कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मैली तन झीनी ॥ दासमलूक सलूकसे ओढे, रघुवर टुकरी लीन्ही ॥
धनि धर्मदास जुगतसे ओढे, गढ बांधो चौका कीन्ही ॥ साहेब
कवीर शब्दसे ओढे, जस लीन्ही तस दीन्ही ॥
शब्द ५९-जोगी चेतन नगरमें रहुरे ॥ टे० ॥ प्रेमप्रीति रंग
ओढो चादर, दिलकी तसबी गहुरे ॥ अजपा जाप जपो दोय
अच्छर, काल भरम सब डहुरे ॥ नामकी धूनी अंदर बारो, भेद
न परगट कहुरे ॥ आसनमार गुफामें बैठो, नाम धनीका भजुरे ॥
सोहैं शब्द समय सबनमें, स्वासा संग धुन गहुरे ॥ कहैं कवीर
सुनो भाई साधू, भौजल पार उतर रहुरे ॥
शब्द ६०-सोवे जोगिया कौन जगावे ॥ टे० ॥ गढ परबत जोगी
कुटी बनावे । मृगछाला जोगी झाड बिछावे ॥ अन्न न खाय
जोगी पानी न पावे । ये जोगिया जग रूप दिखावे ॥ जीव न
सीव स्वासा सुर नाहीं । जाय गगन बिच ध्यान लगाहीं ॥ कहैं
कवीर सुनो साधो । या जोगियाको कैसे समुझाई ॥
शब्द ६१-संतो धोका सबको मारे ॥ टे० ॥ ऐसा है कोई संत
बिवेकी, निरमल ज्ञान विचारे ॥ कोई खोजे शिवशक्तीमें, कोई
खोजे काया ॥ कोई खोजे सुन्न महलमें, ऐसे जग भरमाया ॥
कोई सुनीजन मनको मूंढे, कोई उलटा पवन चढावे ॥ कोई जंग्र
मंत्र कोई ओषद खोजे, कोई काशी करवत लावे ॥ कोई जंगम
जलमाँहिं नहावे, कोई कोई सेष सयाना ॥ कोईकोई देश दिसंतर
डोले, कोई तीरथ व्रत लपटाना ॥ कोई कर्म भर्म्मकी सांकर काटे,
कोई पारब्रह्मको धावे ॥ कहैं कवीर सोई जन मेरा, सिर अपने
भार न लावे ॥
शब्द ६२-हंसा सुरत करो ठहराई ॥ जासों जिव परले ना जाई
॥ टे० ॥ साख रमैनी बहुत कहतहौ, कथ कथ गये अपारा ॥ राई भर