सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

शब्दावली

(८३)

हरि नेरे अहों कियौ दूर कहूँ, भरि पूर हजूर हो नेनन मेरे ।
हिय ठाहर हो कियौ बाहर हो; धरती अस्मान तुही तुहि टेरे ॥
गलि गोरिनने तरुतोरिनमें जड़ साखन फूलन पातन हेरे । मोहिं
समाय लखाय नहीं, कहु कौन उपाय गहौ पद तेरे ॥ ६ ॥

हमसूं कियो भिन्न कियो यक है, तू सुहिमें कियो मैं तुहि
मांही । सब पूरन देखत तूहि तुही, किछु एक अहो धो अनेकन
आही ॥ कियो स्वर्ग बसौ अपवर्ग कियो, निसिवासर वास
कियो मोहिं पाही ॥ पिय आपै आप जो व्याप सही, किहि
कारन तेहु विधा दरसाही ॥ ७ ॥

कहूँ गोय रहे विष बोय रहे, नित मो मन मन्दिर माहि
विहारी । विनु लालन बाल विहालपरी, वह कौन घरी जो हरी
पग धारी ॥ सुखको नहीं लेश कलेश भयो कर, काह पिया
परदेश पधारी । सपने अपने हरि भेट भई, सुँह खोल लखे हग
लोल लबारी ॥ ८ ॥

कबहूँ न पिया अपमान किया, किमि कै विधि बाम बिछोह
करी है । लकुटी कर ले मोहिं मार कहूँ जनु, कांटकी मारहु फूल
छरी है ॥ दुर दूरि कह्यो दबि दूरि दुरा, जब टेरे हरी तब पांय परी
है । जिहि भांति से राखि रही त्योहि त्यो, कछु भोग धरी तिहिं
पेट भरी है ॥ ९ ॥

कह वीर करो तन पीर परो, किमि धीर धरो नहिं प्रीतम
आयो । दिन रात कराहि कराहि उठे, विरहा दव दाहि जो ताहि
न पायो ॥ हिय हूक परी कह चूक परी, विधना सिधना मम
काम पुरायो । सुन हेरि भटू अब ठाट टटू, मति धूसर दूसर
वेष बनायो ॥ १० ॥

सब भूषण भू छटकाय दियो, सतसङ्ग विभूतिले अङ्गन मेली ।