कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 304, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३०७
महामाया मन्त्र का कवच
श्री भगवान् ने कहा- हे बेताल भैरव! अब इस मन्त्र के कवचन्
का श्रवण करो जो कि वैष्णवी तन्त्र संज्ञा करने वाले का और विशेष
रूप से वैयणवी देवी का है । वहाँ पर मन्त्रादि अक्षर वासुदेव के
स्वरूप का धारण करने वाला है । दूसरा वर्ण ब्रह्मा ही हैं, तीसरा
चन्द्रशेखर है । चतुर्थ गज वक्त्र है, पाँचवाँ दिवाकर है, स्वयं शक्ति
यकार है जो जगन्मयी महामाया है । यकार महालक्ष्मी है और शेष वर्ण
सरस्वती है । पूर्ण वर्ण की योगिनी शैलपुत्री कही गयी है । द्वितीय वर्ण
की कुष्माण्डा मानी गयी है । तकार की स्कन्द माता है । देखो
कात्यायनी स्वयं है । सप्तम की कालरात्रि है जो महादेवी है, यह
संस्थिति है । प्रथम वर्ण कवच है तथा योगिनी कवच है । पीछे देवौद्य
कवच है तथा देवीदिक् कवच है ।
इसके अनन्तर पार्श्व कवच है और द्वितीयान्ता व्यय का कवच है ।
इसके पश्चात् षड्वर्ण कवच है । अभेद्य कवच है, जो सर्वत्राण
परायण है । ये आठ कवच हैं इनको जो नरों में उत्तम है जानता है ।
वह मैं ही महादेवी हूँ और शक्तिमान् देवी के रूप वाला है इस वैष्णवी
तन्त्र कवच का नारद ऋषि है और अनुष्टुप छन्द है । कात्यायनी इसका
देवता है । इसका सब कामों में अर्थों के साधन में विनियोग होता है ।
'अ' पूर्व दिशा में रक्षा करे और 'का' सदा आग्नेयी में रक्षा करे । 'द्य'
यम दिशा में रक्षा करे और 'द' नैर्ऋत दिशा में सर्वदा मेरी रक्षा करे ।
पाश्चात्य दिशा में 'त' रक्षा करे तथा वायव्य दिशा में शक्ति रक्षा करे ।
'य' मुझको उत्तर दिशा में रक्षित करे तथा 'य' ईशान दिशा में रक्षा
करे । 'स' मेरी मस्तक में रक्षा करे और 'क' मेरी दाहिने बाहु में रक्षा
करे । 'च' मेरी बायीं बाहु में रक्षा करें और 'ट' सदा मेरे हृदय में रक्षा
करें । कंठ देश में 'त' रक्षा करे और मेरी कटि की सशक्ति रक्षा करे ।
'य' दाहिने पैर में रक्षा करे तथा 'प' वाम पाद में रक्षा करे
शैलपुत्री पूर्व में, चण्डिका आग्नेयी दिशा में मेरी रक्षा करे । याम्य
चन्द्रघटा रक्षा करे जो भय की भीति की विवर्धिनी है । जगतों की