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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८८६)

कवीरपंथी

बाहिर प्रभु कीन्हा, माया घरे दूनों अंखिया ॥ पांच पचीस कंठ
चढ बैठे, परले तू मौज लफसिया ॥ बालापन बलहीमें बीते,
तरुनीमें कडके छतिया ॥ काम कोध दस इंद्री जागे, ना सूझे
जात न पतिया ॥ अंतसमें में जान परी है, जब जम घरे डुर-
रिया ॥ देवा देवी एको ना लागे, झूठी होवे जड़ियासे बुटिया ॥
केसो दुख समुझके गावे, गुरुजीसे करे बिनवतिया ॥ श्याम
बिहारी समुझके चेतो, अंतमें कोऊ ना संचतिया ॥*

शब्द ३४९ तुम कौन हो मियां कहाँके ॥८०॥ कहाँसे आये
कहाँ जावोगे, किनने भेजा कौन काम है, नई नगरिया झाँके ॥
आतेही तुम रोय दिया, का लायेथे सो खोय दिये, किस जिंग-
रमें हो किस फिकरमें हो, आंखें खोलो का ढाँके ॥ वतन तुम्हारा
कौन ठामहै, बड़ा शहर वोहै कोई गाम । उत्तर दखिन पूरव
पश्चिम, नैरितके हो ईशानके ॥ आये हो इस नगरीमें, कुछ
मौज साईका सुख देखो. अब ऐसी ना कीजिये, ना ईहांके हो
ना उहांके ॥ हिंदू या मुसलमीन हो, दुनियां द्वार फकीर नदान,
कहें कवीर सुनो भाइ साधों, तिरछे हो के वाँके ॥

शब्द ३५०—हम तो सदा बने रंगलाल । लंडी दौलत का है
पाल ॥८०॥ चार खूंट जागीर हमारी, गल बिच तुलसी माल ॥
काम धाम सब लिया बगलमें, कोई न पावे हाल ॥ अन जल
आटा सब कुछ मिलता, घी गुड़ चावल दाल ॥ बहुत खजाना
पास भरा है, देता है गोपाल ॥ खुसीसे भिक्षा लेते है हम,
नासिर फोरी चाल ॥ साई खातर लिया फकीरी, झूठी माया
जाल ॥ दया धरम कुछ करले बंदे, निकल जायगी खाल ॥
जितनी संपत् उतनी बिपत, नाहक बजावे गाल ॥ सत्तनामका
दिया है डंका, हाथ जोड़ता काल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ
साधों, लगा भजनका ढाल ॥