कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
९० શ્રીકાલિકા પુરાણ
सहस्राक्ष, गौतम, पूर्व भाग में अवस्थित सनत्कुमार, आत्रेय, भार्गव,
विनतासुता, मरुद्गण साध्य, आग्नेय जातवेदा को देखा था। काल,
चित्रगुप्त, कुम्भयोनि, गालव, समस्त विश्वेदेवा, कव्यवाह आदि पितृगणों
को देखा था। समस्त अग्निष्वात आदिक को और चारों प्रकार के
भूतग्राम को, सौम, प्रेतगणों को, दक्षिण दिशा में अवस्थित सिद्धों को
देखा था। वहाँ पर शम्भु ने राक्षसों को, पिशाचों को, भूतों को, मृग,
पक्षियों को, कव्यादों को, क्षुद्र जन्तुओं को तथा पुण्य जनेश्वर को देखा
था। महर्षि मौद्गल को, नैऋत्य दिशा में राहु को तथा किन्नरों को,
महारों को, नक्रों को, मत्स्यों को, ग्राहों को, कच्छपों को, सात समुद्रों
को, सिन्धु को, नदियों को, तीर्थों को और गुह्यकों को देखा था।
मानस आदि सब मनुओं को तथा गंगा नदियों को, कामदेव को,
मधु को, बसन्त को और अनुगों के सहित वरुण को देखा था।
शनैश्चर को, समस्त पर्वतों को जो पश्चिम दिशा में व्यवस्थित थे।
प्राणादि पाँचों वायुओं और गणों के सहित समीरण को, कल्पद्रुमों को,
हेमवान् पर्वत को और महामुनि कश्यप को देखा था। वायव्य दिशा में
कमल व्रति को और फलों को तथा कलानिधि को, अनेक रत्नों को,
हेमों को, मनुष्यों को तथा पर्वतों को देखा था। हिमाद्रि जिनमें प्रमुख
था और यज्ञ, स्थूल, कर्णादि, बुध, नर, कुबेर के सहित नरवाह
यक्षराज, ध्रुव, धर और सोम, विष्णु, अनिल और अनल, प्रत्यूष, प्रभास
इन सबको कौवेरी दिशा में समवस्थित हुए देखा था। वृषभध्वज के बिना
समस्त रुद्रों को, जीवों को तथा मनुओं को, विविध बाहु से संजात
वैश्यों को और सभी ओर शूद्रों को देखा था। ऐशानी दिशा में विविध
भाँति के अन्नों को, ब्रीहियों को, तिलों को भी देखा था। ऐशानी और
पूर्व दिशा के मध्य में सशत व्रतों से संयुत ब्रह्मर्षियों को देखा था।
चारों महर्षियों को, वेदों को और छै वेदों के अंगों को देखा था।
नैऋत्य और पश्चिम दिशा के अन्तःस्थित आनन्द श्वेत पर्वत को देखा
था। सहस्र काद्रवेय के सहित सात भोगियों को, वहाँ पर ही केतु की
ओर डाकिनियों से समन्वित कूष्माण्ड को देखा था तथा नाना वर्णों से
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संयुत तथा विद्युत् के सहित अन्य जलधरों को वहीं पर स्थित दिग्गजों
को, जिनमें ऐरावत प्रमुख था भगवान् हर ने देखा था। यथास्थान पर
दिक्करिणी से समन्वित सबको देखा था। महान् धन से संयुत उस यज्ञ
को दूर ही से देखकर शिव ने वीरभद्र नामक गण को शीघ्र ही उसकी
ओर प्रेषित किया था। वह वीरभद्र महागण भी बहुत से अनेक गणों
संवृत हुआ था। उसने महात्मा दक्ष के यज्ञ का फिर ध्वंस कर दिया
था। उस महान् यज्ञ के विध्वंस करते हुए वीरभद्र को देखकर समस्त
देवगणों से आवृत भगवान् वैकुण्ठ ने वरण किया था। उनको निवारण
करते हुए देखकर ही ईश्वर के लोचन क्रोध से लाल हो गये वे फिर
ईश्वर स्वयं ही उस महायज्ञ में प्रविष्ट हो गये थे और उस यज्ञ का
ध्वंस कर दिया था।
भग आगे से ही उस यज्ञ में प्रवेश करते हुए उनको सर्वप्रथम
देखकर अपनी बाहुओं को फैलाकर भगत्त्वरा से संयुत होकर भगवान्
भूतेश के पास गया था। उसको सामने आते हुए देखकर भगवान् भर्ग
भी अत्यन्त कुपित हो गये थे और अपनी अंगुलि के अग्रभाग के प्रहार
से उन्होंने उस भग के नेत्रों का हनन कर दिया था। नेत्रों से हीन
विरुपाक्ष भग को देखकर दिवाकर से त्वरायुक्त होते हुए स्पर्धा करने
वाले भगवान् शर्व के समीप आये थे। इसके उपरान्त महादेव ने सूर्य
को कर से पकड़कर हाथ से दूर हटाकर अत्यन्त क्रोध युक्त होकर उस
यज्ञ की ओर ही धावमान हो गये थे। मार्त्तण्ड (सूर्य) हँसते हुए बड़े
वेग के साथ दोनों बाहुओं को फैलाकर कहने लगा आओ, मैं तुम्हारे
साथ युद्ध करूँगा। इतना कहकर सूर्य ने उस शिव को आगे चलकर
फिर रोक दिया था। हँसते हुए उस सूर्य के दाँतों को वृषभध्वज ने
क्रोधयुत होकर हाथ के ही प्रहार से मुख से गिरा दिया था। इस प्रकार
से सूर्य को बिना दाँतों वाला तथा भग को हीन मन्त्रों वाला देखकर
समस्त देवगण, ऋषि लोग और जो भी वहाँ पर अन्य थे वे सब भाग
गये थे।
भगवान् सब देवगण आदि को भागकर परमाधिक कोप वाले होते
९२ ੴ श्रीकालिका पुराण ੴ
हुए वे मृग के रूप से अपमान करते हुए उस यज्ञ को ही पकड़ने के
लिए पीछे दौड़े थे । वह यज्ञ भी आकाश के मार्ग के द्वारा ब्रह्मस्थान
में प्रवेश कर गया था । वृषभध्वज भी उसके पीछे से कुपित होते हुए
ब्रह्मस्थान को गमन कर गये थे । भर्ग से डरा हुआ यज्ञ ब्रह्मा के कहने
पर नीचे उतर आया था और अवतरित होकर अपनी माया से सती के
देह में प्रवेश कर गया था । भगवान् भर्ग भी मृत हुई दक्ष की दुहिता
के निकट चले गये थे उस समय में भर्ग पीछे हो गए थे और वहाँ पर
यज्ञ तथा सती के शव को उन्होंने देख लिया था । उस समय भगवान्
हर ने दाक्षायणी देवी सती को मृता देखकर यज्ञ को भूलकर उसके
समीप में स्थित हुए उन्होंने बहुत अधिक उस सती के विषय में शोक
किया था । शूलपाणि भगवान् शम्भु अनेक प्रकार के सती के गुण
गणों का चिन्तन करते हुए उस देवी सती की परमाधिक सुन्दर दाँतों
की पंक्ति को, कमल के समान प्रकाशित मुख को, अरुण दर्शन वस्त्र,
उसकी दोनों भृकुटियों के जोड़े को देखकर बहुत ही तीव्रतर शोक से
व्याकुल होकर रुदन करने लगे थे ।
विजया सखी के शोक विचार
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- उस अवसर पर भगवान शिव दक्षा के
गुणगणों को परिगणन करते हुए हुए अत्यधिक दुःख से प्रपीड़ित
होकर प्राकृत मनुष्य की ही भाँति शोकाकुल हो गये थे । उस समय में
विलाप करते हुए शिव को जानकर अर्थात् सती के वियोग में शम्भु को
रुदन करते हुए देखकर कामदेव, रति और बसन्त के सहित महेश्वर प्रभु
के समीप में प्राप्त हो गया था । उस रति के पति कामदेव ने शोक से
अत्यन्त परिभ्रष्ट उस शम्भु को जो भ्रष्ट चेतना वाले और रुदन करने
वाले थे, एक ही साथ अपने पाँचों बाणों से प्रहार किया था। शोक
के कारण अभिहत चित्त वाले भी शम्भु कामदेव के बाणों के प्रहार
से व्याकुल होकर अत्यन्त ही संकीर्ण भाव को प्राप्त हो गये थे और
उन्होंने बहुत शोक किया था और वे मोह को भी प्राप्त हो गये थे
श्रीकालिका पुराण ९३
अर्थात् शोक के वेग से मूर्छित हो गये थे । वे एक क्षण में तो
शोकाकुल होकर भूमि पर गिर जाया करते थे और एक क्षण में ही
उठकर दौड़ लगाते थे । एक ही क्षण में वे भ्रमण करने लगते थे अथवा
चक्कर काटा करते थे और फिर वे विभु वहीं पर अपने नेत्रों को
निमीलित कर लिया करते थे। किसी समय में देवी दाक्षायणी का
ध्यान करते हुए हास करने वाले हो जाते थे अर्थात् खूब अधिक हँसते
रहा करते थे। किसी समय में भूमि में लेटी हुई उस सती का आलिंगन
किया करते थे मानों वह रस के भावों से युक्त ही स्थित होवे । भगवान
शंकर 'हे सती! हे सती!' इस प्रकार से निरन्तर सती के नाम का कथन
करके ऐसा कहा करते थे कि अब इस व्यर्थ में किए हुए नाम का
परित्याग कर दो। ऐसा कहकर अपने हाथ से उस सती के शव का
स्पर्श किया करते थे। शम्भु भगवान् अपने हाथ से इस सती का
परिमार्जन करके उसके यथास्थित अलंकारों को विश्लेषित करके
अर्थात् शरीर से दूर करके फिर उन अलंकारों को वहाँ पर ही अर्थात्
उस सती के मृत शरीर पर अलंकारित किया करते थे। तात्पर्य यह है
कि कभी तो आभूषणों को सती के मृत शव से दूर हटा लेते थे और
उसी सती को सजीव समझकर आभूषणों को उनके अंगों में धारण
कराया करते थे।
भूतेश्वर भगवान् शम्भु के इस प्रकार से विलाप-कलाप करने पर
भी जिस समय में वह मृत हुई सती ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया था तो
उस समय भगवान् शिव शोक की उद्गाढ़तापूर्वक अत्यधिक रूदन
करने लगे थे। जब वे रूदन कर रहे थे तो उसके आँसू नीचे गिर रहे
थे। उस समय में देवगण ने उसको देखा था और वे ब्रह्मादिक देव
चिन्ता में परायण होते हुए अत्यधिक चिन्तातुर हो गये थे । भूमि पर
गिरे हुए ये वाष्पक अर्थात् आँसू यदि पृथ्वी का दाह कर देंगे तो वहाँ
पर क्या उपाय करना चाहिए अर्थात् इन आँसुओं के द्वारा पृथ्वी का
दाह का क्या प्रीतकार होगा इससे ये सभी हा-हाकार करने लगे थे ।
इसके अनन्तर ब्रह्मादिक देवों के शनैश्चर के साथ विचार किया था
९४ ∾ श्रीकालिका पुराण ∾
और उन्होंने भगवान् शम्भु के जो मोह के वशीभूत हो गए थे वाष्पों को
धारण करने हेतु शनैश्चर का स्तवन किया था। देवगण ने कहा-हे
महान् भाग्य वाले! हे शनैश्चर देव! आप तो लोकों पर अनुग्रह करने
वाले हैं। हे मूलशक्ति से समुत्पन्न होने वाले! आपका जन्म तो सूर्यदेव
से ही हुआ है। आपके लिए हमारा नमस्कार समर्पित है। हाथ में शूल
धारण करने वाले, पाश को धारण करने वाले और धनुर्धारी आपको
नमस्कार है। आपका हस्त वरदान देने वाला है और अन्य तम की
छाया के आत्मज हैं-ऐसे आपको नमस्कार है।
हे नील मेघ के सदृश! आप पिसे हुए अञ्जन के तुल्य हैं। समस्त
लोकों के प्राणों के धारण करने में कारणस्वरूप आपके लिए प्रणाम।
आपको नमस्कार होवे। हे भगवान्! आप शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न हो
जाइए। भगवान् शम्भु के शोक से समुत्पन्न हुए वाष्पों आँसुओं से
हमारी इस पृथिवी की रक्षा करो। जिस प्रकार से पुरातन समय में वर्षों
तक वृष्टि का अवरोध किया था और आप ही ने मेघों से होने वाली
वृष्टि को रोक दिया था अब उसी भाँति भगवान् हर के शोक के गिरे
हुए वाष्पों के जल में भी कीजिए। अर्थात् इस आँसुओं के जल को
भी रोक दीजिए। आपके द्वारा जलों का ग्रहण करना देखकर पुष्कर
आदि उन मेघों ने महेन्द्र की आज्ञा से निरन्तर वर्षा को छोड़ा था अर्थात्
सतत वृष्टि करते रहे थे। आपने पहले पूर्व समय में उस सम्पूर्ण वर्षा
के जल को आकाश ही में विनष्ट कर दिया था। अब उसी भाँति
भगवान् शिव के आँसुओं के जल को भी नष्ट करने के लिए प्रयत्न
कीजिए। भगवान् शिव के वाष्पों के निवारण करने के कार्य से अन्य
कोई भी आपके बिना सामर्थ्य रखने वाला नहीं है। यह शिव के शोक
से समुत्पन्न आँसुओं का जल देव गन्धर्वों के सहित तथा पर्वतों के
सहित ब्रह्मलोकों का दाह कर देगा। ऐसी ही इन आँसुओं के जल में
दाहकशक्ति विद्यमान है। वह वाष्पों का जल इस भूमण्डल में गिरा है
इसलिए आप अपनी माया से इनको धारण करो।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा- समस्त देवों द्वारा इस प्रकार से भाषण
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ९५
किए जाने पर सूर्य पुत्र शनैश्चर ने अत्यन्त दयार्द्र मन वाला होकर उन
देवों को प्रत्युत्तर दिया था। शनैश्चर ने कहा-हे सुरों में श्रेष्ठों! अपनी
शक्ति के अनुसार ही आपका कार्य करूँगा किन्तु ऐसी ही होना चाहिए
कि दाह करने वाले मुझको भगवान् शम्भु न जान लेवें। महान् दुःख
और शोक के व्याकुल वाष्पधारी शिव के समीप में उनके कोप से यदि
वह जान लेंगे तो मेरा शरीर निश्चय ही नष्ट हो जायेगा-इसमें लेशमात्र
भी संशय नहीं है। इस कारण से ऐसा ही करिए कि जिस प्रकार से
सती के पति भूतेश्वर शिव मुझको न जान पावें और उनके नेत्रों से मैं
पृथक ही बना रहूँ। मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इसके पश्चात् वहाँ से
ब्रह्मा आदि समस्त देवता शंकर के समीप में गये थे और सांसारिक
योगमाया के द्वारा शम्भु को उन्होंने पुनः अधिक मोहित कर दिया था।
शनैश्चर भी उसी समय भूतेश्वर के समीप में पहुंच गया था और उस
दुराधर्म वाष्पों की वृष्टि को माया से रोक दिया था। जब ऐसी स्थिति
उत्पन्न हो गई थी तो वह शनैश्चर भी शम्भु के वाष्पों को धारण करने
में असमर्थ हो गया था तो उसके द्वारा जलधारक महागिरि पर वे वाष्प
प्रक्षिप्त किय गये थे।
लोकालोक पर्वत के समीप में जलधारा वाष्प वाला गिरि है जो
पुष्कर द्वीप के पृष्ठ में स्थित है। वह तोय सागर के पश्चिम में है। वह
सब परिमाण से मेरु पर्वत के सदृश है। उस समय में असमर्थ शनैश्चर
ने उस पर ही वाष्पों को विन्यस्त कर दिया था। वह पर्वत भी शम्भु
के उन वाष्पों को धारण करने में समर्थ नहीं हुआ था। उन वाष्पों के
समुदायों से वह पर्वत विदीर्ण हो गया था और शीघ्र ही मध्य भाग में
भग्न हो गया था। उन वाष्पों ने उस पर्वत का भेदन करके वे फिर तोय
सागर में प्रवेश कर गये थे। वे वाष्प अतीव क्षार थे कि वह सागर भी
ग्रहण करने में समर्थ नहीं हुआ था। इसके अनन्तर सागर को मध्य में
भेदन करके वे वाष्प सागर की पूर्व में रहने वाली बेला पर समागत हो
गये थे तथा स्पर्श मात्र से उन्होंने उस बेला का भेदन कर दिया था।
पुष्कर द्वीप के मध्य में गमन करने वाले ने वाष्प बेला का भेदन करके
सती के शरीर के खण्ड-खण्ड होकर गिरना
९६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
वैतरणी नदी हो गये थे और पूर्व सागर में गमन करने वाले हो गये थे ।
जलधारा के भेद से और सागर के संसर्ग से कुछ सौम्यता को प्राप्त
होकर फिर उन्होंने पृथ्वी का भेदन नहीं किया था ।
सती के शरीर के खण्ड-खण्ड होकर गिरना
इसके अनन्तर शोक से विमूढ़आत्मा वाले शम्भु विलाप करते हुए
उस मृत सती के शव ( मृत देह ) को अपने कन्धे पर रखकर प्राच्य
देशों को चले गए थे । एक उन्मत्त की भाँति गमन करने वाले इन
शंकर के भाव को देवगणों ने देखकर ब्रह्मा आदि देवगण शव के भ्रष्ट
होने के कर्म के विषय में चिन्ता करने लगे थे । भगवान् शंकर के शरीर
के स्पर्श से यह शव विकीर्णता को प्राप्त नहीं होगा फिर किस रीति
से उस वृषभध्वज के कन्धे से इस शव का भ्रंश होगा । यही चिन्तन
करते हुए वे ब्रह्मा विष्णु और शनैश्चर योगमाया से अदृश्य होते हुए
सती के शव के अन्दर प्रवेश कर रहे थे । देवों ने इसके उपरान्त सती
के शव के अन्दर प्रवेश करके उन्होंने उस सती के शव के खण्ड-खण्ड
कर दिए थे और विशेष रूप से स्थान-स्थान में उन खण्डों को भूतल
में गिरा दिया था । देवीकूट के दोनों चरणों को सबसे प्रथम भूमि में
निपातित किया था । उड्डीपान में दोनों उरुओं के युग्म को जगतों के
हित के लिए भूमि पर उसको डाला था ।
कामगिरि कामरूप में योनि मण्डल गिरा था और वहाँ पर ही
पर्वत की भूमि में सती के शव का नाभिमण्डल गिरा था । जालन्धर में
सुवर्ण के हार से विभूषित स्तनों को जोड़ा गिरा था, पूर्वगिरि में अस
और ग्रीवा पतित हुए और फिर कामरूप से शिर पतित हुआ था ।
भगवान् शंकर जितने भूमि के भाग में सती के शव लेकर गये थे उतना
ही प्राच्यों में याज्ञिक देश कीर्तित हुआ था । अन्य जो सती शव के
अवयव थे वह छोटे-छोटे टुकड़ों में देवों के द्वारा खण्डित कर दिए गये
थे । हे द्विजो! जहाँ-जहाँ पर सभी सती के पाद आदि पर्यन्त शरीर के
अवयव गिरे थे वहाँ-वहाँ पर ही महादेव स्वयं लिंग के स्वरूप धारण
श्रीकालिका पुराण ९७
करने वाले हो गये थे और वे मोह से समायुक्त होकर सती के प्रति
स्नेह के वशीभूत होकर स्थित हो गये। ब्रह्मा-विष्णु और शनैश्चर ने
भी समस्त देवगणों ने परम प्रीति के साथ सती के पाद आदि
शरीरावयवों की और ईश की पूजा की थी।
देवीकूट में महादेवी महाभाग, इस नाम से गान की जाया करती
हैं। जगत् के प्रभु योगनिद्रा सती के दोनों चरणों में लीन हैं। उड्डीयान
में कात्यायनी और कामरूप वाली कामाख्या हैं। पूर्णगिरि व पूर्णेश्वरी
है तथा जालन्धर गिरि में चण्डी इस नाम से विख्यात है। कामरूप के
पूर्वान्त में देवी दिकुरवासिनी है तथा ललितकान्ता, इस नाम से
योगनिद्रा का गान किया जाता हैं। जहाँ पर सती का शिर गिरा था वहाँ
पर वृषभध्वज उस शिर का अवलोकन करके लम्बी श्वास लेते हुए
शोक के परायण होकर उपविष्ट हो गये थे। भगवान् शंकर के
उपविष्ट हो जाने पर वहाँ पर ब्रह्मा आदि देवगण दूर से ही शिव को
सान्त्वना देते हुए उनके समीप में गये थे। भगवान् शंकर ने आते हुए
देवों का अवलोकन करके शोक और लज्जा से समन्वित होते हुए वहीं
पर शिवत्व को प्राप्त होकर लिंग के स्वरूप को प्राप्त हो गये थे।
भगवान शंकर के लिंग का स्वरूप प्राप्त हो जाने पर ब्रह्मा आदि
देवगणों ने उन लिंग के स्वरूप वाले जगतगुरू त्र्यम्बक भगवान् का
वहाँ पर ही स्तवन किया था।
देवगण ने कहा-महानदेव शिव, स्थाणु, उग्र, रुद्र, वृषभध्वज-
श्मशान में निवास करने वाले, सबका अन्तःकरण, पर, भर्ग को हम
भक्ति-भाव से नीललोहित शंकर को प्रणाम करते हैं जो गिरीश,
वरदान देने वाले, भूत भावन और अव्यय देव हैं। अनादि, मध्य और
संसार की योगविद्या वाले शम्भु के लिए नमस्कार है जो परमशिव,
शान्त, ब्रह्म और लिंगमूर्ति हैं उनके लिए नमस्कार है। जटिल अर्थात्
जटाजूट वाले, गिरीश, विद्या की शक्ति के धारण करने वाले, शिव,
शान्त ब्रह्म और लिंग की मूर्ति वाले आपके लिए नमस्कार है।
ज्ञानरूपी अमृत के अन्त तथा सम्पूर्ण शुद्ध देहान्तर, शिव, शान्त, ब्रह्म
९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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और लिंगमूर्ति के लिए नमस्कार है । आदि और मध्य तथा अन्त
स्वरूप, स्वभाव अनल की दीप्ति वाले, शिव, शान्त, ब्रह्म और
लिंगभूमि वाले के लिए नमस्कार है । प्रलय के अन्त में विराजमान,
प्रलय और स्थिति के कारण, शिव, शान्त, ब्रह्म और लिंगमूर्ति के
लिए नमस्कार है ।
जो परों से भी पर हैं और उससे पर परमात्मा है उसके लिए,
शिव, शान्त, ब्रह्म और लिंगमूर्ति के लिए नमस्कार है । ज्वालाओं की
मालाओं से समावृत अंगों वाले, विश्व के रूप वाले, शिव, शान्त ब्रह्म
और लिंगमूर्ति आपके लिए प्रणिपात समर्पित है । परमार्थ स्वरूप, ज्ञान
के दीप अर्थात् प्रकाश करने वाले, वेधा, शिव, शान्त, ब्रह्म और
लिंगमूर्ति आपके लिए ओंकार के सहित नमस्कार है । हे दाक्षायणी के
पतिदेव! हे मृड! हे शर्व! हे महेश्वर! हे सब भूतों के ईश! हे शिव! हे
भगवान् आपके नमस्कार है आप प्रसन्न होइए । हे लोकों के स्वामिन्!
हे महेश्वर! आपको शोक के सहित चेष्टा करते हुए होने पर सभी
देवगण समाकुल हैं इसलिए आप अब इस शोक का परित्याग कर
दीजिए । हे भूतों के ईश! आपको नमस्कार है-नमस्कार है । हे सब
कारणों के भी कारण! प्रसन्न होइए । हम सबकी रक्षा करो और शोक
का त्याग कर देवें । आपके लिए नमस्कार है ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से भली-भाँति स्तवन किए
गए जगत् के पति महादेव अपने रूप में समस्थित होते हुए शोक से
आहत प्रादुर्भूत हुए थे । उनकी शोक से विह्वल और बिना चेत वाले
अर्थात् मन्य मनस्क प्रादुर्भूत हुए देखकर देवों ने शोक के अपहरण
करनेवाले विधि वृषभध्वज की स्तुति कौ थी । ब्रह्माजी ने कहा-हे हर!
आप ही हिरण्यबाहु ब्रह्मा हैं और आप ही जगत् के पति विष्णु हैं ।
इस जगत् की सृष्टि, स्थिति और विनाशों के आप ही हेतु होते हैं ।
आप अपनी अष्ट मूर्तियों के द्वारा इस सम्पूर्ण चराचर जगत् में व्याप्त
होकर इसके उत्पादक-स्थापक और नाशक भी हैं । विश्वकृत! आप ही
हैं । हे महादेव! आपकी आराधना करके मुक्ति पाने की इच्छा वाले
४०८३ श्रीकालिका पुराण ४०८३ ९९
पुरुष मुक्ति को प्राप्त हो गये हैं। वे राग-द्वेष आदि बन्धन के कारणों
से छूटे हुए हैं और बुद्ध पुरुष संसार से विमुख होते हैं। हे महेश्वर!
विभिन्न वायु, अग्नि और जल के ओघ से रहित, सूर्य और चन्द्रमा से
युक्त, इस रीति से दूर में भी स्थित नहीं है अर्थात् सन्निकट में ही
वर्तमान हैं। तीन मार्गों के मध्य में संस्थित हैं और अनु प्रकाशक हैं,
परमशुद्धमय तत्त्व हैं। जो ज्ञानरूपी जल के द्वारा बर्धित-समीप में ही
समुत्पन्न तपरूपी जत्रों से संस्थागित, आठ शास्त्ररूपी तरु का पुष्प है
उसका सूक्ष्म उपगमन करने वाला, पीत-पराग सदा ही आपके वश में
गमन करने वाला है। समीकरण (वायु) की ध्वनि को नीचे की ओर
समाधान करके और रात्रि को ऊपर की ओर निरुद्ध करके हंस के
मध्य से हृदय के पद्म के मध्य में रज सुमुखीकृत है परन्तु आपका तेज
सर्वदा सर्वत्र है। पूरक अथवा कुम्भक प्राणायामों से रिक्त चित्रों से जो
पर नामक प्रेरणा है, वे प्रपञ्च योगियों के द्वारा दृश्य और अदृश्य है।
तात्विक रूप से शुद्ध और वृद्ध आपके द्वारा लब्ध हैं। सूक्ष्म जगत् में
व्याप्त और गुणों के समूह से पीन मृग्यम्बुधि के साधन-साध्य रूप
वाला है। हे महेश! चोर और रक्षकों के द्वारा न तो उज्झित है और न
नीत ही है अर्थात् लिया हुआ है ऐसा ही आपका अर्थ से हीन चित्त
है। वह चित्त कोप से, शोक से, मान से और दम्भ से भी व्यय नहीं
होता है। वह चित्त तो उपयोग करके अन्य प्रकार से ही बढ़ता रहा
करता है। आप माया से मोहित हैं इसलिए आप हृदय में स्थित को ही
आपने विस्मृत कर दिया है। माया को भिन्न समझकर अपनी आत्मा
के द्वारा ही आत्मस्वरूप को धारण करो।
हे महेश्वर! जगत् के हित के सम्पादन करने के लिए हमने पूर्व में
ही माया का स्तवन किया था उसके द्वारा ध्यान में संलग्न चित्त बहुत
से प्रयत्नों के द्वारा प्रसाधित है। शोक, क्रोध, लोभ, काम, मोह,
परात्मता, ईर्ष्या, मान, संशय, कृपा, असूया, जुगुप्सिता ये बारह, मन
में मल होते हैं जो बुद्धि के नाश करने के हेतु हैं। आप जैसे महापुरुषों
द्वारा इन बारह मानस मलों का सेवन नहीं किया जाया करता है। हे
१०० ६०३ श्रीकालिका पुराण ६०८३
हर ! आप शोक का परित्याग कर दीजिए । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस
रीति से साम के द्वारा स्तुति किए गए शम्भु ने अपने वाँछित का
संस्मरण करके भी सती के शोक से बिना कृत हुए शिव ने उस समय
में आत्मा का अवधारण नहीं किया था । नीचे की ओर को मुख किए
हुए समवस्थित ब्रह्माजी को देखकर उसने धीरे से यह कहा था-हे
ब्रह्माजी ! कुछ अतिक्रमण करनेवाली बात कहो । आप बतलाओ, अब
मैं क्या करूँ ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से वामदेव और समस्त देवों
के द्वारा कहे हुए विधना (ब्रह्मा) उस समय मे महेश्वर के शोक का
विनाश करने वाला यह वचन कहा था । ब्रह्माजी ने कहा-हे महादेव !
अपनी आत्मा के द्वारा ही अर्थात् अपने-आप ही अपनी आत्मा अर्थात्
अपने वास्तविक स्वरूप का संस्मरण करके शोक का परित्याग कर
दो । आप शोक करने के स्थान नहीं हैं। शोक से आपका परम अन्तर
हो गया है। हे भूतेश्वर ! आपके शोकयुक्त हो जाने पर सभी देवगण
अत्यन्त भयभीत हो गए हैं । आपका क्रोध और शोक जगती-तल को
भ्रंश कर देगा और आपका शोक इसका शोषण कर देगा। आपके
वाष्पों अर्थात् अश्रुपात से यह सम्पूर्ण पृथ्वी व्याकुल होकर विदीर्ण हो
जाती यदि शनि आपके वाष्पों को अवग्रहण नहीं करता। वह शनि भी
हठ से कृष्ण हो गया है। जहाँ पर गन्धर्वों के सहित सब देवगण सदा
उत्सुकता से युक्त होकर क्रीड़ा किया करते हैं। जो यह सुमेरु पर्वत के
सदृश मान से उत्तम पर्वत हैं-पुष्कर, आवर्त्तक आदि जलों का पान
किया करते थे-जहाँ पर जा करके महामुनि कुम्भयोनि मन्दार पर्वत से
निरन्तर जगत के हित में तपस्या किया करते थे।
जिस पर्वत में भगवान् शम्भु स्थित होकर पूर्व में जल के सागर को
हाथ के मध्य में रखकर तप के बल से पी गये थे । शनैश्चर के द्वारा
आपके वाष्पों को सहन करने में असमर्थ होते हुए क्षिप्त लोकों से यह
जलधारा नामक गिरि विदारित हो गया था । हे शम्भो ! आप वाष्प
पर्वत का विशेष रूप से भेदन करके सागर में चले गये थे। वे प्रभीत
ൠ८३ श्रीकालिका पुराण ൠ८३ १०१
अण्डजों से सकूल सागर का शीघ्र ही भेदन करके वाष्प उसके पूर्व
पुलिन पर चले गये थे और उन्होंने उस पुलिन का भी भेदन कर दिया
था। वेला का भेदन करके फिर पृथिवी का भेदन किया था और उन्होंने
एक नदी को बना दिया था। उन्होंने उस वैतरणी नाम वाली नदी को
बना दिया था जो पूर्व सागर की ओर गमन करने वाली थी। वह नदी
गर्म जल के होने के कारण से अत्यन्त भीषण थी जो किसी भी नौका,
विमान, द्रोणी और रथ के द्वारा भी पार करने के योग्य नहीं हो सकी
थी। पृथिवी महान् दुःख से साथ अब उसको धारण किए हुए थी। वह
सदा ही ऊर्ध्वगत अर्थात् ऊपर की ओर जाते हुए वाष्पों से नभश्चरों का
विक्षेपण करती हुई थी और उसके ऊपर से देवगण भी भय से आतुर
होकर गमन करते हैं।
यमराज के द्वार से परावर्तित होकर दोनों जल से विस्तार वाली
निम्न होती हुई वह सम्पूर्ण तीनों भुवनों को भय उत्पन्न करती हुई वहन
किया करती है। आपके शोक संतप्त निःश्वासों की वायुओं से समस्त
पर्वत और कानन व्याप्त हैं और समाकुल द्वीपीनाग आज तक भी
प्रतिशयन नहीं किया करते हैं। आपके संतप्त निःश्वासों से समुत्पन्न
वायु सम्पूर्ण जगत के सुख को पीड़ित करता हुआ वह बाधाहीन और
सनातन आज तक भी शमन को प्राप्त नहीं होता है। सती के शव
अर्थात् मृत शरीर को वह करनेवाले आपके पद-पद में यह पृथिवी
शीर्यमाण हो रही है और वह परम व्याकुल पृथिवी अपनी व्याकुलता
का मोचन नहीं कर रही है। इस समय न तो पाताल में और न स्वर्ग
में वह सत्व विद्यमान है जो आपके क्रोध से और शोक से हे
वृषभध्वज! व्याकुल न होवे। इसी कारण से आप शोक और अमर्ष
को परित्याग करके हम सब को शान्ति का प्रदान करो। अपनी आत्मा
के द्वारा ही अपनी आत्मा को जानिये अर्थात् स्वयं ही अपने आपके
स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कीजिए और आत्मा से ही आत्मा को धारण
करिए और वह सती दिव्यमान से सौ वर्षों के व्यतीत हो जाने पर त्रेता
युग के आदि में वही सती पुनः आपकी भार्या होगी।
१०२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- ब्रह्माजी के द्वारा इस रीति से कहे हुए
शम्भु नीचे की ओर मुख वाले, ध्यान में परायण होकर अमित ओज
वाले ब्रह्माजी से बोले- हे ब्रह्मन्! जब तक मैं सती के द्वारा किए हुए
शोक से उत्तीर्ण होऊँ तब तक आप मेरे सखा हो व शोक का अपमोदन
करिये। हे ब्रह्माजी! उस अवसर पर मैं जहाँ-जहाँ पर भी गमन करूँ
वहाँ-वहाँ पर भी आप भी गमन करके मेरे इस दुस्सह शोक की हानि
करिए। तात्पर्य यही है कि मेरे ही सर्वदा साथ रहकर जहाँ पर भी मैं
जाऊँ वहीं पर मेरे शोक का विनाश करने की कृपा करें। लोकेश
ब्रह्माजी ने 'ऐसा ही होवे' यह वृषभवाहन से कहकर अर्थात् मैं आपके
साथ में सर्वत्र रहकर आपके शोक का विनाश करूँगा। फिर ब्रह्माजी
ने भगवान् शम्भु के ही साथ में कैलाश गिरि पर जाने का मन किया
था। ब्रह्माजी के साथ भगवान शम्भु को कैलाश पर्वत की ओर गमन
करने के लिए उत्सुक देखकर जो नन्दी और भृङ्गि आदिगण थे वे भी
यह देखकर वहाँ प्राप्त हो गये थे। फिर एक विशाल पर्वत के ही
समान वृषभ विधाता के सामने उपस्थित हो गया था जिस तरह से
सिताभ के सदृश गैरिक होवे। वासुकि आदि जो शर्व थे उन सबने
यथास्थान पर भगवान् शम्भु की बहुत शीघ्र वहाँ आकर शिव के शिर
और बहु आदि से उनको विभूषित कर दिया था। कथन का अभिप्राय
यही है कि वासुकी प्रभृति सब सर्प वहाँ आकर शिव के करादि अंगों
के आभूषण हो गये थे।
इसके अनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और सती के पति महादेव समस्त देवों
के समूह के साथ हिमवान् पर्वत पर चले गए थे। इसके पश्चात् गिरि
अपने नगर से निकलकर उन औषधियों के प्रस्थों को अपने आत्माओं
के सहित सुरोत्तमों के सामने उपस्थित हुए थे। इसके अनन्तर उस
गिरिराज के द्वारा वे सभी सुरगण पूजे गये थे और सबका एक ही साथ
अभ्यर्चन किया गया था। वहाँ पर उस देवों के यजन करने में सभी
सचिव और पुरवासीगण भी सम्मिलित थे। वे सुरगण ही बहुत प्रसन्न
हुए थे। फिर वहीं पर उस गिरीन्द्र के नगर में भगवान् हर ने उस
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १०३
औषधियों के प्रस्थ पर सखियों के साथ गौतम की आत्मजा विजया का
अवलोकन किया था। उसने भी उन समस्त सुरों को प्रणिपात करके
हर से कहा था। गिरीश से अपनी माता की भगिनी सती के विषय में
पूछती हुई ने क्रोध किया था। हे महादेव! आपकी वह सती कहाँ पर
है मेरे हृदय से दुःख दूर नहीं हट रहा है। मेरे ही आगे पहले समय में
उसने जिस समय में कोप से प्राणों को त्यागती है उसी समय में
शोकरूपी शल्य से विद्ध होकर सुख को प्राप्त नहीं करती हूँ। इतना
कहकर वस्त्र के छोर से मुख को ढककर अधिक रूदन करती हुई भूमि
पर गिर पड़ी थी और बहुत दुःख को प्राप्त हो गई थी।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके पश्चात् उस समय में दाक्षायणी
का स्मरण करते हुए उसको भूमि पर गिरी हुई देखकर उस समय में
शोक से समुत्पन्न उद्वेगयुक्त रुज को शिव सहन न कर सके थे।
जिनका धीरज एकदम ही नष्ट हो गया था ऐसे भगवान् शम्भु वाष्पों
से व्याकुल लोचनों वाले हो गए थे अर्थात् उनके नेत्रों से अविरल अश्रु
प्रवाह चलने लग गया था। सभी देवों के देखते हुए वे भगवान् शिव
चिन्ता के ध्यान में तत्पर हो गये थे। इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने शोक
से कथित विजया को ढाढ़स बँधाकर फिर भगवान् शंकर को
समाश्वासन देते हुए सान्त्वना से साथ यह वचन कहने लगे थे। ब्रह्माजी
ने कहा- भगवान्! आप पुराने योगी हैं। आपको ऐसा शोक करना
युक्त प्रतीत नहीं होता है। आपका ध्यान तो परधाम में ही था फिर यहाँ
पर सती में कैसे हो गया ? आप तो निरञ्जन हैं और आप बड़े-बड़े
यतियों के ध्यान में जानने के योग्य हैं। आप पर से भी पर हैं, आपका
स्वरूप निर्मल है तथा आप सर्वत्र गमन के स्वभाव एवं शक्ति से
समन्वित हैं। जो राग और लोभ आदि मल हैं उन मलों से आप विहीन
रहने वाले हैं। ऐसा ही आपका स्वरूप है उसे ही आप अपनी बुद्धि
से ग्रहण कीजिए।
प्राणी के अन्दर रहने वाले ज्ञान के विनाश करने वाले निम्नलिखित
चौदह दोष हुआ करते हैं। वे ये हैं-शोक, लोभ, क्रोध, मोह, हिंसा,
१०४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
मान (मैं बहुत ही महान् हूँ, ऐसा मान मन में रखना), दम्भ अर्थात्
पाषाणु, मद, प्रमोद, ईर्ष्या, असूया, अक्षान्ति और असत्यता। आप तो
विष्णु के ही स्वरूप वाले जगतों के विधाता हैं अर्थात् जगतों की रचना
करने वाले हैं। जो भी आपको महान् मोह कर देने वाली सती हैं, यह
तो आपकी ही लोकों के मोह के लिए माया है। जो समस्त लोकों को
जन्म में और गर्भ में पूर्व देह की बुद्धि को विमोहित करती हुई, विनाश
करके बाल्य अवस्था में जन्तु का पालन किया करती है आज वह भी
शोक से सहित आपको विमोहित कर रही है। प्रत्येक कल्प में पहले
आपने सहस्रों सतियों का त्याग किया था जो मृत हो गई थीं। इस
प्रकार से चर-अचर लोक के हित के ही सम्पादन करने के लिए उसी
भाँति आपके द्वारा यह सती पुनः ग्रहण की गई थी। हे वृषभध्वज!
आप ध्यान के योग द्वारा देखिए दूसरे जन्म में जो सहस्रों सतियां मृत
हुई हैं आप यथा तथा परिवर्जित हैं अथवा जैसी की तैसी वह हैं।
क्योंकि वह पुनः समुत्पन्न होकर हे ईश! वह आपको ही प्राप्त करेगी।
जो आप देवगणों के द्वारा भी दुष्प्राप्य होते हैं और फिर वह जैसी जाया
आपको होने वाली है। यह सभी कुछ आप ध्यान के योग द्वारा देख
लीजिए।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस रीति से ब्रह्माजी ने बहुत प्रकार से
ज्ञान को भगवान् शंकर से कहा था। फिर उस गिरिराज ने नगर से
उनको निर्जन स्थान में गत कर दिया था। इसके उपरान्त हिमवान् के
प्रस्थ में और उनके नगर के पश्चिम दिशा में द्रुहिण आदि ने शिव नाम
वाला परिपूर्ण एक सरोवर देखा था। उस परम एकान्त स्थान की
प्राप्ति करके ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवों ने वहाँ पर उपसेवन किया था
अर्थात् वहाँ पर बैठ गए थे और जैसा भी न्याय था उसी के अनुसार
उन्होंने महेश्वर को अपने आगे बिठा लिया था। वह शिव नाम वाला
सरोवर बहुत ही सुन्दर था जो सभी देहधारियों में मन को हरण करने
वाला था। उसका जल ठंडा और निर्मल था। वह सरोवर अपने सभी
गुणों से मानस सरोवर के तुल्य था। भगवान् शम्भु उस सरोवर को
६०८९ श्रीकालिका पुराण ६०८९ १०५
देखकर एक क्षण पर्यन्त उसके देखने में उत्सुकता से रुक गए थे । उसी
सरोवर से एक शिप्रा नाम वाली नदी निकली हैं और वह दक्षिण सागर
को जा रही थी, जो जगत् के जनों को पावन कर रही थी, ऐसा उन्होंने
वहाँ पर देखा था । उस पूर्ण सरोवर के पास जाकर अनेक देशों से
समागत हुए परमाधिक सुन्दर दर्शन करते हुए बहुत से पक्षियों को
शम्भु ने अवलोकन किया था ।
वहाँ पर विराजित होकर उन्होंने गम्भीर वायु से एवं सम्पन्न तरंगों
में चक्रवाक के जोड़ों को नृत्य करते हुए देखा था । उन शम्भु भगवान
ने चञ्चुओं से तरंगों को पृथक-पृथक देखा था जिस तरह से जल से
पुनः उत्पन्न करते हुए पक्षियों को देखा हो । प्रत्येक तट पर श्रेणी में
आबद्ध हुए कादम्ब, सारस और हंसों के द्वारा अंगीकृत वह सागर जैसा
हो वैसा ही वह सरोवर था । जिसको शिव ने देखा था । बड़े-बड़े
मत्स्यों से युक्त अर्थात् बड़ी मछलियों के उछालों से क्षोभ को प्राप्त हुए
जल के शब्द से भय उत्पन्न होने वाले पक्षियों के द्वारा विहित शब्द
वहाँ पर हो रहा था । वहाँ पर उस मन के हरण करने वाले दृश्य का
अवलोकन किया था । विकास को प्राप्त हुए कमलों से और वहीं पर
मनोहर जलों से वह सरोवर परम शोभित हो रहा था । जिस तरह से
स्थूल और सूक्ष्म नक्षत्रों से स्वर्ग शोभयमान हुआ करता था । बड़े-बड़े
कमलों के मध्य में विरले ही नीलकमल उसमें दिखलाई दे रहे थे और
वह ऐसे ही शोभा से संयुक्त थे जैसे नक्षत्रों के मध्य में नीलमेघ का
खण्ड शोभित हुआ करता है ।
पद्मों के समूह के मध्य में संस्थित हम किन्हीं के द्वारा प्रस्तुत नहीं
हो रहे थे क्योंकि उनमें भी विकसित कमलों की भ्रान्ति होती थी।अर्थात्
उन हँसों को भी जो कमलों के बीच में स्थित थे खिले हुए कमल की
समझा जा रहा था । वे स्वर्गवासियों के द्वारा निश्चल ही दिखाई दे रहे
थे । दो प्रकार के रक्त और शुक्ल वर्ण के विकसित पद्मों को देखकर
ब्रह्माजी ने अपने आसन के कमल में काम में उत्फुल्लत्व और अरुणत्व
की अर्थात् विकास और लालिमा की निन्दा की थी । महादेवजी ने उस
१०६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
सरोवर के विकसित महोत्पल का अवलोकन करके उन्होंने हाथ में
स्थित कमल का कुछ भी मान नहीं किया था क्योंकि वह हाथ के
कमल की कान्ति मस्तक में स्थित चन्द्रमा की कान्ति से मलिन हो गया
था । भगवान् हरि ने अपने सुदर्शन चक्र से सूर्य की किरणों से
विकसित हाथ में रहने वाले कमल को ओर सरोवर के पद्म को सब
ओर देखकर सदृश ही माना था । उस सरोवर को जो नाना भाँति के
पक्षियों से समाकुल, सम्पूर्ण सैकड़ों ही कमलिनिओं से संच्छन्न ( ढका
हुआ ) और नीलोत्पलों के समूह से युक्त था, देखा था । वह सरोवर
तट पर देवदारु के वृक्षों के प्रसूनों में रहने वाले परागों से सुगन्धित
जल से समन्वित था और देखने वालों के हृदय को महान आनन्द को
उत्पन्न करने वाला था । उस सरोवर के प्रत्येक तट पर महान विशाल
वृक्ष थे और वह शाद्वलों से भी परिवारित था अर्थात् उसके किनारे
शाद्वलों से चारों ओर घिरे हुए थे । ऐसे उस सुन्दर सरोवर की शोभा
को देखकर शम्भु क्षण भर के लिए उत्सुकता से युक्त तथा शोक से
रहित हो गये थे । तात्पर्य यही है कि उस सरोवर की सुषमा से शम्भु
का शोक मिट गया था और एक विशेष उत्सुकता उनके हृदय में उत्पन्न
हो गई थी ।
क्षिप्र पर्वत और क्षिप्रा नदी की कथा
भगवान् महेश्वर ने उस सरोवर से निकली हुई शिप्रा नदी का
अवलोकन किया था जिस प्रकार से इन्द्र मण्डल से भागीरथी गंगा
और मेरु पर्वत से जम्बु नदी निकलती है, उसी भाँति भगवान् शम्भु से
क्षिप्र से शिप्रा को विनिसृत किया था । ऋषियों ने कहा- क्षिप्र नाम
वाला सरोवर कौन-सा है और किस प्रकार से उससे शिप्रा नदी निःसृत
हुई थी ? इसका प्रभाव किस प्रकार का है, यह सभी कुछ आप
विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे मुनिगणों!
अब आप लोग श्रवण कीजिए कि जिस प्रकार से शिप्रा नदी निःसृत
हुई थी । हे महाभागों! यह भी सुनिए कि उस शिप्रा का क्या प्रभाव
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है क्योंकि मैं यह सभी आप लोगों को बतला रहा हूँ। जिस समय से
वशिष्ठ जी ने देवी अरुन्धती का विवाह किया था। हे द्विजो! उसी
समय में वैवाहिक जलों से शिप्रा नदी समुत्पन्न हुई थी। वह समागत
होकर शासन से शिप्र सरोवर में गिरी थी जिस प्रकार से भागीरथीं गंगा
भगवान विष्णु के चरणों से शिव जल वाली सागर में पतित हुई थी।
पहले समय में देवों के उपयोग करने के लिए ही धाता ने इसका
विशेष निर्माण किया था जो हिमवान् के शिखर पर एक महान शिप्र
नाम वाला सरोवर है। वहाँ पर आज भी अप्सरागणों के सहित इन्द्र
देव अपनी शची को साथ में लेकर उस परम शुभ जल में रमण किया
करते हैं। आज तक भी वह देवों के द्वारा एक रत्न की ही भाँति सर्वदा
यत्न के साथ रक्षित हुआ करता है। वहाँ पर तप के प्रभाव से मुनिगण
इस परमशुभ सरोवर में गमन किया करते हैं। महान् यत्न से ही वे लोग
शिप्रा नाम वाले सरोवर के उसके जल में स्नान करने के लिए तथा
पान करने को जाया करते हैं। वहाँ पर मनुष्य हैं जो योग से उसके जल
का स्नान तथा पान करके अविकल इन्द्रियों वाले होते हुए अवश्य ही
देव के स्वरूप को प्राप्त हो जाया करते हैं। हे द्विजोत्तमों! यह सरोवर
वर्षा ऋतु में भी वृद्धि को प्राप्त नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि अन्य
प्राकृत जलाशयों के समान यह सरोवर का जल नहीं बढ़ा करता है
और यह गर्मी की ऋतु में शोषण को भी प्राप्त नहीं हुआ करता है।
यह तो सर्वदा ही जैसा है वैसा ही रहा करता है। न घटता है और न
कभी बढ़ता ही है।
हे द्विजश्रेष्ठों! शिप्र के गर्भ के मध्य में स्थित जल प्रतिदिन बढ़ता
था। वहाँ पर उस बढ़े हुए जल को पहले भगवान् हरि ने अपने चक्र
के द्वारा लोकों की भलाई करने की भावना से गिरि के शिखर का
भेदन करके उस नदी को परमपुण्य करके पृथ्वी की ओर प्रेरित कर
दिया था। जाह्नवी गंगा के ही समान फल देने वाली वह नदी स्नान
करने वालों को पवित्र करती हुई दक्षिण सागर को चली गयी थी।
क्योंकि वह नदी शिप्र नाम वाले सरोवर से ही समुत्पन्न हुई थी अर्थात्
१०८ ऒ श्रीकालिका पुराण ऒ
वह महानदी शिप्र से निकली थी अतएव उसका 'शिप्रा' यह शुभ नाम
पूर्व में ही ब्रह्माजी ने रखा था । जिसमें कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि
के दिन जो भी कोई मनुष्य स्नान किया करता है वह मनुष्य अत्यन्त
देदीप्यमान विमान के द्वारा भगवान् विष्णु के लोक में गमन किया
करता है । तात्पर्य यही है कि इस महानदी में कार्तिक मास की पूर्णमासी
में स्तवन करने का ऐसा फल हुआ करता है कि वह सीधा विष्णु लोक
की प्राप्ति कर लिया करता है । पूरे कार्तिक मास में शिप्रा नदी के जल
में जो भी मनुष्य स्नान किया करता है वह सीधा ही ब्रह्माजी के लोक
को चला जाया करता है और कुछ समय तक वहाँ दैविक सुखों का
भोग करके पीछे संसार के जन्म और मृत्यु के निरन्तर आवागमन से
मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लिया करता है । ऋषिगणों ने
कहा-महामुनि वशिष्ठ जी ने किस प्रकार से अरुन्धती देवी के साथ
विवाह किया था ? हे ब्रह्मण, वह अरुन्धती किसकी पुत्री समुत्पन्न हुई
थी ? यह सभी आप कृपा करके हमको वर्णन करके समझाइए ।
वह परमश्रेष्ठा देवी अरुन्धती तीनों लोकों में पतिव्रता नारियों में
बहुत ही अधिक प्रसिद्ध हुई थी । वह ऐसी ही पतिव्रता नारी थी कि
अपने पतिदेव के चरणों के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थान में अपने
नेत्रों से नहीं देखा करती थी । जिस देवी अरुन्धती को केवल कथा का
ही श्रवण करके जो कि महात्म्य के सहित है स्त्रियाँ स्मरण करके यहाँ
सतीत्व को प्राप्त करती हुई मरकर भी अन्य जन्म में भी सतीत्व को
प्राप्त किया करती हैं । कालधर्म को समासन्न होने वाला पुरुष जिसका
दर्शन नहीं किया करता है तथा जो भी शुचि होता है वह पुरुष
पापकारी होता है । वह देवी के जन्म का वर्णन आप हमारे समझ में
करने की कृपा करिए । मार्कण्डेय ऋषि ने कहा था-आप लोग
भली-भाँति श्रवण कीजिए जैसे वह समुत्पन्न हुई थी और जिस प्रकार
से उस देवी ने अपने पति के स्वरूप वशिष्ठ मुनि को प्राप्त किया था
और जो वह प्रसिद्ध पतिव्रता हुई थी । जो सन्ध्या पहले ब्रह्माजी पुत्री
मन से ही समुत्पन्न हुई थी उसने तपस्या का तपन किया था और वहीं
൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ १०९
शरीर का त्याग करके पीछे अरुन्धती नाम वाली हुई थीं। वह
मेधातिथि की पुत्री होकर वह सती ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वचन
से सच चरित्र व्रत वाली मुनियों में श्रेष्ठ की सती हुई थी। उसने ही संशित
व्रतों वाले महात्मा वशिष्ठ का पति के स्वरूप में वरण किया था
अर्थात् स्वयं ही वशिष्ठ को अपना पति बनाना स्वीकार किया था।
ऋषियों ने कहा-उस संध्या ने किस प्रयोजन की सिद्धि के लिए
कहाँ पर किस प्रकार से तप किया था? फिर क्यों अपने शरीर का
परित्याग किया था और वह कैसे मेधातिथि की पुत्री होकर समुत्पन्न हुई
थी ? कैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश देवों के द्वारा कहे हुए परम संशित
वाले सुन्दर महात्मा वशिष्ठ मुनि को उसने पति के स्थान में वरण
किया था ? हे द्विजोत्तम! इस चरित्र को श्रवण करने की इच्छा वाले
हमको यह सब विस्तार के साथ कहने की कृपा कीजिए। महासती
अरुन्धती देवी के चरित्र के सुनने के लिए हमारे हृदय में बड़ा भारी
कौतूहल हो रहा है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-ब्रह्माजी ने भी पहले
अपनी पुत्री सन्ध्या को देखकर कामवासना के लिए अपना मन किया
था और फिर सुता का त्याग कर दिया था। काम के उस प्रकार के
भाव को जो मुनियों के हृदय में भी मोह के करने वाला है वहाँ पर
उसको सन्ध्या ने स्वयं ही देखा था। तब वह परम दुःखिता होकर
लज्जा को प्राप्त हो गई थी अर्थात् स्वयं ही लज्जा आ गई थी।
इसके अनन्तर ब्रह्माजी के द्वारा कामदेव को शाप दे देने पर तथा
विधाता के अन्तर्धान हो जाने पर और भगवान् शम्भु के अपने स्थान
पर चले जाने पर वह मनस्विनी सन्ध्या एक क्षण पर्यन्त शीघ्र ही पूर्व
में होने वाले वृत्त का ध्यान करती हुई वह सन्ध्या परायण हो गई थी।
इस महापाप का प्रायश्चित मैं स्वयं ही करूंगी और वेद मार्ग के
अनुसार अपने आपको अग्नि में हवन कर दूँगी अर्थात् अग्नि में
जलकर अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगी। इस भूमण्डल में मैं एक
प्रकार की मर्यादा की स्थापना करूँगी कि जिससे उत्पन्न होते ही
शरीरधारी कामदेव से युक्त न होवे। इसी के लिए मैं परमाधिक दारुण