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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

[राज्याभिषेक वर्णन]

௬०९ श्रीकालिका पुराण ௬०९ ३७३
[राज्याभिषेक वर्णन]
और्व ने कहा-हे राजन् अब मैं आपको पुण्य स्नान की विधि के
क्रम को बताऊँगा जिसके विधान से ही विघ्न निरन्तर नाश को प्राप्त
हो जाया करते हैं । पौष मास में चन्द्र के पुष्य नक्षत्रगत होने पर राजा
को पुण्य स्नान का समाचरण करना चाहिए । यह स्नान सौभाग्य और
कल्याण के करने वाला होता है और दुर्भिक्ष तथा मरण का अपहरण
करने वाला होता है । विष्टि ( भद्रा ) आदि दुष्ट करण में, व्यतीपात
और वैधृति में वज्र, शूल, हर्षण आदि योग में यदि इसका लाभ होता
है तो तृतीया से युक्त पुष्य नक्षत्र रवि, शौरि और मंगलवार में तब यह
समस्त दोषों की हानि करने वाला होता है । ग्रहदोष होते हैं और राज्यों
में ईतियाँ होती हैं । तब पुष्य नक्षत्र में मासान्तर में भी करना चाहिए ।
यह शान्ति पहले समय में ब्रह्माजी ने गुरु के लिए बताई थी और
जगत्पति ने शक्र आदि समस्त देवों की शान्ति के लिए ही कहा था ।
तुष, केश, अस्थि, वल्मीक, कीट देश आदि से वर्जित, शर्करा, कृमि,
कूष्माण्ड, बहु कृष्ट से रहित, काक, उलूक, कंक, ककोल, गृध्र,
शौनकी से रहित और जलोका आदि से वर्जित, चम्पक, अशोक,
वकुल आदि से विराजित अपने स्थान में हंस और कारण्वों से
समाकीर्ण अथवा शुचिसर के तट पर पुण्य स्नान के लिए राजा को
उत्तम स्नान का ग्रहण करना चाहिए । इसके अनन्तर राजा और पुरोहित
अनेक वाद्यों की ध्वनियों के साथ प्रदोष के समय में उस स्थान पर पूर्व
दिन में गमन करें । उस स्थान की कौबेरी दिशा में पुरोहित स्थित होकर
सुगन्धित चन्दन, पान कर्पूर आदि से अधिवासित गोरोचनाओं से
सिद्धार्थों से, अक्षतों से जो फल आदि के सहित हो, 'गन्ध द्वारा'
इत्यादि मन्त्रों के द्वारा सबके अधिसिक्तों से उस स्थान को अधिवासित
करके वहाँ पर देवगणों का पूजन करना चाहिए ।
भगवान् गणेश, केशव, इन्द्रदेव, ब्रह्मा, देव शंकर उमा के सहित
और समस्त गण देवता और मातृगणों का पुरोहित के साथ राजा अर्चन
करे । मंगल कलशों को स्थापित करे और अनेक प्रकार के नैवेद्यों के

समुदायों का, पायस, स्वादु फल और मोदक तथा यावक देवे । उस
स्थान से भी भूतों को मन्त्र का उच्चारण करते हुए अपसारित करना
चाहिए । जो भूत भूमि के पालक हैं वे यहाँ से अपसरण कर जावें ।
भूतों का विरोध न करते हुए मैं स्नान के कर्म करता हूँ । इसके अनन्तर
दोनों हाथों को पुटित करके राजा इस मन्त्र के द्वारा इन पूज्य देवों का
पुष्प के अभिषेक लिए आवाहन करे । जो यहाँ पर पूजा के अभिलाषी
देव हों वे सब सुरगण यहाँ पर आगमन करें । सब दिशाओं के पालक
हों और जो भी अभागी होंवे आगमन करें । फिर पुष्पों की अञ्जलि
देकर पुनः इस मन्त्र का पाठ करें ।
मेरे इस स्थान को प्राप्त करके आज यहाँ पर बिबुध गण स्थित
हों । रक्षा करने वाले आप पूजा प्राप्त करके और राजा को शान्ति
प्रदान करके स्थित हों । इसके उपरान्त राजा स्वप्न में शुभ और अशुभ
का ज्ञान प्राप्त करे । देवी की पूजा करके रात्रि में स्थान में नृप को स्वयं
ज्ञान करना चाहिए । दोषों के ज्ञाताओं द्वारा सम्मत स्वप्न में शुभ,
अशुभ के फल को जानना चाहिए । यदि बुरे स्वप्न का दर्शन हो तो
पुरुष के अभिषेचन में चौगुना हवन करना चाहिए और सौ गौओं का
दान भी दे । गौ, घोड़ा, हाथी, प्रसाद, पर्वत वृक्ष का आरोहण शुभ
करने वाला और राज्यश्री की वृद्धि करने वाला हुआ करता है । दधि,
देव, सुवर्ण, ब्राह्मण की प्रदर्शन, दुर्वा, वीणा, अक्षत, फल, पुष्प,
क्षत्र, विलेपन, शीतांशु (चन्द्र), चक्र, शत्रु का, पद्म का और सुहृद
का लाभ, रात्रि में क्षय करने वाले हैं । रत्नाकार, भूभृत और उपराग
को देखना, निबड़ के द्वारा बन्धन करने वाला होता है । माँस का
भोजन, पर्वत का विवर्त्तन, नाभि के मध्य में वृक्ष की उत्पत्ति और मृत
पुरुष उतरना, पर्वत को, नदी का तथा स्रोत लाँघना, अपने पुत्र का
मरण, रुधिर और मदिरा का पान, पायस का भोजन तथा मनुष्य पर
आरोहण हे नृप श्रेष्ठ! ये स्वप्न राजा के कल्याण, सुख, सौभाग्य,
राज्य और शत्रुओं का क्षय किया करते हैं । गधा, ऊँट, और महिष का
आरोहण राज्य के नाश करने वाले हैं । रक्त वस्त्र का परिधान,
रक्तमाला और रक्त अनुलेपन, रक्त तथा काली की कामना करता

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३७५
हुआ भी मृत्यु को प्राप्त किया करता है । कूप के अन्दर प्रवेश तथा
दक्षिण दिशा में गति, कीच में निमज्जन या स्नान, भार्या और पुत्र का
विनाश करने वाला होता है ।
अन्य राज्य की प्राप्ति करके महान् कल्याण को प्राप्त किया करता
है । बीस हाथ दीर्घ और सोलह हाथ विस्तार से युक्त सब लक्षणों से
युक्त उत्तम यज्ञ मण्डल की रचना करनी चाहिए । इसके उपरान्त दूसरे
दिन में पूर्वाह्न में मातृगणों की पूजा करे । भीत में लगी हुई वसोर्धारा
तथा वृद्धि, श्राद्ध अर्थात् नान्दीमुख नामक श्राद्ध करे । चन्दन, अगुरु,
कस्तूरी, धूप, कर्पूर के चूर्ण मण्डल स्थान की भली भाँति पूजा करके
उसमें 'हौं शाम्भवे नमः' 'अस्त्राय हूँ फट्' इन दो मन्त्रों को बुध को
लिखना चाहिए ।
मन्त्र का ज्ञाता और मण्डल के ज्ञान रखने वाला पुरुष कम्बल से
उत्पन्न सूत्रों से अथवा कौशेयों से प्रथम स्वस्तिका नामक मण्डल का
लेखन करे । फिर चार हाथ प्रमाण वाला मण्डल लिखना चाहिए ।
मण्डल का पद्म एक हाथ प्रमाण वाला कहा गया है । डेढ़ हाथ के
प्रमाण वाले द्वार होने चाहिए । वह पद्म कर्णिमा के केसरों से
समुज्ज्वल होवे । सफेद, लाल, पीला, कृष्ण और हरा और शीली के
चूर्ण से, कौसुम्भ से तथा हरिदुद्भव हान्द्रि से अन्जन के चूर्ण से
मण्डल की वृद्धि के लिए रचना करे । पद्म के अन्दर से आरम्भ
करके पश्चिमगामी ताल को और पश्चिम के द्वार के मध्य में सौ हाथ
विनिर्दिष्ट करना चाहिए । द्वार के मध्य में सौ हाथ विनिर्दिष्ट करना
चाहिए । द्वार मध्य में प्रत्येक आठ पत्रों वाला होना चाहिए । मण्डल
के भाग में ज्ञात को चूर्णों से पृथक्-पृथक् ही करना चाहिए । चूर्णों
के द्वारा मण्डल की रचना करके फिर सूत्रों को उत्साहित करे । सूत्र
का उत्सारण करके प्रथम मण्डल का अर्चन करना चाहिए । 'भवनाय
नमः' इससे फिर हाथ से विनियोजित करे । मध्यमा, अनामिका और
अंगुष्ठ से इच्छानुसार ऊपर नीचे की ओर मुख वाली अंगुलियों को
करके विचक्षण पुरुष पातन कर देवे ।

३७६ श्रीकालिका पुराण
रेखा समान करनी चाहिए जो विच्छिन्न और पुष्परंजित हो । ज्ञाता
पुरुष के द्वारा अंगुष्ठ के पर्व की निपुणता से समादी करनी चाहिए ।
संसक्त, विषय, स्थूल, विछिन्न, कृसराकृत, पर्यन्त, अर्पित और ह्रस्व
कभी भी नहीं लिखनी चाहिए । यदि रेखा संसक्त हो तो उससे कलह
जानना चाहिए और ऊर्ध्व रेखा में विग्रह होता है । अत्यधिक स्थूल होने
पर व्याधि होती है, विमिश्रत होने पर नित्य पीड़ा होती है । बिन्दुओं
से भय को प्राप्त हुआ करता है, जो कि शत्रु के पक्ष की ओर से हुआ
करता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है । कृपा में अर्थ की हानि होती
है और रेखा छिन्ना हो तो उसमें निश्चय ही मरण हुआ करता है अथवा
अभीष्ट द्रव्य या सुत का वियोग होता है । जो भी कोई न जानकर ही
इच्छा के ही अनुसार मण्डल का लेखन करे तो वह सभी दोषों को
प्राप्त किया करता है जो भी दोष पूर्व में बताये गए हैं । ज्ञान रखने वाले
पुरुष के द्वारा सफेद सरसों और दूर्वा से रेखा करनी चाहिए । मण्डल
बारह होते हैं, उनके नाम विमल, विजय, भद्र, विमान, सुभद्र, शिव,
वर्धमान, देव, शताक्ष, काम्यादक, रुधिर, स्वास्तिक, ये ही बारह
मण्डल हैं । विचक्षणों द्वारा स्थान और यज्ञ के अनुसार ही योजित
करना चाहिए ।
सुरों के समूहों द्वारा अमृत के लिए सागर के मन्थन लिए जाने पर
पीयूष के धारण के लिए विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित किए गए थे ।
क्योंकि देवी की कलींकला-कला पृथक्-पृथक् आसन करके वे किए
गए हैं इसी से वे कलश नाम से कीर्तित हुए हैं । कलश नौ ही बताये
गए हैं । अब इनको नाम से समझ लो । गोह्योयगोह्य मरुत, मयूख,
मनोहाचार्य, भद्र, विजय, तनुदूषक, इन्द्रिघन, विजय ये नौ कहे गए
हैं। हे भूप! उनके ही दूसरे नौ नाम भी हैं उनका श्रवण करो जो सदा
ही शान्ति प्रदान करने वाले हैं । प्रथम क्षितीन्द्र कहा गया है दूसरा
जनसम्भव होता है । दो दो पवन और अग्नि हैं, फिर यजमान है ।
कोषसम्भव नाभि में छठवाँ कहा गया है । सोम सातवाँ कहा गया है
और आदित्य आठवाँ है । विजय नाम वाला कलश है वह नवम कहा

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३७७
गया है । वह पंचमुख कहा गया है जो महादेव के स्वरूप का धारण
करने वाला है । घर को पाँच मुखों में पंचवक्त्र स्वयं स्थित है । दिशा
के अनुसार वामदेव आदि नाम से भली भाँति स्थित हैं । मण्डप के
पद्म के अन्दर पञ्चवक्त्र घट का न्यास करना चाहिए । पूर्व की ओर
क्षितीन्द्र का न्यास करके पश्चिम में जल सम्भव का न्यास करे । सोम
का यजन उत्तर में करे तथा सौर का न्यास दक्षिण में करना चाहिए ।
इस रीति से कलशों का न्यास करके उनमें इनका विचिन्तन करे ।
कलशों के मुख में ब्रह्मा है और उनकी ग्रीवा में शंकर स्थित रहते हैं ।
मूल में भगवान् विष्णु संस्थित है और मध्य में मातृगण विराजमान हैं ।
दिक्पाल सब देवता दशों दिशाओं को वेष्टित किया करते हैं ।
कुक्षि में सात सागर हैं और सात द्वीप संस्थित हैं । नक्षत्र, समस्त ग्रह
तथा कुल पर्वत गंगा आदि नव नदियाँ, चारों वेद कलम में ये सभी
विराजमान रहते हैं । रत्न, सब बीज, पुष्प, फल, वज्र, मौक्तिक,
वैदूर्य, महादृम, इन्द्र स्फटिक से युक्त सर्वधाममय विम्ब, नागरोहुम्वर,
बीजपूरक, जम्बीर, काश्मीर, आम्रत, दाड़िम, यश, शाली, नीवार,
गोधूम, जितसर्षय, कुंकुम, अगुरु, कपूर, मदन, रोचन, चन्दन, माँसी,
एला, कुष्ठ, कस्तूरी, पत्र, चूर्ण, जल, निर्यास, काम्बुद, शैलेय, बदर,
जातीपत्र, पुष्प, काल शाक, पृक्वा, देवीपणक वचा, धात्री, मंज्जिष्ठा,
मंगलाष्टक, दूर्वा, मोहिनका, भद्रा, शतावरी वर्णों की सरला, क्षुदास्रह,
देवी, गजाह्वा, पूर्ण, कोषासिता, पीठा, गूंजा, शिर, सक, अनल,
व्यामक, गजदन्त शतपुष्प, पुनर्नवा, ब्राह्मी, देवी, रुद्रा, सर्वसन्धानि इन
सबका समाहरण करके कलशों में निर्धापति करना चाहिए । कलश के
देश के अनुसार, ब्रह्मा, शम्भु, गदाधर का क्रम के अनुसार पूजन करके
मुख्यता से भगवान् शम्भु का यजन करना चाहिए । प्रासाद मन्त्र के
द्वारा शम्भु का और तन्त्र के द्वारा शंकर का प्रथम मध्य में अनेक प्रकार
के नैवेद्यों के निवेदन द्वारा पूजन करना चाहिए । दिक्पालों के घटों में
ही दिक्पालों का अर्चन करे । पूर्व में बाहर स्थापित कलशों में ग्रहों का
पूजन करना चाहिए ।

३७८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

नवग्रहों का और मातृघटों में मातृकाओं का पूजन करना चाहिए ।
सभी देवों का घट में यजन करना चाहिए । उनके घट पृथक्-पृथक्
होते हैं । हे नृप ! पूर्व में नौ ही कहे गए हैं जो मुख्य तथा वर्णित हैं ।
भक्ष्य, भोजन, पेय अनेक भाँति के पुष्प और फल-पावक पायस जो
भी सम्भव योजित हों उनके द्वारा राजा सकल सुरों का पुष्प स्नान के
लिए पूजन करे । मंडल के दक्षिण में कुण्ड का निर्माण करके पायस,
समिधा, शाली सिद्धार्थ, दूर्वा, अक्षत तथा केवल घृत से पूजित सकल
सुरों को ऋत्विक् पुरोहित के सहित नृप वृद्धि के लिए होम के द्वारा
सन्तुष्ट करे । होम के अन्त में मण्डप के उत्तर में वेदिका में पदक के
सहित, रोचना नामक तथा अलंकारों को सबको नियोजित करे । वृद्धि
में अंगुलि से छब्बीस अंगुलिका की अवधि पर्यन्त वृत्त अथवा चौकोर
त्रिकोण संज्ञा वाले पद्म को । फिर पद्म के मध्य में मुगोष्टिक से
रत्नेशों को, श्रीवृक्ष, वरारोहा, शुभावन्त उमा देवी को सब रत्नों से और
अलंकारों से दो हाथ यह बनाना चाहिए । वह एक साथ विस्तार वाला
और नौ हाथ दश अंगुल वाला ऊँचा स्नान के लिए, डेढ़ हाथ का वृत्त
तथा गुणों से अवलम्बित करे । शय्या चौगुनी दीर्घ बनावे और धनुष
के मान वाला पीठ करे । गज और सिंह के द्वारा किए हुए आरोप
वाला और हेम तथा रत्नों से विभूषित सिंह नामक सार्ध विस्तार से
दण्डासन को अथवा व्याघ्र चित्रक पदों के द्वारा उपधानों को करावे ।
अथवा अन्यों के द्वारा निर्मित्त चर्म मृदुतूल से पूरित चार हाथ वाली
परिमाण में सुन्दर लक्षण से युक्त दीर्घ विस्तार से युक्त शय्या गुरु
विद्या से नृप की वितस्ति से अधिक की इच्छा करते हैं ।
केवल सोलह ही वर्ण और चित्र से युक्त करने चाहिए । यान,
सिंहासन, पट्टशय्या के उपकरण आदि राजा के योग्य हो वह वेदी के
उत्तर की ओर न्यस्त करे । उनके पश्चिम में सब प्रकार के रत्नों के
समुदाय से स्वतिक श्रेष्ठ पर्यंक पर जो यज्ञ के काष्ठ के समूह से
निर्मित महान् आस्तरण वाले, अर्धच्छादन से संयुत हो तथा चर्म से
आवृत चतुष्टय वाले, वृषभ के तथा सिंह शार्दूलों के ऊर्ण से आवृत्त

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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रत्नों से समन्वित पादपीठ पर राजा अपने चरणों को समारोपित करके
उस पर्यंक के पीठ पर स्थित चर्म खंड चतुष्टय में रत्नों से शोभित
अनेक अलंकारों से युक्त नृपति का स्नपन करावे । ब्राह्मणों के साथ
सुख से संगत राजा को जो सम्वीन काम्बल वाला कृष्ण और बहुत से
वस्त्रों से शोभित हो उसको कलशों के द्वारा बलि पुष्पादि से और
शालिं चूर्णों से स्नान करावे । आठ, सोलह, बीस, एक सौ आठ
अथवा अधिक कलशों की संख्या बतायी गयी है ।
उस संख्या से उत्तरोत्तर अधिक भी होती है । जय और कल्याणप्रद
मंत्रों से कौर मातृकों से आज्य को तेज समुद्दिष्ट किया है । आज्य पापों
के हरण करने वाला है । आज्य ही सुरागणों का आहार और आज्य
में लोक प्रतिष्ठित है । भूमिगत, अन्तरिक्षस्थ, अथवा दिव्य अर्थात्
दिवलोकगत जो भी आपको कल्मष आ गया है वह सब आज्य के
संस्पर्श से विनाश को प्राप्त होवे । इसके अनन्तर शरीर से कम्बल और
वस्त्र को अलग करके पुष्पों और स्नानीयों से पूरित कलशों के द्वारा
भूप को स्नान करावे । हे नृप श्रेष्ठ! शरीर के तत्त्वार्थ के साधक इन
मन्त्रों से राजा को स्नान करावे । सुरगण आपका अभिषिञ्चन करे और
जो सिद्ध एवं पुरातन हैं, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण,
आदित्य, सुगण, भिषग्वर, दोनों अश्विनी कुमार, देवमाता अदिति,
स्वाहा, लक्ष्मी, सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, कुहू, दिति, सुरमा,
विनिता, कद्रु, जो देव पत्नियां कही गयी हैं वे और देव मातायें सिद्ध
और अप्सराओं के गण सब आपका अभिषिञ्चन करें । नक्षत्र, मुहूर्त्त,
पक्ष, अहोरात्र, सन्धि, सम्वत्सर, निमेष, कला, काष्ठा, क्षण, लव ये
काल के सब अवयव आपका अभिषिञ्चन करे और जो सिद्ध एवं
पुरातन हैं, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, आदित्य, सुगण,
भिषग्वर, दोनों अश्विनी कुमार, देवमाता अदिति, स्वाहा, लक्ष्मी,
सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, कुहू, दिति, सुरमा, विनिता, कद्रु, जो
देव पत्नियां कही गयी हैं वे और देव मातायें सिद्ध और अप्सराओं के
गण सब आपका अभिषिञ्चन करें । वैमानिक अर्थात् विमानों पर

३८० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
संस्थित रहने वाले सुरों के समुदाय, सागरों के सहित मनुगण सरिताएँ,
महानाग, नाग, किम्पुरुष, वैखानस, महाभाग द्विज और अपनी दाराओं
के साथ सप्तर्षि गण जो ध्रुव के स्थान वाले हैं, मारीच, अत्रि, पुलह,
पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा, भृगु, सनत्कुमार, सनक सनन्दन, दक्ष, जेगीषव्य,
अभिनन्दन ।
एक, दो और तीन, जाबालि, कश्यप, दुर्वासा, दुर्विनीत कण्ड,
कात्यायन, मार्कण्डेय, दीर्घतमा, शनुःशेप, विदूरथ, और्व, सवर्त्तक,
च्यवन, अत्रि, पराशर, द्वैपायन, यव, क्रीति, देवरात, सहात्मज, ये और
अन्य जो भी देव व्रत में परायण हैं वे अपने शिष्यों के सहित और
अपनी दाराओं के साथ तप के ही धन वाले आपका अभिषिञ्चन करें ।
पर्वत, वृक्ष, नदियाँ और परम, पुण्य आयतन, प्रजापति, क्षिति, गौयें,
विश्व की मातायें, दिव्य वाहन, सब लोक, चर और अचर, अग्नियाँ,
पितर, तारा, जहमूत, आकाश, दिशायें, जल, ये और अन्य बहुत से
पुण्य संकीर्तन वाले तथा शुभ सब उत्पातों के नियर्हण करने वाले जलों
के द्वारा आपका अभिषिञ्चन करें । इस प्रकार से इन शुभ प्रदाता दिव्य
मन्त्रों के द्वारा दूसरों के द्वारा अभिषेक करे ।
निम्नलिखित मन्त्रों से व नारायणों से, रौद्रों से, ब्रह्मा और इन्द्र से,
समुद्भवों से, 'आपोहिष्ठा' इत्यादि से, 'हिरण्य' इससे, 'सम्भव'
इससे, सुर, इससे 'मानस्तोके' इस मन्त्र से और 'गन्ध द्वार', इस मन्त्र
के द्वारा, सर्वमंगल मांगल्ये इससे, 'श्रीश्चते', इसके द्वारा और ग्रह
योगियों से इस प्रकार से स्नान का समादन करके कम्बलों से शरीर को
आवृत करके 'सर्व मंगल' इत्यादि मन्त्र के द्वारा कपास से निर्मित वस्त्र
को धारण करना चाहिए । इसके उपरान्त आचमन करके देवों का, गुरु
का और विप्रगणों का अभ्यर्चन करना चाहिए । फिर ध्वज, छत्र,
चामर, घण्टा, अश्व, गज को मन्त्र का जप करके धारण करे और
इसके अनन्तर हुताशन के समीप गमन करना चाहिए । वहाँ पर जाकर
राजा वह्नि के मध्य में वह्नि की श्री का निरीक्षण करें । वहाँ पर
बिन्दुओं के द्वारा निमित्तों की और अनिमित्तों को लक्षित करना

[Page-header: ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ \hfill ३८१]
[Decorative Line]

चाहिए। दैवज्ञ (ज्योतिर्विद) कञ्चुकि, अमात्य, बन्दीजन, पुरवासीजन
से आवृत्त होते हुए तुमुल वाद्यों की ध्वनियाँ से तथा शुभ तौर्यत्रिकों के
साथ युक्त होकर शेष में पुनः शान्ति करके और आशीर्वाच्य करके
द्विजों को विधिपूर्वक सुवर्ण से युक्तपूर्ण दक्षिणा देवे तथा धान्य और
वस्त्र देकर उन सबको विदा करे।
इसके अनन्तर पुरोहित शेष जल से समस्त अमात्यादिक का सेचन
करे तथा तुरंग का, बल का, राष्ट्र का सेचन करना चाहिए। इस
प्रकार से करके पीछे राजा तीन रात्रि पर्यन्त पूर्णतया संयम से युक्त
होकर रहे। माँस का अशन, मैथुन से रहित रहे और मांगल्यों का सेवन
करे। यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त तृतीया तिथि का लाभ है उसमें सदा
शंकर के साथ चण्डिका देवी का अर्चन करना चाहिए। पाञ्चायिकी
विहार आदि के द्वारा तथा शिशुओं के कौतुकों के, वैवाहिक विधि से
शिवा चण्डिका का मोहन करना चाहिए। समस्त चतुष्पथों (चौराहों)
में और देवों तथा देवियों के मन्दिरों में पताकाओं को लगाकर उन्हें
भूषित करे और ऐसा करता हुआ कभी भी दुःख नहीं पाया करता है।
इस रीति से शान्ति यज्ञ को सुसम्पन्न करके तथा पुष्य का अभिसेचन
करके चतुरंगों के साथ, भार्याओं और नरों के साथ राज्य मण्डल से
समन्वित यहाँ पर और परलोक में कभी भी दुखित नहीं हुआ करता
है और इससे बड़ा और श्रेष्ठ कोई भी न यज्ञ होता है और न इससे
उत्तम कोई उत्सव ही हुआ करता है।
इससे बढ़कर कोई भी शान्ति नहीं है और इससे अधिक कोई
कल्याण एवं मंगल नहीं होता है। इस विधान से ही नृप का अभिषेचन
होता है और राजपुरोहित को चाहिए कि इसी विधान से युवराज का
अभिषेक करे। यदि नृप को अभिषेक का समाचरण करना हो तो इसी
विधान से नृप सदा स्थिर होता है। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने इन्द्रदेव
से यही यज्ञ कहा था। इसी भाँति राजा इस यज्ञ को करके यहाँ पर
और परलोक में कभी दुःख नहीं पाया करता है।