कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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त्यागके, जगसों भई उचाट । कहैं कवीर मिलो पिय प्यारी,
सतगुरु खोल कपाट ॥
होरी २५—छाये प्रीतमजी परदेश, मैंने अब जानी ॥ टेक ॥
अंग बिभूति रमाऊं निसि दिन, स्वेत जटा भये केस । घर घर
अलख जगावत डोले, धर जोगिनको भेश ॥ मैं भौसागर भूल
रही हों, लिखना भयो संदेस । ऐसे सतगुरु नाहि मिलै, मेरी सुर्त
करे परवेस ॥ जाकी ध्यान धरे ब्रह्मादिक, ध्यावत शंकर सेस ।
नाम लेत भौसागर छूटे, कट गये करम कलेस ॥ जेठ देवरके
मोह त्यागके, पियसे बांधो लेस । कहैं कवीर मिलो पिया प्यारे,
छूटे सकल अंदेश ॥
होरी २६—तू कैसे हूस रहीरी, नहि हूसन वारी ॥ टेक ॥
कबकी मैं ठाढी तोहि मनाऊं, तू नहि चितमें धारी । गगन मंडलमें
धूम मची है उठ चल वेग संवारी ॥ ईगला पिगला हाथ छरी ले,
सुषुमन केशर गारी । पांच पचीस भई एक ठौरी, गावे दे दे तारी ॥
जरद कसबका लैहंगा सोहै, और कसुंमल सारी । कहे कवीर
ऐसी होरी खेलो, निरतत सुषुमन नारी ॥
होरी २७—खेलो खेलो सुहागिनि होरी ॥ टेक ॥ चरण सरोज
पिया हित जौलों, रजकी केशर घोरी ॥ भरम अबीर उडाव सखीरी,
लोक लाज कुल तोरी ॥ सोहम् नार जहाँ रंग राची, बीच सुषुमना
डोरी ॥ पुरुष पंच गली एक जानो, एकहि संग ढंढोरी ॥ शब्द
सजीवन रुयाल पीवका, गहि लीजे निज डोरी ॥ रंग अनंग
सखी मत राचो, पियके पांव परोरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो,
भिटे जमके झगरोरी ॥
होरी २८—पियके रंग रंगी कोई, मेरो काह करेगो ॥ टेक ॥
पिया मेरे सजनी मैं पियकी, पियके पांव परोरी । पियकी सेज