कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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जाकर उन महामुनि के लिए प्रणिपात किया था। इसके अनन्तर उस
समय अपने आसन को ग्रहण करके दक्ष प्रजापति ने भली भाँति वन्दना
करने वाले चन्द्रमा से सामपूर्वक यह कहा था-आप अपनी भार्याओं
से समानता का ही व्यवहार करिए और विषम व्यवहार का परित्याग
कर दीजिए। विषमता में ब्रह्माजी ने बहुत से दोष परिकीर्त्तित किये हैं।
दाराओं में काम के अनुबन्धन से वे दारारति और पुत्र की कला वाली
होती हैं। काम का अनुबन्धन संसर्ग से ही होता है और वह ससर्ग संगम
से हुआ करता है और संगम अभिध्यान और वीक्षण से समुत्पन्न होता
है इस कारण से आप भार्याओं में अभिध्यान और वीक्षण आदि
करिए। यदि इस मेरे धर्म से नियन्त्रित वचन को आप नहीं करते हैं तो
उस समय में आप लोक के वचनों से दोषयुक्त और आप वाले हो
जायेंगे।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-महात्मा दक्ष के उस वचन का श्रवण
करके चन्द्रदेव ने भी 'ऐसा ही होगा'-यह दक्ष की शंका से कह दिया
था। इसके अनन्तर दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्रियों को तथा जामाता
इन्दु को अनुमन्त्रित करके उस समय में वह मुनिकृतकृत्य होकर अपने
आश्रम को चले गये थे। दक्ष के चले जाने पर फिर चन्द्रमा ने उस
रोहिणी के पास प्राप्त होकर उसमें और उन शेष पत्नियों से पूर्व जैसा
ही भाव ग्रहण किया था क्योंकि रोहिणी में उसका अनुराग था। वहीं
पर रोहिणी को प्राप्त करके अन्य किसी को भी वह नहीं देखता था।
वह सर्वदा रोहिणी ही में निवास किया करता था। फिर वे सब कुपित
हो गई थीं। वे सब अपने दुर्भाग्य के कारण उद्विग्न मन वाली होती हुई
पिता के समीप में जाकर उन्होंने कहा था कि सोमदेव हम लोगों में
निवास न करते हैं और वे सदा ही रोहिणी का सेवन किया करते हैं।
उसने अपने वाक्य को भी ग्रहण नहीं किया। अतएव आप हमारे रक्षक
होओ। उसी क्षण में मुनि उस उद्वेग और क्रोध से संयुत होकर उठ खड़े
हुए थे और मन में विधु के समीप में जाकर क्या करना है इसका ध्यान
करते जा रहे थे।
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उस समय प्रजापति दक्ष चन्द्र के समीप में पहुँचकर यह वचन
उन्होंने चन्द्रदेव से कहा था कि अपनी भार्याओं में समानता का ही
व्यवहार करिए तथा उनके प्रति जो भी कुछ विषमता की भावना होवे
उसका आप अब परित्याग कर दीजिए। यदि आप हमारे वचनों को
मूर्खता से नहीं समझते हैं तो हे निशापते! मैं धर्मशास्त्र के अतिक्रमण
करने वाले आपके लिए शाप दे दूंगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके
अनन्तर चन्द्रदेव ने उस प्रजापति के सामने वैसा ही करने के लिए
स्वीकार किया था क्योंकि उनको दक्ष से अत्यधिक भय था। 'इसी
प्रकार से किया जायेगा। ऐसा पुनः स्वीकार कर लिया था। फिर
अपनी भार्याओं में विषय में समान ही व्यवहार करने के लिए चन्द्र के
द्वारा अंगीकार किये जाने पर दक्ष चन्द्र से सहमत होकर अपने स्थान
को चले गये थे। दक्ष के गमन करने पर निशानाथ चन्द्र फिर
अत्यधिक रूप से रोहिणी के ही साथ में रमण करता हुआ उसने उस
प्रजापति दक्ष के वचन को भुला ही दिया था कि मैं सब भार्याओं में
एक सा व्यवहार करूँगा। वे अश्विनी आदि सभी मनोरम उनकी सेवा
करने वाली हुई थीं किन्तु चन्द्र ने उनका कभी सेवन नहीं किया था
और वह केवल उन सबकी अवज्ञा ही किया करता था। वे चन्द्रदेव
के द्वारा अवज्ञासंयुक्त होकर अपने पिता से यह बोली थीं।
उन्होंने कहा था कि हे मुनिश्रेष्ठ! आपके वचन को भी सोमदेव ने
नहीं किया है और वह तो अब पहले से भी अधिक हमारे विषय में
अवज्ञा किया करते हैं। सोम के द्वारा हमारे विषय में जो भी करना
चाहिए वह कुछ भी नहीं होता है। अतएव अब हम तो सब तपस्विनी
हो जायेंगी। आप हमको वही निर्देश कीजिए। तपस्या के द्वारा अपनी
आत्माओं का शोधन करके हम अपना जीवन ही त्याग देंगी। हे
द्विजोत्तमो! आप ही विचार कीजिए कि ऐसी दुर्भाग्यशालिनी हमको
जीवन रखने से क्या लाभ है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-फिर यह इतना
कहकर वे सभी कृत्तिका प्रभृति दक्ष की पुत्रियाँ अपने करों से कपोलों
का आलम्बन करके विवश होती हुई भूमि पर रूदन करने वाली थीं।
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अतीव दुःख से व्याकुल इन्द्रियों वाली इस प्रकार से स्थित उन सबको
देखकर अत्यन्त दीन मुख वाले प्रजापति कोप से वह्नि के ही समान
ज्वलित हो गये थे। इसके अनन्तर कोप से व्याप्त महात्मा दक्ष की
नासिका के अग्रभाग से बहुत ही भीषण यक्ष्मा निकल पड़ा था। वह
यक्ष्मा दाढ़ों से कराल मुख वाला था और कृष्ण वर्ण वाले अंगार के
समान था वह बहुत ही लम्बे विशाल शरीर वाला था उसके केश बहुत
ही थोड़े थे वह अतीव कृश और धमनियों से संतत था।
उसका मुख तो नीचे की ओर था, उसके हाथ में एक दण्ड था,
वह विश्राम करके निरन्तर कास (खाँसी) को करता जा रहा था,
उसके नेत्र नीचे की ओर बैठे हुए थे तथा वह स्त्री के साथ सम्भोग
करने के लिए अत्यन्त लालायित रहता था। उस यक्ष्मा ने दक्ष प्रजापति
से कहा था- हे मुनि! मैं अब किस स्थान में स्थित रहूँगा अथवा मुझे
क्या करना होगा? हे महामते! आप मुझे यह अब बतलाइए। तब तो
प्रजापति दक्ष ने उस यक्ष्मा से कहा था कि आप बहुत शीघ्र सोमदेव
के समीप में जाइये। आप सोमदेव का भक्षण करिये और उसी सोम
में स्वेच्छा से सदा संस्थित रहिए। मार्कण्डेय ऋषि ने कहा- इसके
अनन्तर महामुनि दक्ष के इस वचन को श्रवण करके वह धीरे-धीरे
सोमदेव के समीप गया था और वह सोम का गद (रोग) ही था। उस
समय में वह सोम के समीप में इसी भाँति प्राप्त हुआ था जैसे सर्प
अपनी बाँबी में प्रवेश किया करता है। वह महागद अर्थात् विशाल रोग
चन्द्रमा के हृदय में छिद्र की प्राप्ति करके प्रवेश कर गया था। उस
दारुण राज्यक्ष्मा के उस सोम के हृदय में प्रविष्ट हो जाने पर चन्द्रदेव
मोहित हो गये अर्थात् उनको मोह हो गया था और वह बहुत बड़े विषम
तन्द्र को प्राप्त हो गया था। क्योंकि यह रोग प्रथम उत्पन्न होकर उस
राजा में लीन हो गया था। हे द्विज! इस कारण से उस रोग की लोक
में 'राजयक्ष्मा' इस नाम से प्रसिद्धि हो गयी थी।
इसके अनन्तर वह सोम (रोहिणी का पति) उस राजयक्ष्मा नामक
रोग के द्वारा अभिभूत हो गया था और वह प्रतिदिन ग्रीष्म ऋतु में क्षुप्र
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नदी की ही भांति क्षय रोग को प्राप्त होने लगा था। इसके अनन्तर उस
चन्द्र के क्षीय माण हो जाने पर समस्त औषधियाँ क्षय को प्राप्त हो
गयीं थीं। उन औषधियों के क्षय को प्राप्त हो जाने पर यज्ञ नहीं प्रवृत्त
होते थे। यज्ञों का अभाव हो जाने से देवों का सब अन्य भी क्षय को
प्राप्त हो गया था। तब तो सभी मेघ नष्ट हो गये थे और वृष्टि का
एकदम अभाव हो गया था अर्थात् फिर वर्षा नहीं हुई थी। जब वृष्टि
का ही अभाव हो गया तो लोगों के व्यवहार क्षीण हो गये थे। हे
द्विजोत्तमो! दुर्भिक्ष (अकाल) और उसके कारण से होने वाले व्यसन
(दुःख) से समस्त रोग हो गये थे। तब तो लोगों का दान देना और
धर्म के कृत्य करना सभी कुछ लोक के लिए प्रवृत्त नहीं होता है।
समस्त प्रजा सत्त्व से हीन हो गयी थी और सब लोभ से उपहत इन्द्रियों
वाले हो गये थे। वे सभी प्रजायें कुकर्मों में रति रखने वाली हो गई
थीं तथा सभी सागर और ग्रह भी क्षुभित हो गये थे। इसके अनन्तर
जगत् को अधिक व्याकुल और दस्युओं (चोर लुटेरों) से प्रपीड़ित
देखकर चन्द्र को अपना नायक बनाते हुए सब देवगण ब्रह्माजी के
समीप में गये थे।
इस सृष्टि की रचना करने वाले, जगतों के स्वामी देवेश्वर ब्रह्माजी
के पास पहुँचकर उन्होंने उनको प्रणाम किया तब वे सब यथोचित
स्थानों पर उपविष्ट हो गये थे। लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने सब देवों
को मलिन मुख वाले देखकर जो कि ऐसे प्रतीत होते थे मानों किसी
दूसरे के पराभूत हैं और अपने विषयों को अपहृत किए हुए से दिखाई
पड़ रहे थे। तब तो ब्रह्माजी ने देवों के गुरु बृहस्पति इन्द्र और अग्नि
को आमने सामने बिठाकर उनसे पूछा था। ब्रह्माजी ने कहा हे देवगणों!
आपका मैं स्वागत करता हूँ अर्थात् आपका यहाँ पर समागम परम शुभ
मानता हूँ। आप लोग अब यह बतलाइये कि आप सब किस प्रयोजन
को सुसम्पन्न करने के लिए यहाँ आये हैं? मैं देख रहा हूँ कि आप
सभी लोग किसी महान दुःख से उपहृत देहों वाले हैं और आप अधिक
म्लान हो रहे हैं। आप सबको बाधाओं से रहित, आतंक से हीन तथा
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १२१
इच्छानुसार गमन करने वाले बनाकर और अपने विषय में विन्यस्त
करके आज से आप लोगों को परम दुःखित कैसे देख रहा हूँ ? जो भी
कुछ आप लोगों के दुःख का बीज अर्थात् हेतु होवे अथवा जो भी कोई
आप लोगों को बाधा पहुंचाता होवे वह सभी आप लोग पूर्ण रूप से
मुझे बतलाइए और यही समझ लीजिए कि वह आपका कार्य सिद्ध हो
ही गया है अर्थात् उसका मैं निवारण करके आपको सुख सम्पन्न ही
बना दूँगा, इनमें कुछ भी संशय न समझें। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके
अनन्तर वृद्ध श्रवा, जीव और लोकों का भरण करने वाले कृष्णवर्मा
ने उन ब्रह्माजी से देवों के दुःख का कारण बतलाया था।
देवों ने कहा-हे जगत् की रचना करने वाले! आपके समीप में
जिस कार्य के सम्पादन के लिए हम लोग समागत हुए हैं उनका आप
श्रवण कीजिए जो कि हम लोगों के दुःख का बीज है और जिसके होने
से हम सब लोग म्लानश्री वाले हो रहे हैं। हे पितामह! कहीं पर भी
लोक में यज्ञ सम्प्रवर्तित नहीं हो रहे हैं अर्थात् कोई भी किसी जगह पर
लोक में यज्ञ नहीं कर रहे हैं। समस्त प्रजा इस समय निरातंक और
निराधार होकर क्षय को प्राप्त हो रही है। भूमण्डल में न तो कोई दान
देता हैं और न कोई धर्म सम्बन्धी कर्म करता है, न तप है अर्थात् कोई
भी तपस्या भी नहीं कर रहा है। मेघ लोक में वर्षा नहीं करते हैं, समस्त
पृथ्वी क्षीण जल वाली हो गयी थी। सभी औषधियाँ क्षीण हो गयी हैं
शस्य भी क्षय को प्राप्त है और लोक सभी समाकुल हैं। विप्रगण
दस्युओं के द्वारा पीड़ित होते हुए वेदों के बाद में नियत नहीं हो रहे हैं।
अन्न की विकलता को प्राप्त करके बहुत-सी प्रजा मर रही है। यज्ञ
भोगों के क्षीण हो जाने पर हम सभी लोग भोगने के योग्य पदार्थों से
हीन हो रहे हैं। हम बहुत ही दुर्बल हो गए हैं और हमारी कान्ति नष्ट
हो गई है। हम कहीं पर भी शान्ति की प्राप्ति नहीं कर रहे हैं। चन्द्रदेव
तो रोहिणी के ही मन्दिर में सदा वक्रगति से चिरकाल पर्यन्त स्थित रहा
करते हैं और वृष राशि के वह क्षीण होकर ज्योत्सना (चाँदनी) से हीन
रहते हैं। देवी के द्वारा जिस समय में भी चन्द्र का अन्वेषण किया जाता
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ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
है तो वह कभी भी इनके आगे स्थिति वाला नहीं हुआ करता है। वह
किसी समय में भी देवों के समाज में अथवा आप के समीप में उपस्थित
नहीं हुआ करता है।
वह किसी समय भी रोहिणी का त्याग करके वहीं पर भी गमन
नहीं किया करता है। यदि कोई भी अन्य नहीं होता है तभी चन्द्र बाहर
जाया करता है। वह चन्द्र समस्त कलाओं से हीन केवल एक ही कला
वाला रह गया है अर्थात् केवल एक ही कला उसमें शेष रह गई हैं।
हे लोकों के ईश! यही सर्वत्र लोक में कर्म का विपर्यय प्रवृत्त हो रहा
है। तात्पर्य यही है कि सभी कर्म विपरीत हो रहे हैं। यह ऐसा है उसको
देखकर हम सब कान्दिशीक हो रहे हैं अर्थात् किस ओर जावें, ऐसे
कर्त्तव्यविमूढ़ होकर हम सब आपकी ही शरणागति में प्राप्त हुए हैं।
जब तक पाताल लोक से उठकर काल कञ्जरादि असुर हे लोकेश्वर!
हमको बाधा पहुँचाते हैं तब तक आप भय से हमारी रक्षा कीजिए। यह
जगतों का अतिक्रम किस कारण से हो गया है यह हम नहीं जानते हैं।
इस विप्लव का क्या कारण है यह भी हम नहीं जानते हैं। मार्कण्डेय
मुनि ने कहा-दिव्यदर्शी पितामह ब्रह्माजी ने देवों के इस वचन का
श्रवण करके एक क्षण पर्यन्त ध्यान करते हुए सुरोत्तम से कहा-ब्रह्माजी
ने कहा हे देवताओं! जिस कारण यह लोकों का विप्लव हो रहा है
उसका आप श्रवण करिए। देव सोम ने दाक्षायणी सत्ताईस संख्यावाली
अश्विनी आदि का श्रेष्ठ वधू के रूप में भार्या बनाने के लिए उनके
साथ परिणय किया था।
उस सोम ने उस सबके साथ परिणय करके वह चन्द्र केवल
रोहिणी में ही निरन्तर अनुराग से प्रवृत्त हुआ था और अन्य सब में यह
अनुराग नहीं किया था। वे सब अश्विनी आदि कन्यायें ज्वर से
प्रपीड़ित थीं। वे छब्बीस वर आरोहण वाली कन्यायें पिता के समीप
में आ गयी थीं। जिस प्रकार से निशानाथ अनुराग से रोहिणी में प्रवृत्त
होता रहता है उस भाँति उन सबका सेवन नहीं किया करता है। यह
सब उस प्रजापति दक्ष से निवेदन कर दिया था। इसके अनन्तर महा
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १२३
बुद्धिमान दक्ष ने सोम के द्वारा चन्द्रदेव की स्तुति करके और बहुत
अधिकासूनृत वचनों से सम्भाषण करके अपनी पुत्रियों के लिए
अनुरोध किया था। तब महात्मा के द्वारा अनुरुद्ध होकर चन्द्र ने उन
सब में समान ही प्रवृत्त होने की प्रतिज्ञा की थी। चन्द्रदेव ने उन सबमें
समान भाव रखने की बात स्वीकार करने पर वह मुनि श्रेष्ठ दक्ष भी
अपने निवास स्थान को चला गया था। उस मुनि श्रेष्ठ दक्ष प्रजापति
के चले जाने पर चन्द्र ने उनमें विषमभाव का त्याग नहीं किया था और
वे फिर निरन्तर क्रोधित होकर अपने पिता के समीप में गई थीं।
इसके अनन्तर पुनः दक्ष ने दूसरी सुताओं के विषय में अनुरोध
किया था और समान व्यवहार रखने की प्रतिज्ञा कराकर उसने यह
वचन कहा था कि हे चन्द्र! यदि आप समान व्यवहार नहीं करेंगे और
आप यदि इन सब ही में अनुराग न करेंगे तो मैं आपको शाप दे दूँगा।
इस कारण से जो समुचित हो वही आप व्यवहार सभी के प्रति करिए।
इसके उपरान्त दक्ष के चले जाने पर उस चन्द्र ने समान बर्ताव नहीं
किया तो पुनः दक्ष के समीप में जाकर क्रोध के साथ कहने लगीं। वह
चन्द्रदेव आपके कथित वचनों का सत्कार नहीं करते हैं और वे हम
सबमें प्रवृत्त नहीं होते हैं अर्थात् हम सबका सेवन अभी भी नहीं किया
करते हैं। अतएव अब हम सब तपश्चर्या करेंगी और आपके ही समीप
में स्थित रहा करेंगी। अपनी उन पुत्रियों के इस वचन का श्रवण करके
महामुनि दक्ष परम क्रोधित हो गये थे और फिर चन्द्रदेव के क्षय करने
के लिए शाप देने को उत्सुक हो गये थे। हे महामुने! शाप देने के लिए
उद्यत मन वाले और महान कुपित हुए उन दक्ष प्रजापति की नासिका
के अग्रभाग से क्षय नाम वाला एक महान रोग निकल पड़ा था। उस
महारोग को चन्द्रदेव के लिए प्रेरित कर दिया गया था जो कि मुनिवर
दक्ष के ही द्वारा भेजा गया था। वह महारोग चन्द्रदेव के देह में प्रवेश
कर गया था और उसने चन्द्र को क्षयित कर दिया था।
चन्द्रमा के क्षीण हो जाने पर महात्मा की ज्योत्स्ना ( चाँदनी ) भी
क्षय को प्राप्त हो गयी थी। ज्योत्सना के क्षीण हो जाने पर समस्त
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औषधियाँ भी क्षय को प्राप्त हो गयी थीं । औषधियों के अभाव से ही
इस लोक में यज्ञों की सम्प्रवृत्ति नहीं हुआ करती है । यज्ञों के न होने
ही से वृष्टि का अभाव हो रहा है और समस्त प्रजाओं का क्षय हो रहा
है । यज्ञ के भागों के उपयोग से हीन आप लोगों की दुर्बलता समुत्पन्न
हो गई और स्वगोचर से विकार को गया है । यही सम्पूर्ण हमने आपको
बतला दिया है जिस रीति से लोकों में विप्लव हो रहा है । हे सुरोत्तमों!
अब यह भी आप लोग श्रवण कर लीजिए कि जिस उपाय से इस
विप्लव की शान्ति होगी ।
ब्रह्माजी ने कहा-हे सुरगणों! अब आप सब लोग दक्ष प्रजापति के
गृह को चले जाइए और उनको प्रसन्न करिए कि चन्द्रदेव का अर्थात
उनके क्षीण होने का महारोग दूर हो जावे । चन्द्रदेव के परिपूर्ण हो जाने
पर सम्पूर्ण जगत् प्रकृति में स्थित हो जायेगा और आपको भी शान्ति
की प्राप्ति हो जायेगी तथा समस्त औषधियों की समुत्पत्ति भी हो
जायेगी । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-ब्रह्माजी के इस वचनामृत का
श्रवण करके समस्त देवगण जिनमें इन्द्रदेव सबके आगे चलने वाले
नायक से परम प्रसन्न मन वाले होते हुए उस समय में दक्ष प्रजापति के
सदन अर्थात निवास स्थान पर गए थे । वहाँ पर सब सुरगणों ने नीति
के अनुसार उपस्थान करके मुनिवर प्रजापति दक्ष को प्रणाम करके
बहुत ही विनम्रता संयुत मधुर वाणी से उन्होंने कहा । देवों ने कहा-हे
ब्राह्मण! अत्यन्त दुःखित हमारे ऊपर प्रसन्न होइये, हे महाबुद्धे ! हमारी
इस शोक के सागर से रक्षा कीजिए और उद्धार करिए । सृष्टि की
रचना करने वाले परमात्मा का ब्रह्मा संज्ञा वाला जो रूप है उन्हीं के
अंश समस्त जगतों के आप परम ज्योति हैं । हे विप्ररूप! आपके लिए
हमारा नमस्कार है । प्रजा की रक्षा करने से और प्रजा के पालन करने
के कारण से दक्ष और प्रजापति आप योगेश हैं, आपको हम प्रणाम
करते हैं ।
समस्त जगतों की रक्षा के लिए और कुशल आत्मा वालों के लिए
तथा आत्मा के हित के लिए, दक्ष के लिए, महात्मा के लिए शीघ्र
आपके लिए नमस्कार है। नियत इन्द्रियों वाले योगियों के द्वारा निरन्तर
चिन्तन किये हुए सार का भी आप सारभूत हैं। ऐसे परमात्मा दक्ष के
लिए नमस्कार है। योगियों की वृत्ति को अनाधृष्ट करके पारगामियों
में परायण सहसा ही आद्यन्न कहा गया है उनके लिए नित्य ही नमस्कार
है, नमस्कार है। इन प्रकार से कहे हुए उन यज्ञ के भागों का सेवन
करने वालों के वचन को सुनकर दक्ष प्रसन्न मुखवाला होकर मुख्य रूप
से इन्द्रदेव को सम्बोधित करके बोले। दक्ष ने कहा-हे महाबाहो! हे
इन्द्रदेव! आपको यह महान् दुःख कैसे प्राप्त हो गया है? हे विभो!
आप इस दुःख का हेतु तो बतलाइए। मैं उसके श्रवण करने की इच्छा
कर रहा हूँ। आप लोगों के दुःख को दूर करने के लिए मेरा क्या
कर्त्तव्य होता है? उसको यदि मैं कर सकता हूँ तो अवश्य ही करूँगा।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस महान आत्मा वाले ब्रह्माजी के पुत्र के वचन
का श्रवण करके नीतिक्षेत्र वाक्पति इन्द्रदेव ने उस महामुनि से कहा था।
शचीपतिशक्र ने कहा-निशानाथा चन्द्रक्षयी अर्थात् क्षय होने वाला
हो गया है। उसके क्षीण हो जाने पर सभी औषधियां क्षय को प्राप्त
हो गई हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, उनकी हानि यज्ञों की हानि करने वाली हैं।
कुछ तो प्रजा वृष्टि के अभाव से महान दुःख को पाकर नष्ट हो गई
है। यह निशानाथ चन्द्रमा का जो क्षय है वह आपके ही कोप से प्रवृत्त
हो गया है और इस क्षय से पूरे जगत् का ही विनाश हो जायेगा। इस
समय में ऐसा कुछ भी नहीं है जो क्षोभ से युक्त न हो। हे विप्रेन्द्र! इस
समय सभी विलुप्त हैं चाहे स्थावर हो या जंगम होवे या पतंग ही होवे।
इस समय से न तो यज्ञ सम्प्रवृत्त हो रहे हैं और तापस गण ही तपश्चर्या
किया करते हैं। आहार के अभाव के कारण होने वाले दुःख से समस्त
प्रजा क्षीण और भय से आतुर हैं। हे विपेन्द्र! ऐसा प्रवृत्त होने पर इस
रसातलिक से जब तक दैत्य उठकर बाधा नहीं पहुँचाते हैं तभी तक
आप उद्धार कीजिए। हे दक्ष! चन्द्रदेव पर प्रसन्न होइए और अपने तप
के बल से उसे पूर्ण बना दीजिए। चन्द्रदेव के परिपूर्ण हो जाने पर
सम्पूर्ण जगत् प्रकृति में स्थित हो जायेगा।
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मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से उसके वचन का श्रवण
करके उस समय में प्रजापति के उन सुरगणों से हृदय के शल्य का
उद्धार करते हुए बोले। दक्ष प्रजापति ने कहा-जो मेरा वचन निशानाथ
चन्द्र में शाप का व्यसन कर प्रवृत्त हुआ है उसको किसी भी निदान के
द्वारा मैं मिथ्याभूत करने का उत्साह नहीं करता हूँ। किन्तु मेरा वचन
एकान्त रूप से जिससे वृथा न होवे और चन्द्र भी बढ़ता रहे, जिससे
वही उपाय देखिए। उसमें भी एक उपाय है कि जो चन्द्रमा मास के
आधे भाग में क्षय और वृद्धि को प्राप्त होकर भार्याओं से समान बर्ताव
करे। उस प्रजापति को प्रसन्न करके उसके उस वचन का श्रवण करके
समस्त देवगण वहाँ पर गये थे जहाँ पर चन्द्रमा रहता है। हे द्विजो! दक्ष
मुनि के द्वारा इस प्रकार से वचन के कहने पर इसके अनन्तर उस समय
में भार्याओं के सहित चन्द्रमा का समाधान करके वे परम प्रसन्न सुरश्रेष्ठ
ब्रह्माजी के भवन में गये थे। हे महाभागो! वहाँ पर पहुँचकर जैसा दक्ष
प्रजापति ने कहा था वह सभी परमात्मा ब्रह्माजी से उन्होंने कह दिया था।
उस समय में ब्रह्माजी देवों के मुख से दक्ष प्रजापति के वचन का
श्रवण करके वे फिर सब सुरों के साथ चन्द्रभाग नामक पर्वत पर जो
कि एक महान् पर्वत था वहाँ चले गये थे। वहाँ पर सुरों के श्रेष्ठ ने
जाकर प्रजाओं के हित की कामना से वृहल्लोहित पुष्य में चन्द्रदेव को
स्थापित कर दिया था। उस सरोवर में स्नान करने वाले जन्तु को
निरोगता हो जाया करती है। बृहल्लोहित नाम वाले सरोवर में स्नान
करने से प्राणी चिरायु अर्थात् बड़ी उम्र वाला हो जाया करता है। वहाँ
पर स्नान किए हुए चन्द्र के शरीर से उसी क्षण में रोग निकल गया था
जिसका नाम राज्यक्ष्मा था जैसा कि पूर्व रूप कहा गया है। राज्यक्ष्मा
भी निकलकर जगत् के पति ब्रह्माजी को प्रणाम करके उससे बोला था
कि मैं क्या करूँगा और कहाँ पर जाऊँगा। क्योंकि आप इस सम्पूर्ण
जगत् के सृजन करने वाले हैं अतएव हे लोकेश! मेरा सनातन
कृत्य-स्थान और पत्नी को मेरे ही अनुरूप निर्देश कीजिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर चन्द्रमा के शरीर में स्थित
ൡ श्रीकालिका पुराण ൡ १२७
अभियुक्त अमृंतों से परिपुष्ट उसको देखकर और क्षीण हुए चन्द्रमा को
देखकर उन्होंने स्वयं ही हाथों से उसका ग्रहण करके गिरि में बारम्बार
निष्पीडित किया था और उस राजयक्ष्मों के शरीर से उस अमृत को
गालित किया था। उस समय में जो शीघ्र ही अमृत जल में गलित किए
गये थे। लोकभृत ने क्षीरसागर के मध्य में एकान्त में प्रक्षिप्त कर दिया
था। जो पहले उसके उस अमृत से चन्द्र की कलाएं क्षीण हो गयी थीं
उनके चूर्णों को क्षीरोद सागर से लव से ग्रहण किया था। राजयक्ष्मा
के संसर्ग से एक कला मात्र ही शेष वाले इसकी क्षीण हुई पन्द्रह
कलाएं जो पूर्व में अमृत से परिपूर्ण थीं वे राज्यक्ष्मा के गर्भ में स्थित
थीं और पीड़ा से तृष्णीभूत थीं वे ज्योत्स्ना के अमृंतों से जो कलपापति
का निबद्ध शरीर था वह राजयक्ष्मा के गर्भ में स्थित तीन प्रकार का
हो गया था।
वह ज्योति से परिपूर्ण हो गया था और ज्योत्स्ना राजयक्ष्मा में लीन
हो गई थी और रोग के गर्भ में स्थित सम्पूर्ण सुधा द्रवीभूत हो गई थी।
जिस समय ब्रह्माजी ने राजयक्ष्मा के अन्तर से सुधा को निर्गलित किया
था उस समय समस्त ज्योत्स्ना सुधा की ज्योति उससे बहिर्गत हो गई
थी। उसी समय विधाता के द्वारा वह सम्पूर्ण क्षीरोद सागर में प्रक्षिप्त
कर दी गयी थी। उन देवों को उस पर्वत में परित्याग करके वह स्वयं
वहाँ से शीघ्र ही गमन कर गये थे। इसके उपरान्त कलापूर्ण अमृंतों का
जल से प्रक्षालित करके उन तीनों को ग्रहण करके शीघ्र ही ज्योत्स्ना
का भी प्रक्षालन करके उस गिरि पर समागत हो गए थे। उस समय
विधाता क्षीरोद से चन्द्रभाग पर्वत पर पहुँचकर देवों के मध्य में
ज्योत्स्ना कलाओं के चूर्ण में प्रवृष्टि हो गयी थी। ब्रह्माजी ने उन तीनों
को संस्थापित करके वे देवों के मध्य में संस्थित हो गए थे। उसके स्थान
आदि के विषय में निर्देश करते हुए उन्होंने राजयक्ष्मा से कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा—हे राजयक्ष्मा ! जो सर्वदा ही रात दिन व सन्ध्या
के समय में वनिता में रत रहा करता है और उसमें सुरत को सेवन
किया करता है वहाँ पर ही आप निवास करेंगे। जो प्रतिश्याय
१२८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
(जुकाम-सर्दी) श्वास और कास से समन्वित होता हुआ भी मैथुन को
समाचरण किया करता है और श्लेष्मा (कफ) का उसी प्रकार वाला
हुआ करता है उसमें ही आपका प्रवेश होना चाहिए। जो कृष्णनाम
वाली मृत्यु की पुत्री है और आपके गुणों के ही तुल्य है वही आपकी
भार्या होवेगी जो निरन्तर ही आपका अनुगमन किया करेगी। आपका
कर्म भी यही है कि जो क्षीणता करें उसी को आप अपना विषय बना
लेवें। अब आप बहुत ही शीघ्र चले जाइए और आप चन्द्र से विमुख
हो जाइए। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस रीति से विधाता के द्वारा विदा
किया गया महान रोग राजयक्ष्मा समस्त देवगणों के देखते हुए ही
अन्तर्धान को प्राप्त हो गया था। उस महान रोग के अर्न्तधान हो जाने
पर लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को पन्द्रह कलाओं के द्वारा
समृद्धिपूर्ण कर दिया था। फिर ब्रह्माजी ने सुता से पूत और क्षीरोद से
धौत उसके द्वारा तथा ज्योत्स्ना के सहित कलाओं के चूर्णों से पूर्व की
ही भांति चन्द्रदेव को कर दिया था। जिस समय में सोलह कलाओं से
परिपूर्ण चन्द्र पूर्व की ही भाँति शोभित था उस समय में समस्त देवगण
उसके दर्शन से बहुत अधिक प्रसन्न हुए थे। इसके अनन्तर उस पूर्ण
चन्द्र ने पितामह के लिए प्रणिपात किया था। अत्यन्त हर्षित न होते हुए
सुरों ने सभा के मध्य में संस्थित होते हुए यह वचन कहा था।
सोमदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी! मेरे शरीर में पूर्व की ही भाँति
श्यामलता नहीं है और न तो वैसा पराक्रम ही है और न वैसा उत्साह
ही है। मेरे अंग की सन्धियाँ निषीदित हैं। मैं पहली की ही भाँति
चेष्टायें करने के लिए सुनरा अर्थात् अपने आप ही उत्साहित नहीं होता
हूँ। हे लोककृत! मैं निरन्तर चेष्टा से हीन होता हुआ किस कारण से
रहता हूँ? ब्रह्माजी ने कहा-हे सोम! यक्ष्मा के द्वारा ग्रस्त आपकी जो
अंग की सन्धियाँ हो गई हैं वे पूर्व में विकीर्ण हो गई हैं और अब वह
पूर्णता को प्राप्त नहीं है। अब इस समय में मैंने आपसे देह का चूर्ण
निकाल दिया है। राजयक्ष्मा के शरीर से अमृत की ज्योत्सना शीघ्र ही
निकाल दी है। उनके प्रक्षालन की विधि में जो लव के रूप में जल
§०३ श्रीकालिका पुराण ०३ १२९
में स्थित है क्योंकि आप ज्योत्स्ना से और सुधा से उसी से हीन हैं ।
इसके उपरान्त आपकी अंग संधियां, हे राजन! इस समय में सीदित हो
रही हैं। उपाय भी मैं करूँगा जिससे आप किसी पीड़ा को प्राप्त न होवें ।
पुर के अध्वर में प्राजापत्य पुरोडाश का हवन करना चाहिए।
इसके उपरान्त ऐन्द्र और पीछे आग्नेय सभी ऋतुओं में देना चाहिए।
इसके अनन्तर आपका भाग पुरोडाश मैंने किया है। उस भाग के भोग
करने वाले जो नित्य ही यज्ञ के द्वारा कृत है पूर्व की ही भाँति आपका
उत्साह और श्याम वीर्य हो जायेगा। जो आपके अमृत के कण क्षीरोद
के जल में स्थित हैं अथवा आपके शरीर का चूर्ण और ज्योत्स्ना के
जो लव हैं । हे विभो! वह सब आपकी ज्योत्स्ना योग से अनुदिन वृद्धि
को प्राप्त होगा जो निरन्तर क्षीर सागर के गर्भ में गमन करने वाला है।
द्वितीय स्वरोचिष के अन्तर के प्राप्त होने पर शंकर के अंश से जायमान
दुर्वासा विप्र सूर्य की ही भाँति प्रचण्ड और चण्ड होगा। उसने देवेन्द्र
के अविनय से सदारुण शाप दे दिया था। सुर और असुरों से सहित
तीनों भुवनों को बिना श्री वाला कर देगा फिर लोक के श्री से हीन
होने पर लोक में विप्लव हो जायेगा। हे सोम! जिस तरह से आपके
क्षय होने से सबका विप्लव प्रवृत्त हो गया था।
वह मनुष्य के प्रमाण से तीसरे कृत युग में होगा और जब तक
चारों युग होंगे स्थित होगा। इसके अनन्तर देवों के साथ चतुर्थ कृतयुग
के सम्प्राप्त होने पर मैं शम्भु और विष्णु क्षीरोद का निर्मन्थन करेंगे।
मन्दराचल को मन्थन करके अर्थात् मथान करने का साधन बनाकर
फिर वासुकि सर्प का नेतरा बनायेंगे। यज्ञ भागों के लीन होने पर
देवान्न के लिए हम फिर देवों के साथ दानवों के साथ मिलकर क्षीरोद
का मन्थन करेंगे। आपके शरीर का यह अमृत जो क्षीरसागर में स्थित
है उसको प्रमथन करके हम राशिभूत तथा क्षय को ग्रहण करेंगे। उस
समय में हम आपके शरीर को सर्वौषधियों के अनन्तर से करके हे
विभो! आपके शरीर के लिए सागर के जल में प्रथिप्त कर देंगे। सागर
का निर्मन्थन करके और पीछे जब अमृत का समुद्धरण करेंगे तो उस
[Header] १३० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
समय आपका वपु पूर्व की ही भाँति सम्भूत होगा। ओज और वीर्य से
अद्भुतकान्त अक्षय और सुधात्मक अर्थात् सुधा से परिपूर्ण हर अंग की
सन्धियों वाला आपका शरीर परम सुन्दर हो जायेगा।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने इस प्रकार
से सुधांशु (चन्द्रमा) से कहकर चन्द्र के क्षय के लिए और आधे मास
तक वृद्धि के लिए यत्नों वाले हुए थे। जैसा प्रजापति दक्ष ने कहा था
कि चन्द्रमा आधे मास तक क्षय और वृद्धि को प्राप्त होवे उस मासार्ध
में विधाता ने यत्न किया था। फिर सुरों में ज्येष्ठ ने चन्द्रमा को सोलह
प्रकार से विभक्त किया था और ऐसा विभाग करके समस्त देवों से
वे यह उत्तम वचन बोले थे। चन्द्रमा की सोलह कलायें हैं उनमें एक
भगवान् शम्भु के मस्तक में आज की अवधि पर्यन्त स्थित रहे और
पराक्षय के बिना ही क्षय को प्राप्त होंवे। दक्ष के वाक्य से यदि क्षय
रोग से मासार्ध तक क्षय के लिए चन्द्र प्रपीड़ित किया जाता है तो उस
समय में उपशान्ति नहीं होगी किन्तु जिसकी जो कला शम्भु में है
ज्योत्सना उसके ही प्रति गमन करे। हे सुरोत्तमो! प्रतिमास में चौदह
कलाओं की संस्था है। आप लोग प्रतिपदा तिथि से आरम्भ करके
चतुर्दशी पर्यन्त चतुर्दश की संस्थाओं से भी तथ्यों का पालन करें।
तेजों के लोग चतुर्दशी तिथि में क्रम से सूर्य के विम्ब में प्रवेश
करें। इस प्रकार से कृष्णपक्ष में चन्द्र का क्षय होता है। शेष कला
हरित्यन्त्र में पलायित दर्श में जावें। उस तिथि में निशापति के प्रथम
भाग में स्थित रहे। द्वितीय दर्श भाग में रोहिणी के मन्दिर में गमन करे।
तीसरे भाग में तो सरस्वती में स्नान करके चन्द्र समुत्थित होता है।
विभावस्तु के चतुर्थ तिथि भाग में वह बल से सम्पूर्ण होता है। विम्ब
में स्थित घोटक के सहित यह चन्द्रमा मण्डल में जावे। जितने समय
पर्यन्त प्रथमा कला क्षय को प्राप्त होवे इसी प्रकार से कृष्णपक्ष में तब
तक वह प्रतिपदा होती है। द्वितीयादि में कृष्णपक्ष में उसी प्रकार की
वृद्धि तथा ह्रास होता है। तिथियों की वृद्धि का हेतु शुक्ल और कृष्ण
में उसी भाँति होता है। इसके अनन्तर फिर शुक्ल पक्ष में जब तक पूर्व
कला उचित होती है तब तक वृद्धि को नहीं जाती है और आदि से
प्रतिपदा तिथि है ।
इसके अनन्तर द्वितीय भाग की जो ज्योत्स्ना भगवान् हर के मस्तक
में है और जो स्थित है वह जावे और गयी हुई वह फिर आ जायेगी ।
आपके द्वारा दिन-दिन में अमृत पीने के योग्य होता है । हे सुरोत्तमो !
वह पूर्ण अन्त वाला द्वितीया आदि तिथियों से सदा ही चन्द्र स्वंय ही
उत्पन्न होगा क्योंकि वहाँ पर ज्योत्स्ना का योग होता है उसी के उसी
से उसकी समुत्पत्ति होगी । जिस प्रकार से दिन-दिन में भाग क्षण को
प्राप्त होते हैं वे अनुचित चन्द्र की वृद्धि को प्राप्त होते हैं । हे सुरो !
शुक्ल पक्ष में भी प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुआ करते हैं । सूर्य के बिम्ब
से तेज का भाग पुनः ही समागत होगा । जिस प्रकार से कृष्णपक्ष में
उसी भाँति भाग के क्रम को प्राप्त होगा । भगवान् शम्भु के मस्तक में
संस्थित चन्द्रमा से ज्योत्स्ना प्रति दिन पुनः आयेगी । सूर्य के बिम्ब से
तेजोभाग स्वयं ही अमृत की वर्षा करता है । इसी प्रकार से शुक्ल पक्ष
में चन्द्रमा की वृद्धि होगी । दोनों पक्षों में जो शुक्लत्व और कृष्णत्व के
नाम हैं वे चन्द्रमा के क्षय और वृद्धि से ही हुआ करते हैं । जब चन्द्र
वृद्धि को प्राप्त होता है तो उसे कृष्ण पक्ष पुकारा जाया करता है ।
जितने काल के द्वारा जो भाग क्षयं और वृद्धि को प्राप्त होगा उतने ही
काल को अभिव्यक्त करके वह तिथि फिर स्थित रहेगी ।
चिरकाल में वृद्धि अथवा क्षय शीघ्रता से वृद्धि अथवा क्षय को
द्रुत से अर्थात् शीघ्रता से तिथियों का सदा क्षय होता है और चिरकाल
से तिथियों में प्रवेश में वृद्धि होती है । हव्य और कव्य चन्द्रदेव के बिना
सम्भव नहीं होगा । इस कारण से उसकी वृद्धि के लिए हे देवताओं !
आप लोग चन्द्रदेव की रक्षा करें । 100 अनुमास से कला शेष चन्द्रदेव
का आस्वादन करना चाहिए । अमावस्या के अपराध काल में तो वह
पितृगणों के साथ रोहिणी के मन्दिर में रहता है । उसके ही आस्वादन
से प्रतिदिन कला की वृद्धि हुआ करती है । उस कव्य से पितृगण भी
परामृप्ति को प्राप्त होंगे । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सभी
१३२ ६०(२ श्रीकालिका पुराण ५०(३
सुरगण जैसा भी विधाता ने कहा था वैसा ही उन्होंने चन्द्र की क्षय और
वृद्धि के लिए लोक हित के स्वरूप चन्द्रमा के अर्धभाग को देवों
सहित विधिपूर्वक अत्यन्त क्षुधित होकर शिर से ग्रहण किया था। जो
तेज परनित्य अज, अव्यय और अक्षय है उस स्वरूप वाली ही चन्द्रमा
की कला है जो प्राप्त हो गई थी।
जिस समय योगी की आनन्दज, अजर और पर ज्योति प्रवेश
किया करती है उस समय में उनका चिन्तन लीनता को प्राप्त हो
जायेगा। महादेव के मस्तक में विराजमान सुधा निधि के होने पर चित्त
की लीनता में चन्द्र के द्वारा मुक्ति हो जाया करती है। इस प्रकार से
यह वैदिकी श्रुति है। महादेव जी ने इसका ज्ञान प्राप्त करके क्षय और
वृद्धि के अनिवाकृत चन्द्र को लोकों के हित के लिए शिर के द्वारा
ग्रहण किया था। चन्द्रमा की ज्योत्स्ना के समायोजन से औषधियाँ वृद्धि
को प्राप्त हुआ करती हैं। सब औषधियों के प्रवृद्ध होने पर ही अध्वरों
की प्रवृत्ति हुआ करती है। अध्वरों के प्रवृत्त हो जाने पर देवगण
अपने-अपने भागों का परिग्रहण किया करते हैं और पितृगण बहुत से
कव्यों को ग्रहण करते हैं। अमृत ब्रह्माजी ने देवगणों के लिए बहुत
पुरातन सृजा था अब देवता लोग हव्यभाग से हीन हुये जो भी हैं वे
उसके द्वारा ही तृप्ति का लाभ किया करते हैं। यज्ञ के आयातित भी
वह ज्योत्स्नाओं से निश्चय ही वृद्धि को प्राप्त होता है और वह यज्ञों
की ज्योत्स्ना के विनाशभूत अन्यथा क्षीण हो जाया करता है।
अतएव यज्ञ के अमृत का कारण भी चन्द्रमा ही स्वयं होता है
अतएव दक्ष प्रजापति के शाप से रक्षा के लिए चिकीर्षित होता है।
आज भी कृष्णपक्ष में सुरगणों के द्वारा चन्द्र का पान किया जाया
करता है। तेज तो सूर्य देव को चला जाता है और चन्द्र का अर्धभाग
तथा उसकी ज्योत्सना भगवान् शम्भुदेव के समीप में चले जाया करते
हैं और फिर शुक्ल पक्ष में शेष कला उदित हुआ करती है। ज्योत्सना
का दूसरा भाग और द्वितीय तेज का भाग और अन्य भी शिव के
मस्तक में संस्थित चन्द्रमा से और क्रम से सूर्य के बिम्ब से चन्द्र की
श्रीकालिका पुराण १३३
सोलह कलायें हैं उनमें एक भगवान् शम्भु के मस्तक में रहा करती है ।
शेष कलाओं के सित और असित अर्थात् शुक्ल और कृष्ण ये दोनों
पक्ष उदय और क्षय वाले ही होते हैं । यह सब मैंने आपको बतला दिया
है । जिस प्रकार से भी चन्द्रमा का विभाग किया गया है, जिस रीति
से ब्रह्मा के द्वारा उस श्रेष्ठ पर्वत में चन्द्रमा समागत हुआ था । जिस
कारण से यज्ञ भाग के स्थित होने पर विभु को देवों का अन्न किया
था । जिस तरह से कव्य के स्थित होने पर भी पितृगण का अन्न
तिथियों का क्षय और वृद्धि होता है । इस परम पुण्यतम आख्यान को
जो भी कोई मनुष्य एक बार भी श्रवण कर लिया करता है उसके कुल
में राजयक्ष्मा का महारोग कभी भी किसी को नहीं रहा करता है और
न होता ही है । जो भी कोई मनुष्य राजयक्ष्मा से पराभूत है और विधाता
के वचन का श्रवण कर लेता है तो उसका यक्ष्मा विनष्ट हो जाया
करता है । यह आख्यान परमाधिक स्वस्ति अर्थात् कल्याण का स्थान है,
पुण्यमय है और शुभ तथा गुह्य से भी अधिक गोपनीय है । जो भी कोई
एकचित्त होकर इसको सुनता है वह महान् पुण्य का भागी होता है ।
◎ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--जहाँ पर सब महागिरि के शिखर पर
देवों की सभा हुई थी वहाँ पर विधाता के वचन से सीता नाम वाली
देव नदी समुत्पन्न हुई थी । जिस समय मनोहर सीता के जल से स्तवन
कराकर उन सब देवगणों ने ब्रह्मा के वाक्य से चन्द्र का पान कर गये
थे उस समय में सीता नदी का जल चन्द्रमा के स्नान के योग से वह
अमृत होकर उस वृहल्लोहित संज्ञा वाले में निपातित हो गया था । उस
समय में उसका जल बढ़ गया था और उस सरोवर में वह नहीं समाया
था । उसको ब्रह्माजी ने स्वयं ही देखा था कि वह विशेष बढ़ा हुआ
जल अमृत था । उसके देखने से उस जल से एक अत्युत्तम कन्या
समुत्थित हुई थी । उस कन्या का नाम चन्द्रभागा था जिसको कि
विधाता ने स्वयं ही रखा था । ब्रह्माजी की सहमति से सागर ने उसको
अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण कर लिया था । उसी के द्वारा
अधिष्ठित जल को निशावर्ति ने गदा के अग्रभाग से भेदन करके
१३४ श्रीकालिका पुराण
पश्चिम पार्श्व में उस गिरि के प्रति समवाहित कर दिया था।
उसके अमृत जल का भेदन करके वृहल्लोहित नाम वाला सरोवर
कर दिया था और वह चन्द्रभाग नदी तो सागर को गमन करने वाली
थी। उस समय सागर ने भी महानदी चन्द्रभाग भार्या को उस जल के
प्रवाह से उसको अपने भवन में ले गया था। इसी रीति से उसमें
चन्द्रभागा नाम वाली नदी समुत्पन्न हुई थी। वह चन्द्रभागा महान शैल
में अपने गुणों के द्वारा सदा गंगा के ही समान थी। नदियां और सब
पर्वत स्वभाव से ही दो रूपों वाले सदा हुआ करते हैं। नदियों का रूप
तो उनका जल ही होता है तथा शरीर दूसरा ही हुआ करता है। पर्वतों
का रूप को स्थावर ही होता है। इसी प्रकार से जल तथा उस समय
में नदी और पर्वत का स्थावर होता है। उनका काम तो अन्तर में वास
किया करता है और निरन्तर उत्पन्न नहीं होता है।
पर्वत का शरीर तो स्थावर के द्वारा ही आप्यायित होता है। उसी
भाँति नदियों का शरीर जल के द्वारा ही सदा आप्यापित हुआ करता
है। नदियों का तथा पर्वतों का रूप कामरूपी होता है। भगवान् विष्णु
ने यत्नपूर्वक पहले जगत् की स्थिति के लिए ही कल्पित किया था।
हे सुरगणों! जल की हानि होने पर निरन्तर ही नदियों को महान् दुःख
हुआ करता है और विकीर्ण हो जाने पर स्थावर गिरि के शरीर में
उत्पन्न होता है। उस पर्वत पर जो कि चन्द्रभाग नाम वाला था
बृहल्लोहित के तट पर गमन करने वाली सन्ध्या का अवलोकन किया
था और वशिष्ठ मुनि ने उस समय में बड़े ही आदरपूर्वक उससे पूछा
था। वशिष्ठ जी ने कहा-हे भद्रे! आप इस निर्जन महान् गिरि पर
किस प्रयोजन के लिए आयी हैं। हे गौरि! आप किसकी पुत्री हैं? और
आपका क्या चिकीर्षित है अर्थात् क्या करने की इच्छा रखती हैं। यदि
आपकी कोई भी गोपनीय बात न हो तो मैं यही सुनना चाहता हूँ।
आपका मुख तो चन्द्रमा के समान परमाधिक सुन्दर है किन्तु इस समय
में वह निःश्री सा क्यों हो रहा है? उन महात्मा वशिष्ठ मुनि के इस
वचन का श्रवण करके उन महात्मा का अवलोकन किया था जो
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १३५
प्रज्वलित अग्नि के ही समान थे। वे उस समय ऐसे ही प्रतीत हो रहे
थे मानो शरीरधारी ब्रह्मचर्य के ही सदृश हों। उन जटाधारी को बहुत
ही आदर के साथ प्रणिपात करके इसके पश्चात् उस संध्या ने उन
तपोधन से कहा था।
वशिष्ठजी द्वारा सन्ध्या को दीक्षा देना
सन्ध्या बोली-जिस प्रयोजन की सिद्धि के लिए मैं इस शैल पर
समागत हुई थी वह मेरा कार्य सिद्ध हो गया है। हे द्विजोत्तम! हे विभो!
आपके दर्शन मात्र से ही वह कार्य पूर्ण हो जायेगा। हे ब्रह्मन्! मैं
तपश्चर्या करने के लिए ही इस निर्जन पर्वत पर आई थी। मैं ब्रह्माजी
के मन से समुत्पन्न हुई हूँ और मैं लोक में सन्ध्या इस नाम से प्रसिद्ध
हूँ। यदि आपको कुछ गोपनीययुक्त होता हो तो आप मुझको उपदेश
दीजिए। यही मेरा परम गुह्य चिकीर्षित है और दूसरा कुछ भी नहीं है।
तपस्या के भाव का ज्ञान न प्राप्त करके ही मैंने इस तपोवन का उपाश्रय
ग्रहण किया है। मैं चिन्ता से परिशुष्क हो रही हूँ और मेरा मन सदा
ही काँपता रहता है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ
जी ने उस संध्या के वचन को सुनकर उन स्वयं ही सम्पूर्ण तत्त्व के
ज्ञाता मुनि ने उससे अन्य कुछ भी नहीं पूछा था। इसके अनन्तर उस
समय वशिष्ठ मुनि ने उस नियत आत्मा वाली और तप के लिए अत्यन्त
उद्यम धारण करने वाली उसको शिष्य-गुरु के ही समान वशिष्ठ ने
मन्त्र दीक्षा दी थी।
वशिष्ठ मुनि ने कहा-जो महान् तेज परम है, जो परम महान् तप
है, जो परम समाराधना करने के योग्य है उन भगवान विष्णु को ही
अपने मन में धारण करिए। जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन परम
पुरुषार्थों का एक ही आदि कारण है उन जगतों के आद्य पुरुषोत्तम प्रभु
का यजन करो। जो भगवान विष्णु शंख, चक्र, गदा और पद्म को
धारण करने वाले हैं और उनके लोचन कमलों के ही समान परम
सुन्दर हैं उनका वर्ण शुद्ध स्फटिक के तुल्य है और कहीं पर उनकी
छवि नीले मेघ के सदृश ही है। गरुड़ के ऊपर स्थल में चिह्न वाले,
परमशान्त और वनमाला के धारी, हरि का भजन करो। जो केयूर और
कुण्डलों को पहिने हुए हैं, जो किरीट और मुकुट से समुज्ज्वल हैं, जो
बिना आकार वाले केवल ज्ञान के द्वारा ही जानने योग्य हैं, जो आकार
के सहित देवधारी हैं, नित्य आनन्दस्वरूप, बिना अवलम्बन वाले और
सूर्य मण्डल के मध्य में संस्थित हैं ऐसे देवेश्वर विष्णु की इस मन्त्र के
द्वारा ही हे शुभानन वाली! आप यजन करो। वह मन्त्र ‘ॐ नमो
वासुदेवाय ॐ’ यह है। इसी मन्त्र के जाप के द्वारा निरन्तर मौनी होकर
तपश्चर्या का समारम्भ करो। उसमें कुछ नियम हैं उनका अब श्रवण करो।
नित्य स्नान मौन होकर करना चाहिए और मौन व्रत के साथ ही
पूजन करें। प्रथम तो छठवें दोनों कालों में पूर्ण और फलों का आहार
करें और तीसरे षष्ठ काल में उपवास परायण ही होना चाहिए। इस
प्रकार से तप की समाप्ति में षष्ठ काल की क्रिया होती है। वृक्षों के
छालों के वस्त्र धारण करें और उस समय पर भूमि में ही शयन करें।
इसी रीति से मौनी रहें और तपस्या नाम वाली व्रतचर्या फल के प्रदान
करने वाली होती है। इस तरह के तप का उपदेश करके इच्छापूर्वक
माधव भगवान का चिन्तन करो। वे प्रसन्न होकर आपके अभीष्ट को
शीघ्र ही प्रदान कर देंगे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर
वशिष्ठ जी ने उस संध्या के लिए तप करने की क्रिया का उपदेश देकर
और उससे न्याय के अनुसार सम्भाषण करके मुनि वहीं पर अन्तर्धान
हो गये थे। उसने तपस्या के भाव का ज्ञान प्राप्त करके और परम
आनन्द प्राप्त करके उसने वृहल्लोहित के तीर पर स्थित होकर
तपश्चर्या करना आरम्भ कर दिया था। उसने वशिष्ठ मुनि ने जैसा
कहा था उस मन्त्र को तथा तप के साधन को करके उसी व्रत से
भक्तिभाव के द्वारा गोविन्द का पूजन किया था। परम एकान्त मन
वाली को चारों युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलियुग) का समय व्यतीत
हो गया था।
उसके इस अद्भुत तप को देखकर कोई भी विस्मय को प्राप्त हुए