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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७९३)

घर मेला ॥ षट दल चक्र एक कमल विराजे, जहाँ पुरुष अल-
बेला ॥ चंद सूर जो घरको लावे, सुषुप्तन सुरति समावे ॥ कहैं
कवीर कायाकी बातें, सतगुरु मिले लखावे ॥

शब्द ६५-गलतान मता जब आवेगा। तब जियरा सुख पावेगा
॥ टे० ॥ चार अचार मिटे जब तनकी, तब साहब सुख पावैगा ॥
ज्ञान ध्यानमें निसदिन राचे, आप अपन ससुझावैगा ॥ अनहद
बाजा बजे सुहेला, हरदम खबर मँगावेगा ॥ कहैं कवीर तत्त्व
जब दरसे, मैं तैं दूर बहावेगा ॥

शब्द ६६-मेरी सुरति सोहागिन जागरी ॥ का सोवै पंडित
लोभ मोहमें, उठ गुरुके चरने लागरी ॥ चित दे सरवन सुन दौय
अच्छर, उठत मधुर धुन रागरी ॥ का तू अटकी लोभ मोहमें,
उठ गुरुके शब्दसो लागरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, यह
जगत परा जम जालरी ॥

शब्द ६७-पंडित मिथ्या करो बिचारा। तब नहीं सृष्टि न
सिरजनहारा ॥ सुत्र अस्थूल पावक जग नहीं, पवन न रवि शशि
धरना ॥ जोत सरूप निरंजन नहीं, नहीं भाषा नहीं बरना ॥
गोरखदत्त राम तब नहीं, नहीं तीर्थ पखाना ॥ हरि ब्रह्मा नहीं
शिवसकती, नहीं वेद आचरना ॥ कर्म भर्म दोजख तब नहीं,
नहीं मंत्र नहीं पूजा ॥ बैकुंठ मसीत भाव तब नहीं, ना तब एक
न दूजा ॥ मात पिता कुल वाके नहीं, वह तो पुरुष अकेला ॥
कहैं कवीर या पद को बूझे, सो सतगुरुका चेला ॥

शब्द ६८-रासुरा भौरा कँवल ना पावे। ताते जनम जनम
डहकावे ॥ टे० ॥ सुच्छम खेत बिजूका रोपा, मिरगा चरन नहीं
पावे ॥ भर्महि मारे भरम पछारे, ताते निकट न आवे ॥ पुरइन
पेड बसे एक दादुर, स्वातीके स्वाद न पावे ॥ कँमल बास भौरा