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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८९०)

कबीरपंथी-

परगासा ॥ षट्दल कमल ब्रह्माको बासा, सावित्री संग सेवा ॥
षट्सहस्र जाको जाप जपत है, इन्द्र सहित सब देवा ॥ अष्टदल
कमल हरि संग लछमी, तीजे सेवक पौना ॥ षट्सहस्र जाको
जाप जपत है, मिटगये आवागौना ॥ द्वादस दल कमल शिवको
बासा, पारबती संग सेवा ॥ षट्सहस्र जाको जाप जपत है,
लखो ज्ञानके भेवा ॥ षोडस कमलमें जिवको बासा, सकती अद्या
जानी ॥ एक सहस्र जाको जाप जपत है, ऐसा भेद वखानी ॥
त्रिदल कमलमें सरस्वति बासा, उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक
सहस्र जाको जाप जपत है, होय ज्ञान परकासा ॥ भँवर गुफा
जहाँ दौय दल कमला, परम हंसको बासा ॥ सहस्र जाको जाप
जपत है, करम भरमको नासा ॥ सहस्र दल कमलमें झिलमिल
दरसे, आपहिँ ईश अपारा ॥ जोति सरूप सकलमें वरते, अलख
निरंजन सारा ॥ सुरति कमल सतगुरुको बासा, एक जाप जपे
सोई ॥ छैसो इकईस जाको जाप जपत है, चीन्हे बिरला कोई ॥
जो चीन्हे सो गुरुमुख होवै, भेद अगोचर भाई ॥ जो गुरुमुख
सो शब्दहिं पावै, कहैं कवीर समुझाई ॥

शब्द ३६१-सुरत मेरी नामसे अटकी ॥ करम भरम औ वेद
बढाई, या फल सो सटकी ॥ टेक ॥ नामके चूके पार न पैहो, जैसे
कला नटकी ॥ जागत सोवत सोवत जागत, मोहि परे चटसी ॥
जैसे पपिहा स्वात बूंदको, लाग रही रटसी ॥ भरमकी मटकी
झिरके ऊपर, सो मटकी पटकी ॥ हम तो आपनि राह चलत हैं,
औरन को उटकी ॥ प्रीति पुरानी नई लगन है, या दिलमें खटकी ॥
और नजर कछु आवत नहीं, ना माने हटकी ॥ प्रेमकी डोरी
मो मन लागी ज्ञान, डोर झटकी ॥ जैसे सरिता सिंधु समानी,
फेर नहीं पटकी ॥ गहो निजनाम खोज हिरदैमें, चीन्ह परे घटकी ॥
कहैं कवीर सुनो भाई साधो फेर, नहीं भटकी ॥