।
निःसारा प्रतिमाकाराः समस्ता शस्त्रपाणयः ।४१।
कल्किसतानालोक्य निजान्भ्रातृज्ञातिसुहृज्जनान् ।
मायया जायया जीर्णान्विभुुरासीत्तदग्रतः ।४२।
तामालोक्य वरारोहा श्रीरूपा हरिरीश्वरः ।
सा प्रियेव तमालोक्य प्रविष्टा तस्य विग्रहे ॥४३॥
तामनोलोक्य ते बौद्धा मातरं कतिश्चा वराः ।
रुरुदुः सघशो दीना हीनस्वबलपौरुषाः ॥४४॥