कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 902, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(८८८)
कवीरपंथी-
औलिया, भूल गये सब नखरेमें ॥ धर्म दास गुरु हीरा पाये,
बांध लिये निज अँचरेमें ॥
शब्द ३५५-गरीबी है सबमें सिरदार ॥ टे० ॥ उलटके देखो
ज्ञान गरीबी, जाकी पैनी धार ॥ भौ भंजन सुखदायक जनको,
कहर बिडारन हार ॥ सतयुग त्रेता द्वारा कलियुग, परले टारन
हार ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, हंस उबारन हार ॥
शब्द ३५६-छकोरे मन गगन गली, जहाँ बजत बीन सुर झीनी
॥ टे० ॥ रुनक झुनक अनहद झुन गरजे, झिलमिल दरसे जोती ॥
बिन बादल जहाँ बिजली चमके, वरषत हीरा मोती ॥ अधर
देहरा अधर पुजारी, अधरे सकल बनाया ॥ अधर बैठ मन निहचल
कीजे, ब्रह्ममें जीव समाया ॥ स्वेत सिंहासन स्वेत छत्र सिर, स्वेत
ध्वजा फहराई ॥ हरो लाल पीरो असमानी, बहुरंगी दरसाई ॥
साहब मोमें मैं साहबमें, झिल मिल दरसे नूर ॥ कहें कवीर दया
सतगुरुकी, बैठे हाल हजूर ॥
शब्द ३५७-मेरे दिलदा सौख फकीरी । धन सतगुरु उपदेश
दियो है, सुरति भई मेरी थोरी ॥ टेक ॥ सुन्न सिखर पर गजल
संगीता, रहता सत्त सबूरी ॥ सत्त अवाज करो दरगाहमें, भिछा
मिले भरपूरी ॥ पांच उमराव हजूर बंदगी, आठो पहर उजीरी ॥
अजब ख्याल देखा दरगाहमें, बाजे रबाब नफीरी ॥ काम क्रोध
दोनों दल जीते, हठ आसन तत सीरी ॥ सब घट साहेब समकर
जाने, ऐसी रहन गंभीरी ॥ मांगो न भीख डरो ना, दो मेरे दिलकी
सीरी ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, सहज भई घर मेरी ॥
शब्द ३५८-तरे कायामें गुलजार, बागों मत जा रे ॥ टेक ॥
मन माली परमोधके, संजमकी कर बार ॥ दया पौद सूखे नहीं,
क्षमा शील जड़ डार ॥ करनी कयारी बोइये, रहनी कर रखवार ॥