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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(५९५)

समै-बिन देखे करता भयो, बिन देखे लपटान । कहैं कबीर
जगत सब वाही माहि समाहि ॥ एक समाना सकलमें, सकल
समाना ताहि । कविर समाना बूझमें, जहाँ दूसरा नाहिं ॥

रमैनी १६४-आप पुजेरी आपहिं देवा । आपहिं वेद आपही
भेवा ॥ आप गुरु औ आपहिं चेला । आप संयोगी आप अकेला ॥
आपहिं ठाकुर आपहिं दासू । आपहिं दाता आपहिं पासू ॥
आपहिं बीज आप वृक्ष होई । आपहिं हँसे रु आपहिं रोई ॥
आप करे औ आप निनारा । आपहिं करता सिरजनहारा ॥
आप मच्छ संखासुर मारा । आपहिं कच्छ दसधरै घारा ॥ आप
प्रह्लाद हिरनाकुश आपू । आपहिं पुत्र औ आपहिं पापू ॥ आप
रावना औ रामहिं रामा । आपहिं कृष्ण आप हरिनामा ॥ आप
सहसा आप परसरामा । आपहिं बावन आप बलिनामा ॥ आप
अवध औ आप गयासुर । आपहिं भयासुर औ असुर ॥ आप कलंकी
कालीद्वार होई । आपहिं पंछी अहेरी सोई ॥ आपहिं सिंह औ
आपहिं स्यारा । आपहिं हिंदू तुरुक निनारा ॥

समै--आपहिंमें यह जग उरझाना, भरम रहा यह पूर ।

कहैं कविर यह अटपटा, है नियरे पै दूर ॥

रमैनी १६५--हम करता हम सबके करैया । हम लेता हम
सबके दिवैया ॥ हम शाखा हम पान औ फूला । हम सुख दुख
समझ हम भूला ॥ हमही वृक्ष बीज अंकुरा । हम दाता हमही
हैं सुरा ॥ हम राजा हम परजा लोगा । हमहिं करें जग सब सुख
भोगा ॥ हमहीं छांछ छीर हमहीं घीवा । तत हम हम गुन हमहीं जीवा ॥

समै-हमरा यह तन जीवरा, हमरी सब है बेले । करता पुरुष
अविनासी, सो वह रहा अकेल ॥ हम करता जीव जग मारे, हम
करता भय काज । कहैं कबीर हम जो चीन्हे, ताका अविचल राज ॥